H-1B Visa Fee: अमेरिका की एक संघीय अदालत (Federal Court) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को एक बड़ा झटका देते हुए नए H-1B वीजा आवेदनों पर लगाई गई $1,00,000 (लगभग 83 लाख रुपये) की भारी-भरकम सप्लीमेंटल फीस को पूरी तरह से रद्द (Strike Down) कर दिया है।
अमेरिकी जिला न्यायालय के जज लियो टी. सोरोकिन का फैसला
मैसाचुसेट्स के अमेरिकी जिला न्यायालय के जज लियो टी. सोरोकिन ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन की यह नीति शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत और प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम (Administrative Procedure Act) का खुला उल्लंघन करती है। अदालत ने साफ कहा कि राष्ट्रपति अप्रवासन (Immigration) शक्तियों की आड़ में ऐसा कोई वित्तीय बोझ नहीं थोप सकते जो व्यावहारिक रूप से एक ‘टैक्स’ (Tax) बन जाए।
क्या थी नीति और क्यों हुआ था विरोध?
प्रशासन का तर्क: यह पूरा विवाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 19 सितंबर 2025 को हस्ताक्षरित ‘उद्घोषणा 10973’ (Proclamation 10973) से शुरू हुआ था। ट्रंप प्रशासन का दावा था कि H-1B वीजा कार्यक्रम के दुरुपयोग को रोकने और अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा के लिए $1,00,000 का अतिरिक्त भुगतान जरूरी है। इसके लिए उन्होंने ‘इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट’ (INA) का हवाला दिया, जो राष्ट्रपति को अमेरिका के हितों को नुकसान पहुंचाने वाले गैर-नागरिकों के प्रवेश को प्रतिबंधित करने की शक्ति देता है।
बदला हुआ वित्तीय गणित: इस नीति से पहले H-1B याचिका की फीस $960 से $7,595 के बीच हुआ करती थी। नई नीति ने इस लागत को आसमान पर पहुंचा दिया था।
छोटा व्यापार और स्टार्टअप तबाह होने का डर: इस भारी फीस के कारण कई नियोक्ताओं, विशेषकर स्टार्टअप्स, विश्वविद्यालयों, अस्पतालों और छोटे व्यवसायों के लिए विदेशी प्रतिभाओं को काम पर रखना असंभव हो जाता, क्योंकि उनके पास बड़ी टेक कंपनियों (जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट) जैसा वित्तीय बैकअप नहीं होता।
इस नीति के खिलाफ अमेरिका के 20 राज्यों [स्टेट ऑफ कैलिफोर्निया बनाम मार्क वेन मुलिन और अन्य] ने अदालत का रुख किया था। उनका तर्क था कि इससे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों की भर्ती प्रभावित होगी।
यह कोई प्रतिबंध नहीं, बल्कि अवैध टैक्स है: अदालत
अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या $1,00,000 का यह भुगतान एक वैध अप्रवासन प्रतिबंध (Immigration Restriction) है या एक अनधिकृत टैक्स (Unauthorised Tax)। जज सोरोकिन ने इसके पीछे की कानूनी परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा, “H-1B कर्मचारियों को काम पर रखना पूरी तरह से कानूनी है और यह भुगतान किसी अवैध कृत्य के लिए सजा नहीं है। इसलिए, इसे ‘पेनल्टी’ या जुर्माना नहीं माना जा सकता। भुगतान को आप चाहे जो नाम दें, इसका स्वरूप और इसका लागू होना साफ दिखाता है कि यह एक टैक्स है।” अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि अमेरिकी कांग्रेस (संसद) ने ‘इमिग्रेशन एंड नेशनलिटी एक्ट’ के तहत राष्ट्रपति को ‘प्रतिबंध’, ‘नियम’, ‘विनियम’ या ‘सीमाएं’ तय करने का अधिकार तो दिया है, लेकिन इन शब्दों के सामान्य अर्थ में ‘टैक्स लगाने की शक्ति’ शामिल नहीं है। टैक्स लगाने का अधिकार केवल संसद के पास है और राष्ट्रपति को यह शक्ति सौंपने के लिए स्पष्ट वैधानिक भाषा की आवश्यकता होती है, जो कि इस मामले में नहीं थी।
विश्लेषण: प्रशासनिक प्रक्रिया (APA) के उल्लंघन पर कोर्ट का हंटर
अदालत ने केवल शक्तियों के दुरुपयोग पर ही नहीं, बल्कि इस नीति को लागू करने के मनमाने और प्रशासनिक तौर-तरीकों (Arbitrary and Capricious) पर भी गंभीर आपत्तियां दर्ज कीं।
| उल्लंघन के मुख्य बिंदु | अमेरिकी फेडरल कोर्ट का कानूनी स्टैंड और निष्कर्ष |
| नोटिस और टिप्पणी प्रक्रिया का अभाव | कोर्ट ने पाया कि इस नीति ने नियोक्ताओं पर नए कानूनी दायित्व थोपे, लेकिन इसे लागू करने से पहले ‘प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम’ (APA) के तहत अनिवार्य ‘नोटिस-एंड-कमेंट’ (जनता और हितधारकों से राय लेने) की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। |
| विवेकहीन और मनमाना फैसला | सरकार ने इस नीति को लागू करते समय इसके विकल्पों पर विचार नहीं किया। साथ ही, कैप-एग्जेंप्ट नियोक्ताओं (जैसे यूनिवर्सिटी और रिसर्च संस्थान) को छूट देने या प्रभावित संस्थानों के हितों का आकलन करने में प्रशासन पूरी तरह विफल रहा। |
| अंतिम अदालती निर्देश | अदालत ने इस नीति को पूरी तरह से निरस्त (Vacated) कर दिया है, जिससे राज्यों और नियोक्ताओं को पूरी राहत मिल गई है। |

