Tuesday, June 9, 2026
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Judicial Rebuke: यूपी पुलिस सुनिए…शादियों की जांच करने के बजाय असली ध्यान अपराधों की जांच पर लगाएं, यह रही जस्टिस की नसीहत

Judicial Rebuke: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जाहिर करते हुए एक बड़ा आदेश दिया है।

हाई कोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने एक प्रेमी जोड़े के खिलाफ दर्ज अपहरण (Kidnapping) के केस को रद्द करते हुए कहा कि पुलिस परिवार वालों के इशारे पर बालिग जोड़ों को परेशान करके अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर रही है। अदालत ने पुलिस को सख्त हिदायत दी है कि वह बालिग जोड़ों (Young Couples) के पीछे भागना बंद करे और अपना ध्यान असली अपराधों की जांच पर लगाए।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: पुलिस का यह काम नहीं है

  • अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली को “परेशान करने वाला ट्रेंड” (Disturbing Trend) बताया।
  • वक्त की बर्बादी: पुलिस उन कामों में अपना समय बर्बाद कर रही है जो उसका काम ही नहीं है। पुलिस को शादियों की जांच करने के बजाय उन अपराधों पर ध्यान देना चाहिए जिनसे उनके हाथ पहले से भरे हुए हैं।
  • अदालतों पर बोझ: पुलिस की इन गलतियों की वजह से अदालतों में केसों की संख्या अनावश्यक रूप से बढ़ रही है।
  • संविधान का उल्लंघन: संविधान किसी भी बालिग को दूसरे बालिग की मर्जी पर शासन करने या उसे नियंत्रित करने की अनुमति नहीं देता, चाहे उनके बीच का रिश्ता कुछ भी हो।

मामला क्या था? (The Kidnapping Case)

  • शिकायत: एक युवती के पिता ने आरोप लगाया कि उनकी 19 वर्षीय बेटी एक व्यक्ति और उसके भाई के साथ कार में भाग गई है। पुलिस ने इस पर अपहरण की FIR दर्ज कर ली।
  • हकीकत: कोर्ट ने पाया कि जोड़े ने दिसंबर 2025 में देहरादून के शिव मंदिर में शादी कर ली थी और तब से वे शांतिपूर्वक साथ रह रहे हैं।
  • कोर्ट का रुख: बेंच ने कहा कि पिता को केवल ‘गुमशुदगी’ की रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए थी। पुलिस द्वारा FIR दर्ज करके जोड़े का पीछा करना उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में “गंभीर हस्तक्षेप” है।

DGP को निर्देश और चेतावनी

  • हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को सीधे निर्देश दिए हैं।
  • सुधारात्मक कदम: DGP को इस संबंध में तुरंत सुधारात्मक कदम उठाने को कहा गया है ताकि बालिग जोड़ों को पुलिसिया उत्पीड़न से बचाया जा सके।
  • चेतावनी: कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस नहीं सुधरी, तो अदालत को कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
  • अवैध कृत्य: पुलिस द्वारा जोड़ों को जबरन अलग करना और लड़की को माता-पिता के पास वापस भेजना न केवल अवैध है, बल्कि खुद में एक अपराध है।

केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)

बिंदुविवरण
अदालतइलाहाबाद हाई कोर्ट (प्रयागराज)।
मुख्य मुद्दाबालिग जोड़ों की पसंद की शादी में पुलिस का हस्तक्षेप।
कानूनी स्थितिबालिग (18+) होने पर अपनी मर्जी से साथ रहने का अधिकार।
अदालती आदेशअपहरण की FIR रद्द; पिता को जोड़े के जीवन में दखल न देने का निर्देश।
संदेशपुलिस “शादियों की जांच” करना बंद करे।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन हजारों बालिग जोड़ों के लिए एक ढाल की तरह है जो समाज और परिवार के डर से भागकर शादी करते हैं और बाद में पुलिसिया कार्रवाई का शिकार होते हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि अनुच्छेद 21 के तहत अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहना एक मौलिक अधिकार है, और पुलिस का काम “मोरल पुलिसिंग” करना नहीं बल्कि कानून व्यवस्था बनाए रखना है।

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