VD Savarkar: स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर द्वारा अंडमान की सेलुलर जेल में रहने के दौरान ब्रिटिश सरकार को भेजी गई दया याचिकाओं को लेकर देश में जारी राजनीतिक और विधिक बहस अब कोर्ट रूम की जिरह में तब्दील हो गई है।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर मुकदमे की सुनवाई
यह तीखी विधिक जिरह पुणे के न्यायिक मजिस्ट्रेट अमोल शिंदे की अदालत में हुई। यह गवाही सात्यकी सावरकर द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) के मुकदमे के दौरान दर्ज की गई। सावरकर के प्रपौत्र सात्यकी सावरकर (Satyaki Savarkar) ने पुणे की एक स्थानीय अदालत के समक्ष दृढ़ता से तर्क दिया है कि अंग्रेजों को भेजी गईं दया याचिकाएं किसी भी तरह से सावरकर की वीर उपाधि को कम नहीं करती हैं, क्योंकि यह उपाधि उन्हें जनता ने उनके असाधारण कार्यों के लिए दी थी, न कि किसी सरकार ने।
दया याचिका दायर करने वाला व्यक्ति ‘वीर’ नहीं हो सकता, यह कहना गलत: कोर्ट
जिरह के दौरान जब राहुल गांधी के वकील एडवोकेट मिलिंद पवार ने दया याचिकाओं का हवाला देकर सावरकर के ‘वीर’ होने पर सवाल उठाए, तो सात्यकी ने कोर्ट में कहा, यह सच है कि सावरकर ने अपनी सजा कम करने के लिए दस दया याचिकाएं दायर की थीं। लेकिन यह कहना पूरी तरह से गलत और विरोधाभासी है कि दया याचिका दायर करने वाला व्यक्ति ‘वीर’ नहीं हो सकता। ब्रिटिश काल के आधिकारिक रिकॉर्ड और प्रवासी क्रांतिकारी संगठन ‘गदर’ के प्रकाशनों से स्पष्ट है कि जब सावरकर अंडमान की जेल में थे, तब भी उन्हें ‘वीर’ कहकर ही संबोधित किया जाता था।
मानहानि का पूरा मामला क्या है? (लंदन का वो भाषण)
यह कानूनी विवाद राहुल गांधी द्वारा मार्च 2023 में लंदन में दिए गए एक भाषण से उपजा है।
राहुल गांधी का कथित दावा: राहुल गांधी ने लंदन में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए दावा किया था कि वी.डी. सावरकर ने अपनी एक किताब में लिखा है कि उन्होंने और उनके 5-6 दोस्तों ने मिलकर एक बार एक मुस्लिम व्यक्ति की पिटाई की थी और ऐसा करने में उन्हें बहुत आनंद (Pleasure) आया था।
सावरकर परिवार का विधिक रुख: सावरकर के प्रपौत्र सात्यकी ने इस दावे को पूरी तरह झूठा और मनगढ़ंत बताते हुए राहुल गांधी के खिलाफ भादंवि (IPC) की धारा 500 के तहत मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया। सात्यकी का कहना है कि सावरकर के संपूर्ण वांग्मय या किसी भी किताब में ऐसी किसी घटना का कोई जिक्र नहीं है। राहुल गांधी ने इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया और सावरकर की छवि को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया।
कोर्ट रूम जिरह: भगत सिंह से तुलना और 1913 की याचिका का सच
सुनवाई के दौरान राहुल गांधी के वकील और सात्यकी सावरकर के बीच ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर तीखी बहस हुई।
“वीर, महात्मा या नेताजी कानूनी पदवियां नहीं हैं”
सात्यकी ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि ‘वीर’, ‘स्वातंत्र्यवीर’, ‘महात्मा’ (गांधी जी के लिए) या ‘नेताजी’ (सुभाष चंद्र बोस के लिए) जैसी उपाधियां कोई औपचारिक या सरकारी विधिक पदनाम नहीं हैं। ये वे सम्मानजनक लेबल हैं जो देश की जनता ने उन लोगों को दिए जिन्हें वे असाधारण मानते थे। पूर्व की सुनवाई (1 जून) का हवाला देते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि इस उपाधि को लेकर कोई सरकारी दस्तावेज नहीं है।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का विधिक संदर्भ
जब बचाव पक्ष के वकील ने पूछा कि क्या भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने कोई रियायत नहीं मांगी थी, इसलिए उन्हें फांसी दी गई? इस पर सात्यकी ने विधिक रूप से संतुलित जवाब दिया। कहा, मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार को याचिका देकर खुद को ‘युद्धबंदी’ (Prisoner of War) मानने की मांग की थी और किसी भी तरह की रियायत लेने से इनकार किया था। लेकिन यह पूरी तरह सच है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त अंत तक अपनी विचारधारा और सिद्धांतों पर अडिग रहे। सावरकर की तरह ही, वे भी जीवन के अंतिम क्षणों तक झुके नहीं।
1913 की याचिका और आधिकारिक प्रोटोकॉल का विधिक तर्क
राहुल गांधी के वकील ने कोर्ट में सावरकर की 1913 की दया याचिका के अंश पढ़कर सुनाए, जिसमें जेल की कठोर परिस्थितियों का वर्णन था और सावरकर ने लिखा था कि यदि उन्हें रिहा किया जाता है तो वे संवैधानिक मार्ग का पालन करेंगे और ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहेंगे।
इस विधिक प्रहार का जवाब देते हुए सात्यकी ने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश शासन के तहत दया याचिका दायर करना एक स्थापित और मान्यता प्राप्त कानूनी मार्ग (Recognized Legal Route) था। अंडमान जेल में बंद अन्य कैदियों ने भी इस प्रक्रिया का उपयोग किया था, जो न तो असामान्य था और न ही अवैध। उन्होंने जोड़ा कि इस याचिका की भाषा तत्कालीन आधिकारिक विधिक प्रोटोकॉल (Official Protocol) के तहत तय थी और सावरकर ने अपनी याचिका में केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अन्य दीर्घकालिक कैदियों की रिहाई की भी मांग की थी।
विधिक सारांश और अगली रूपरेखा (Case Matrix)
| विधिक बिंदु | वर्तमान अदालती स्थिति और विवरण |
| मामला / केस टाइटल | सात्यकी सावरकर बनाम राहुल गांधी (Satyaki Savarkar v. Rahul Gandhi) |
| अदालत | न्यायिक मजिस्ट्रेट अमोल शिंदे की अदालत, पुणे। |
| शिकायत का आधार | मार्च 2023 में लंदन में दिए गए भाषण के खिलाफ आपराधिक मानहानि (IPC 500)। |
| याचिकाकर्ता का स्टैंड | मुकदमा राजनीतिक रूप से प्रेरित नहीं है, बल्कि सावरकर की विधिक और ऐतिहासिक प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए है। |
| अगली विधिक तारीख | अदालत सात्यकी सावरकर की गवाही और क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) की प्रक्रिया 1 जुलाई 2026 को जारी रखेगी। |

