JJ Act: केरल हाईकोर्ट ने एक 9 वर्षीय मासूम छात्र के साथ कुकर्म करने वाले मदरसा शिक्षक की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा दोषी को सुनाई गई 20 साल कैद
हाई कोर्ट के जस्टिस ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए विधिक सिद्धांत को दोहराया कि यदि किसी पीड़ित बच्चे की गवाही सुसंगत, सच्ची और विश्वसनीय है, तो केवल उसी के आधार पर आरोपी को सजा देने के लिए कानूनन कोई बाधा नहीं है। बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए अदालत ने विशेष पॉक्सो कोर्ट द्वारा दोषी को सुनाई गई 20 साल के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा को पूरी तरह वैध और बरकरार रखा है।
आरोपी के बहानों को खारिज किया
अदालत ने आरोपी के बहानों को खारिज करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट किया। कहा, पीड़ित बच्चे (PW1) के बयान में शुरू से अंत तक पूर्ण स्पष्टता और निरंतरता रही है। उसकी गवाही को परिस्थितियों और अन्य गवाहों के बयानों से भी पूरा समर्थन मिला है। इसलिए यह तर्क पूरी तरह अस्वीकार्य है कि पीड़ित एक विश्वसनीय गवाह नहीं है।
लॉकडाउन के दौरान हुई थी शर्मनाक वारदात
यह मामला त्रिशूर जिले के मदरसा से जुड़ा है, जहां आरोपी एक शिक्षक (उस्ताद) के रूप में कार्यरत था।
घटनाक्रम: कोविड-19 महामारी (COVID-19 Pandemic) के दौरान जब मदरसे की कक्षाएं ऑनलाइन चल रही थीं, तब 9 वर्षीय पीड़ित छात्र परीक्षा से जुड़े अपने कुछ विधिक/शैक्षणिक संदेहों को दूर करने के लिए शिक्षक रशीद के पास गया था।
विश्वासघात: मदद करने के बहाने आरोपी शिक्षक ने मासूम बच्चे का गंभीर यौन उत्पीड़न किया। घर लौटने के बाद डरे-सहमे बच्चे ने पूरी आपबीती अपनी मां को बताई, जिसके बाद मां की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया था।
निचली अदालत का फैसला: कुन्नमकुलम की विशेष पॉक्सो अदालत (Special POCSO Court) ने वर्ष 2023 में आरोपी को पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत ‘गंभीर मर्मभेदी यौन उत्पीड़न’ (Aggravated Penetrative Sexual Assault), भादंवि (IPC) की धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध) और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 (JJ Act) के प्रावधानों के तहत दोषी पाते हुए 20 साल की कैद की सजा सुनाई थी।
सामुदायिक मतभेद और साजिश का झूठा विधिक तर्क खारिज
हाई कोर्ट के समक्ष आरोपी के वकीलों ने खुद को बचाने के लिए एक नया प्रशासनिक और सामाजिक तर्क गढ़ने की कोशिश की थी।
साजिश का दावा: मुस्लिम समुदाय के भीतर सक्रिय ‘प्रतिद्वंद्वी संप्रदायों’ (Rival Sects/Sectarianism) के लोगों ने आपसी रंजिश के चलते उसे इस मामले में झूठा फंसाया है।
इकलौती गवाही पर सवाल: निचली अदालत ने केवल एक छोटे बच्चे की गवाही पर भरोसा करके इतनी बड़ी सजा सुना दी, जो कि विधिक रूप से गलत है।
केरल हाई कोर्ट ने इन तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा: मदरसे के भीतर हुए इस जघन्य कृत्य में मुस्लिम समुदाय के भीतर संप्रदायवाद या गुटबाजी के कारण मामला दर्ज होने की थ्योरी में रत्ती भर भी सच्चाई नजर नहीं आती। आरोपी अदालत के सामने ऐसा कोई भी विधिक साक्ष्य या सामग्री (Material Evidence) पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा है, जिससे यह साबित हो सके कि उसे किसी ने दुर्भावना के तहत फंसाया है।
विधिक सारांश (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | विवरण एवं अदालती निष्कर्ष |
| मामला / केस साइटेशन | XXX बनाम केरल राज्य (XXX v. State of Kerala) |
| घटनास्थल | मदरसा, त्रिशूर (केरल)। |
| सजा का आधार | पॉक्सो एक्ट (POCSO), IPC की धारा 377 और जेजे एक्ट (JJ Act)। |
| केरल हाई कोर्ट का आदेश | अपील पूरी तरह खारिज; 20 साल के कठोर कारावास की सजा बरकरार। |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | बाल पीड़ित की सुसंगत और अडिग गवाही (Sterling Witness) किसी भी अन्य वैज्ञानिक साक्ष्य से ऊपर है। |

