Tuesday, August 4, 2026
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Travesty of Justice: बहादुरी पर इनाम देना व उसको रूटीन ड्यूटी बताना विरोधाभासी…21 साल बाद आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन की कहानी समझिए

Travesty of Justice: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने देश की प्रशासनिक कानून (Administrative Law) प्रणाली में ‘स्वीकार और अस्वीकार’ (Approbate and Reprobate) के विधिक सिद्धांत को सुदृढ़ करते हुए पुलिस विभाग की मनमानी पर कड़ा प्रहार किया है।

वर्ष 2012 की स्क्रीनिंग कमेटी के आदेश को किया रद्द

हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने सब-इंस्पेक्टर इंद्रमणि पटेल की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने वर्ष 2012 की स्क्रीनिंग कमेटी के उस आदेश को रद्द (Quash) कर दिया है, जिसने याचिकाकर्ता के आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन (Out-of-Turn Promotion) के दावे को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि इंद्रमणि पटेल को 10 फरवरी 2005 (जब एसपी ने पहली बार सिफारिश की थी) से काल्पनिक प्रभाव (Notional Effect) से ‘इंस्पेक्टर’ पद पर बैकडेटेड प्रमोशन और वरिष्ठता का लाभ दिया जाए।

सरकार की कार्रवाई विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण: अदालत

अदालत ने स्पष्ट किया है कि सरकार एक ही घटना के लिए किसी पुलिस अधिकारी को उसकी असाधारण बहादुरी के लिए नकद पुरस्कार भी दे और बाद में उसी कृत्य को रूटीन ड्यूटी (सामान्य कर्तव्य) बताकर उसका वैधानिक प्रमोशन रोक दे, यह पूरी तरह से विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण और अतार्किक (Legally Perverse) है। न्यायालय ने अपने विधिक निष्कर्ष में तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, जब ज़मीनी हकीकत देखने वाले पुलिस कप्तान (SP), डीआईजी और आईजी तीनों स्तरों से एक स्वर में आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन की सिफारिश की गई हो, तो वातानुकूलित कमरों में बैठी स्क्रीनिंग कमेटी बिना किसी ठोस और वस्तुनिष्ठ विधिक कारण के उसे खारिज नहीं कर सकती। एक ही कृत्य के लिए बहादुरी का नकद इनाम देना और उसी कृत्य को सामान्य ड्यूटी बताना प्रशासनिक विरोधाभास का चरम उदाहरण है।

जांबाजी की वो खौफनाक रात: भैंरूघाट का रेस्क्यू ऑपरेशन (2004)

यह पूरा मामला 22 साल पुराने एक ऐसे रेस्क्यू ऑपरेशन से जुड़ा है, जो आज भी मध्य प्रदेश पुलिस के इतिहास में जांबाजी की मिसाल है।

दहशत की रात (22 अप्रैल 2004): रात के करीब 11:15 बजे इंदौर से 25 किलोमीटर दूर भैंरूघाट पर ईंटों से लदा एक ट्रक अनियंत्रित होकर 200 फुट गहरी खाई में गिर गया। ट्रक एक पेड़ की ओट में अटक कर हवा में झूल रहा था, जिसमें ड्राइवर और क्लीनर मौत के मुंह में फंसे थे।

जब क्रेन ऑपरेटर डर गए: तत्कालीन सिमरौल थाना प्रभारी (SHO) और सब-इंस्पेक्टर इंद्रमणि पटेल बल के साथ मौके पर पहुंचे। खाई की गहराई और खतरे को देखकर पेशेवर क्रेन ऑपरेटरों ने नीचे उतरने से साफ मना कर दिया।

रस्सी के सहारे उतरे सिंघम: सब-इंस्पेक्टर पटेल ने बिना वक्त गंवाए खुद रस्सी बांधी और घने अंधेरे में उस जानलेवा 200 फुट गहरी खाई में उतर गए। उन्होंने न केवल दोनों नागरिकों की जान बचाई, बल्कि भारी रस्सियों से ट्रक को पेड़ से बांधा ताकि वह नीचे मुख्य सड़क पर चल रहे अन्य वाहनों पर न गिर जाए।

चौतरफा सराहना: इस वीरता के लिए स्थानीय सरपंच ने उन्हें सम्मानित किया, कलेक्टर इंदौर ने गणतंत्र दिवस पर शील्ड दी और पुलिस विभाग ने उन्हें ₹5000 का नकद पुरस्कार दिया।

