Wednesday, October 28, 2026
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Mumbai News: स्लम डेवलपमेंट धोखाधड़ी मामले में अडानी से जुड़ी फर्म और L&T पर लगाया ₹2 लाख का जुर्माना…पढ़िय यह अहम केस

Mumbai News: बॉम्बे हाई कोर्ट ने व्यावसायिक मुकदमों में बेवजह रोड़े अटकाने और अदालत का कीमती समय बर्बाद करने वाले कॉरपोरेट्स पर सख्त रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट के जस्टिस गौरी गोडसे की एकल पीठ ने एलएंडटी एशियन रियल्टी प्रोजेक्ट एलएलपी, एलएंडटी रियल्टी लिमिटेड, शिव इंफ्रा विजन प्राइवेट लिमिटेड और पोर्ट्समाउथ बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड (अडानी समूह से जुड़ी कंपनी) द्वारा दायर चार अंतरिम याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने झोपड़पट्टी पुनर्विकास (Slum Development) धोखाधड़ी से जुड़े एक कमर्शियल सूट (व्यावसायिक मुकदमे) को रोकने के “अनावश्यक प्रयास” के लिए L&T (लार्सन एंड टुब्रो) की दो फर्मों, अडानी समूह से जुड़ी एक कंपनी और झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) पर ₹2-2 लाख का जुर्माना (कुल ₹8 लाख) ठोका है। अदालत ने सख्त लहजे में टिप्पणी की और कहा, प्रतिवादियों द्वारा किए गए ऐसे प्रयास कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के मूल उद्देश्य यानी मुकदमों के त्वरित निपटारे को विफल करते हैं और अदालत का अनावश्यक समय भी बर्बाद करते हैं।”

क्या है पूरा विवाद? (मुंबई स्लम प्रोजेक्ट से जबरन हटाने का आरोप)

मूल डेवलपर का निष्कासन: यह पूरा कानूनी विवाद मुंबई के एक बड़े स्लम रिहैबिलिटेशन (SRA) प्रोजेक्ट के मालिकाना हक और विकास अधिकारों से जुड़ा है। मूल शिकायतकर्ता, के.एस. चामनकर एंटरप्राइजेस को तीन स्लम सोसायटियों के पुनर्विकास के लिए नियुक्त किया गया था। चामनकर एंटरप्राइजेस का दावा है कि उन्होंने एक संयुक्त पुनर्वास इमारत (Rehab Building) का निर्माण भी पूरा कर लिया था, लेकिन इसके बाद एसआरए (SRA) द्वारा उन्हें अचानक और अवैध रूप से टर्मिनेट (बर्खास्त) कर दिया गया।

साजिश का आरोप: चामनकर एंटरप्राइजेस की जगह ‘शिव इंफ्रा विजन’ को नया डेवलपर नियुक्त किया गया। चामनकर ने हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर आरोप लगाया कि ब्लैकलिस्टेड डेवलपर्स (जिनमें एलएंडटी और अडानी से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं) ने एसआरए (SRA) के आला अधिकारियों के साथ मिलकर एक आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी के तहत उन्हें प्रोजेक्ट से बाहर निकाला ताकि वे इस बड़े मुंबई स्लम प्रोजेक्ट पर नियंत्रण हासिल कर सकें।

तकनीकी दांव-पेंच का सहारा लेकर केस दबाने की कोशिश

इस व्यावसायिक मुकदमे (Commercial Suit) से बचने के लिए एलएंडटी और अडानी से जुड़ी फर्मों ने कानूनी तकनीकी पहलुओं का सहारा लिया।

आदेश 7 नियम 11 (Order VII Rule 11) का दांव: उन्होंने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के इस नियम के तहत चामनकर के मुकदमे को शुरुआती चरण में ही खारिज करने की मांग की।

कंपनियों की दलीलें: कॉरपोरेट दिग्गजों ने तर्क दिया कि इस मुकदमे का कोई ठोस आधार (Cause of Action) नहीं है, यह मामला समय-सीमा (Limitation) से बाहर है, और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 12A के तहत अनिवार्य मध्यस्थता (Pre-institution Mediation) की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है।

विश्लेषण: हाई कोर्ट का कानूनी स्टैंड और निष्कर्ष

जस्टिस गौरी गोडसे ने कंपनियों के सभी तकनीकी तर्कों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले की पूरी और निष्पक्ष सुनवाई (Trial) जरूरी है।

विषयबॉम्बे हाई कोर्ट की कानूनी व्याख्या और निर्देश
शुरुआती दौर में खारिज नहीं हो सकता केसकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चामनकर के मुकदमे में साफ तौर पर ‘कॉज ऑफ एक्शन’ और ऐसे मुद्दे दिखाई देते हैं जिनकी गहन न्यायिक जांच (Triable Issues) आवश्यक है। इन्हें शुरुआती या प्रारंभिक चरण में खारिज नहीं किया जा सकता।
मिश्रित कानूनी सवालसमय-सीमा (Limitation) और स्लम एक्ट के तहत मुकदमे पर रोक जैसे बचाव के बिंदु कानून और तथ्यों के मिश्रित सवाल (Mixed Questions of Law and Fact) हैं, जिनका फैसला केवल मुकदमे की पूरी सुनवाई (Trial) के बाद ही किया जा सकता है।
जुर्माने का आदेशकोर्ट ने पाया कि स्थापित कानून के बावजूद डेवलपर्स ने कई तकनीकी आपत्तियां उठाईं, ढेरों पुराने फैसलों की नजीरें पेश कीं और कोर्ट का काफी वक्त खराब किया। इसलिए, चारों संस्थाओं को दो सप्ताह के भीतर वादी (चामनकर) को ₹2,00,000-₹2,00,000 का हर्जाना देने का आदेश दिया गया है।
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