Injured Witnesses: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने घायल गवाहों (Injured Witnesses) की गवाही पर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।
एक जघन्य तिहरे हत्याकांड (Triple Murder Case) में पिता-पुत्र की उम्रकैद की सजा बरकरार रखते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई गवाह अपराध के दौरान खुद घायल हुआ है और उसकी गवाही विश्वसनीय व सुसंगत है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वह मृतक का रिश्तेदार है।यह मामला 11 सितंबर, 2020 को महासमुंद के जोबा गांव में हुए एक वीभत्स हमले से जुड़ा है। जमीन विवाद के चलते परसराम गायकवाड़ और उसके बेटे बृजसेन ने सोते हुए एक ही परिवार के सात सदस्यों पर हमला किया था, जिसमें मां और दो बच्चों की गला रेतकर हत्या कर दी गई थी।
घायल गवाह की कानूनी अहमियत (Value of Injured Witness)
- हाई कोर्ट ने ‘रिश्तेदार’ बनाम ‘विश्वसनीय’ गवाह के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।
- स्वाभाविक उपस्थिति: चूंकि गवाह खुद उसी हमले में घायल हुए थे, इसलिए घटनास्थल पर उनकी मौजूदगी पूरी तरह स्वाभाविक (Natural) थी।
- साक्ष्य का भार: कोर्ट ने कहा, “एक घायल गवाह की गवाही को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उसका पीड़ित से पारिवारिक संबंध है। कोर्ट को उसके बयान की विश्वसनीयता, निरंतरता और सुसंगतता का आकलन करना चाहिए।”
- उच्च विश्वसनीयता: कानून की नज़र में एक घायल गवाह झूठ बोलने की कम संभावना रखता है क्योंकि वह असली अपराधी को सजा दिलाना चाहता है।
हीट ऑफ पैशन बनाम पूर्व-नियोजित हत्या
-आरोपियों ने दलील दी थी कि यह हमला अचानक गुस्से में (Spur of the moment) हुआ था, इसलिए इसे धारा 302 (हत्या) के बजाय धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत माना जाना चाहिए।
- तैयारी के सबूत: कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा, आरोपी अपने साथ खंजर, सब्बल और मिर्च पाउडर लेकर आए थे। पीड़ितों की आँखों में मिर्च पाउडर डालना और फिर गला रेत देना यह दर्शाता है कि यह “अचानक हुआ गुस्सा” नहीं बल्कि एक सुनियोजित साजिश (Premeditated intent) थी।
- क्रूरता: आरोपियों ने सोते हुए बच्चों तक पहुँचने के लिए बंद दरवाजों को तोड़ा था, जो उनके मारने के पक्के इरादे को साबित करता है।
फॉरेंसिक और मेडिकल सबूतों की पुष्टि
- कोर्ट ने सजा बरकरार रखने के लिए ठोस सबूतों का हवाला दिया।
- मेडिकल रिपोर्ट: डॉक्टरों ने पुष्टि की कि पीड़ितों की ‘कैरोटिड धमनियां’ (Carotid arteries) काटी गई थीं, जिससे मौके पर ही मौत हो गई।
- हथियारों की बरामदगी: आरोपियों के बयान के आधार पर खून से सने 24 हथियार और खंजर बरामद किए गए, जो सीधे तौर पर उन्हें अपराध से जोड़ते थे।
- झूठे आरोप की दलील खारिज: बचाव पक्ष की यह दलील कि उन्हें संपत्ति हड़पने के लिए फंसाया गया है, किसी भी विश्वसनीय सबूत से साबित नहीं हो सकी।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| घटना | 11 सितंबर, 2020; ग्राम जोबा, महासमुंद। |
| दोषी | परसराम गायकवाड़ और उसका बेटा बृजसेन। |
| सजा | धारा 302/34 के तहत उम्रकैद और अन्य धाराओं में 10 साल की कैद। |
| पीड़ित | जागृति गायकवाड़ और उनके दो बच्चे (मृत); पति और 3 बच्चे (गंभीर घायल)। |
| कानूनी संदेश | घायल गवाह की गवाही सबसे मजबूत साक्ष्यों में से एक है। |
जघन्य अपराध में कोई राहत नहीं
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला समाज में एक कड़ा संदेश देता है कि पारिवारिक विवादों के नाम पर की गई ऐसी क्रूरता के लिए कानून में कोई सहानुभूति नहीं है। कोर्ट ने न केवल सजा बरकरार रखी, बल्कि जेल प्रशासन को यह भी निर्देश दिया कि वे कैदियों को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के उनके कानूनी अधिकारों और मिलने वाली ‘कानूनी सहायता’ (Legal Aid) के बारे में सूचित करें।