विधिक विवाद: रेगुलेशन 70-ए और टाइपिंग टेस्ट की विसंगति

मध्य प्रदेश पुलिस रेगुलेशंस के रेगुलेशन 70-ए (Regulation 70-A) के तहत असाधारण वीरता, डकैत विरोधी अभियान या कानून-व्यवस्था की असाधारण स्थिति में विशिष्ट कार्य करने वाले सब-इंस्पेक्टर को इंस्पेक्टर पद पर आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन देने का विधिक प्रावधान है।

याचिकाकर्ता के वकीलों (श्री प्रवीन दुबे और सार्थक नेमा) ने कोर्ट के सामने विभाग के दोहरे रवैये को उजागर किया। जब 2011 में हाई कोर्ट ने पहली बार विभाग के इनकार को रद्द करते हुए मामले को पुनर्विचार के लिए भेजा था, तब विभाग ने 28 दिसंबर 2012 को दोबारा उनका दावा खारिज कर दिया।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने इस खारिज करने के आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए निम्नलिखित विधिक विसंगतियों को रेखांकित किया।

रूटीन ड्यूटी बनाम असाधारण वीरता: कोर्ट ने कहा कि अगर यह सामान्य रूटीन ड्यूटी होती, तो पुलिस केवल घेराबंदी करती, ट्रैफिक संभालती और आपदा प्रबंधन दल का इंतजार करती। खुद जान जोखिम में डालकर 200 फुट खाई में लटकना रूटीन ड्यूटी का हिस्सा नहीं हो सकता।

टाइपिंग टेस्ट बनाम जान की बाजी: अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया कि मध्य प्रदेश शासन ने कंप्यूटर अवेयरनेस और टाइपिंग प्रतियोगिताओं में मेडल जीतने वाले पुलिसकर्मियों को तो ‘असाधारण योग्यता’ मानकर आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन दे दिया, लेकिन एक भीषण त्रासदी को रोकने वाले जांबाज अधिकारी के कृत्य को ‘सामान्य काम’ बता दिया। कोर्ट ने इसे प्रशासनिक विवेक का पूरी तरह शून्य होना (Non-application of mind) माना।

सुप्रीम कोर्ट की नजीर (मोहम्मद आफताब मीर केस): कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘Mohd. Aftab Mir v. State of J&K (2011)’ फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि ग्राउंड जीरो पर मौजूद अधिकारियों की मजबूत सिफारिशों को दरकिनार कर उच्च अधिकारी केवल नकद इनाम देकर पल्ला झाड़ लेते हैं, तो अदालतें न्याय के हित में हस्तक्षेप करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।

20 साल बाद अब दोबारा ट्रिब्यूनल या कमेटी को नहीं भेजा जा सकता

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि आउट-ऑफ-टर्न प्रमोशन अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता और मामला दोबारा स्क्रीनिंग कमेटी को भेजा जाना चाहिए। इसे खारिज करते हुए कोर्ट ने ‘निरंजन शर्मा बनाम मप्र राज्य’ मामले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता 2005 से यानी पिछले 21 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। उसकी सेवा का एक बड़ा हिस्सा मुकदमेबाजी में बीत चुका है। ऐसे में मामले को दोबारा कमेटी के पास भेजना ‘न्याय का मज़ाक’ (Travesty of Justice) होगा।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक बिंदुमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का अंतिम विधिक आदेश (जून २०२६)
याचिकाकर्तासब-इंस्पेक्टर इंद्रमणि पटेल (तत्कालीन थाना प्रभारी, सिमरौल, इंदौर)।
प्रतिवादीमध्य प्रदेश राज्य सरकार एवं पुलिस महानिदेशक (DGP)।
रद्द आदेशस्क्रीनिंग कमेटी का आदेश दिनांक 28 दिसंबर 2012।
प्रमोशन की तिथि10 फरवरी 2005 से (काल्पनिक रूप से – Notionally) इंस्पेक्टर पद पर प्रमोट माना जाएगा।
वरिष्ठता एवं वेतन2005 से ही वरिष्ठता तय होगी और भविष्य के इन्क्रीमेंट (वेतन वृद्धि) के लिए उसी तिथि से काल्पनिक वेतन निर्धारण होगा।
वित्तीय क्लॉजचूंकि उन्होंने वास्तविक रूप से इंस्पेक्टर पद पर काम नहीं किया, इसलिए पिछले वर्षों का बैक-वेजेस (बकाया वेतन) नहीं मिलेगा, लेकिन पेंशन और भविष्य के वित्तीय लाभ मिलेंगे।
समय सीमाकोर्ट ने आदेश के अनुपालन के लिए सरकार को 60 दिनों का कड़ा समय दिया है।
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