Pass Certificate: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में दोषी साबित होने तक निर्दोष के विधिक सिद्धांत को सुदृढ़ करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
प्रिंसिपल को दो महीने के भीतर याचिकाकर्ता को मूल प्रमाण पत्र सौंपने का आदेश
हाई कोर्ट के जस्टिस बुडी हाबुंग की एकल पीठ ने वालिया मुर्शिदा हुदा बनाम असम राज्य और अन्य’ मामले में रिट याचिका को स्वीकार करते हुए असम मेडिकल कॉलेज, डिब्रूगढ़ के प्रिंसिपल को दो महीने के भीतर याचिकाकर्ता को मूल प्रमाण पत्र सौंपने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल सीबीआई (CBI) जांच या किसी आपराधिक मामले के लंबित होने मात्र से किसी डॉक्टर की मूल एमबीबीएस पासिंग सर्टिफिकेट (MBBS Pass Certificate) को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता, बशर्ते उसने अपना कोर्स, वैधानिक इंटर्नशिप और काउंसिल में विधिक पंजीकरण (Registration) पूरा कर लिया हो।
यूं लगाई गई शैक्षणिक संस्थाओं की मनमानी पर रोक
अदालत ने शैक्षणिक संस्थाओं की मनमानी पर रोक लगाते हुए अपने विधिक निष्कर्ष में कहा, “किसी आपराधिक मामले के लंबित होने मात्र को, जब तक कि अदालत द्वारा दोषसिद्धि (Adjudication of Guilt) तय न हो जाए, किसी छात्र की एमबीबीएस डिग्री या पासिंग सर्टिफिकेट को रोकने का वैध आधार नहीं माना जा सकता। विशेषकर तब, जब सरकार और कोर्ट के पुराने आदेशों के तहत उम्मीदवार ने अपना पूरा कोर्स, इंटर्नशिप और वैधानिक मेडिकल पंजीकरण भी प्राप्त कर लिया हो।”
मामला क्या था? (2007 का सीबीआई मामला और 19 साल का विधिक संघर्ष)
सीबीआई एफआईआर (CBI FIR 02/2007): यह मामला डिब्रूगढ़ के प्रतिष्ठित असम मेडिकल कॉलेज में हुए दाखिलों से जुड़ा है। वर्ष 2007 में सीबीआई ने याचिकाकर्ता वालिया मुर्शिदा हुदा और कुछ अन्य छात्रों के मेडिकल कॉलेज में दाखिले के तरीके को लेकर एक आपराधिक मामला दर्ज किया था।
सरकार और कोर्ट से मिली अनुमति: इस जांच के बावजूद, असम सरकार ने 14 अक्टूबर 2012 को एक प्रशासनिक आदेश जारी कर याचिकाकर्ता को अपना कोर्स पूरा करने की अनुमति दी। याचिकाकर्ता ने 2011 में ही अपनी पढ़ाई और 24 जनवरी 2012 को एक साल की अनिवार्य इंटर्नशिप पूरी कर ली थी।
पंजीकरण की विधिक जंग: जब डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय (Dibrugarh University) ने उन्हें नियमित पंजीकरण देने से मना किया, तो वे हाई कोर्ट पहुंचीं। हाई कोर्ट की समन्वय पीठ ने 18 मार्च 2016 को उनके पक्ष में आदेश दिया, जिसके बाद ‘असम काउंसिल ऑफ मेडिकल रजिस्ट्रेशन’ ने 1 अप्रैल 2016 को उन्हें स्थायी विधिक पंजीकरण जारी कर दिया।
डिग्री रोकने पर नया विवाद: स्थायी डॉक्टर के रूप में पंजीकरण मिलने के बाद भी कॉलेज प्रशासन ने उनकी मूल अंतिम एमबीबीएस पासिंग सर्टिफिकेट को अपने पास दबाकर रखा, जिसके खिलाफ उन्होंने 2018 में यह रिट याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण और ‘समानता का सिद्धांत’ (Principle of Parity)
जस्टिस बुडी हाबुंग ने मामले के विधिक पहलुओं की समीक्षा करते हुए दो मुख्य आधारों पर कॉलेज प्रशासन के रवैये को गलत पाया।
समानता के सिद्धांत (Parity) का उल्लंघन
सुनवाई के दौरान डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के अपने हलफनामे (Affidavit) से एक बड़ा खुलासा हुआ। विश्वविद्यालय ने स्वीकार किया कि इसी मामले में समान विधिक परिस्थितियों का सामना कर रहे दो अन्य उम्मीदवारों जुतीतरा दास और अविरल वत्स्य को उनकी मूल एमबीबीएस डिग्रियां पहले ही जारी की जा चुकी हैं। कोर्ट ने माना कि केवल याचिकाकर्ता के सर्टिफिकेट को रोके रखना पूरी तरह से भेदभावपूर्ण (Prejudicial) है और कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
कछुआ गति से चलता ट्रायल
अदालत ने नोट किया कि सीबीआई के इस आपराधिक ट्रायल में कुल 42 अभियोजन गवाह (Prosecution Witnesses) सूचीबद्ध हैं, जिनमें से 19 साल बीत जाने के बाद भी अब तक केवल 10 गवाहों से ही जिरह हो सकी है। ट्रायल के अभी कई और वर्षों तक खिंचने की पूरी संभावना है। ऐसे में किसी डॉक्टर को उसकी आजीविका और विधिक अधिकारों से अनिश्चितकाल के लिए वंचित नहीं किया जा सकता।
विधिक सारांश एवं अदालत के मुख्य निर्देश (Court’s Directives)
अदालत ने दोनों पक्षों के विधिक अधिकारों का संतुलन बनाते हुए निम्नलिखित आदेश जारी किए हैं।
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | गुवाहाटी हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश (जून 2026) |
| याचिकाकर्ता | डॉ. वालिया मुर्शिदा हुदा (असम मेडिकल कॉलेज की पूर्व छात्रा)। |
| मुख्य निर्देश | डिब्रूगढ़ मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को दो महीने के भीतर मूल फाइनल एमबीबीएस पास सर्टिफिकेट जारी करना होगा। |
| प्रशासनिक अपडेट | विश्वविद्यालय और कॉलेज प्राधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे संबंधित नियामक संस्था (Medical Regulatory Authority) के रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता के विवरण को अपडेट करें। |
| सुरक्षात्मक विधिक क्लॉज | यह पूरी प्रक्रिया और डिग्री की वैधता सीबीआई एफआईआर (02/2007) के अंतिम न्यायिक परिणाम के अधीन (Subject to the final outcome) होगी। |

