Sunday, September 20, 2026
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Financial Capacity: दूसरी फैमिली पाल सकते हो, तो पहली को क्यों नहीं?…पति से कहा- दूसरी शादी का मतलब है कि आपके पास पैसा है

Financial Capacity: कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस गीता के.बी. की बेंच ने पारिवारिक कानून और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि एक व्यक्ति अपनी दूसरी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने में सक्षम है, तो वह पहली पत्नी, बच्चों और बूढ़ी माँ को गुज़ारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता। यह मामला एक ऐसे पति का है जो फोटो स्टूडियो में काम करता है और पुजारी भी है। उसने ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए ₹30,000 के मासिक गुज़ारा भत्ता (Maintenance) के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि: दो परिवार और एक ज़िम्मेदारी

  • दावा: पत्नी, तीन बच्चों और 74 वर्षीय माँ ने धारा 125 CrPC (अब BNSS) के तहत गुज़ारा भत्ता मांगा था।
  • पति का तर्क: पति ने दावा किया कि उसकी मासिक आय केवल ₹5,000-₹6,000 है। उसने अपने सबसे छोटे बेटे की पितृत्व (Paternity) को भी चुनौती दी और कहा कि पत्नी 15 साल पहले उसे छोड़कर चली गई थी।
  • हकीकत: पति ने दूसरी शादी कर ली थी और उससे उसके दो बच्चे थे, जिनका वह भरण-पोषण कर रहा था।

कोर्ट का ‘वित्तीय पैमाना’ (The Financial Yardstick)

  • अदालत ने पति के झूठ को पकड़ने के लिए एक व्यवहारिक तर्क दिया।
  • तार्किक निष्कर्ष (Adverse Inference): “यदि प्रतिवादी के पास वास्तव में नौकरी या आय नहीं होती, तो वह अपनी दूसरी पत्नी और दो बच्चों का भरण-पोषण नहीं कर पाता। चूंकि वह उन्हें पाल रहा है, इसका मतलब है कि उसके पास अपनी पहली फैमिली को भी पालने के लिए पर्याप्त पैसा है।”
  • बैंक रिकॉर्ड छुपाना: पति ने बैंक खाता होने की बात तो मानी, लेकिन पासबुक पेश नहीं की। कोर्ट ने इसे जानबूझकर जानकारी छुपाना माना।
  • माँ का अधिकार: कोर्ट ने दुख व्यक्त किया कि 74 वर्षीय माँ को जिंदा रहने के लिए एक मेस (Mess) में काम करना पड़ रहा था। कोर्ट ने कहा कि माँ की मामूली आय बेटे को उसकी सेवा करने के कर्तव्य से मुक्त नहीं करती।

पितृत्व और कानून (Paternity & Legitimacy)

  • पति ने अपने सबसे छोटे बेटे को अपना मानने से इनकार किया था, जिस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया।
  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023: कोर्ट ने धारा 116 (पुराने एविडेंस एक्ट की धारा 112) के तहत ‘Presumption of Legitimacy’ (वैधता की धारणा) लागू की।
  • गैर-पहुंच (Non-access) का अभाव: चूंकि शादी कायम थी और पति यह साबित नहीं कर सका कि गर्भधारण के समय उसकी पत्नी तक पहुँच नहीं थी, इसलिए बच्चे को उसी का माना गया।

संशोधित गुज़ारा भत्ता (Modified Quantum)

हालांकि कोर्ट ने पति की जिम्मेदारी तय की, लेकिन आय के दस्तावेजी सबूत न होने के कारण ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए ₹30,000 के भरण-पोषण को “अत्यधिक” (Exorbitant) माना और उसे संशोधित किया

प्राप्तकर्तासंशोधित मासिक राशि (₹)
पहली पत्नी (R1)5,000
वृद्ध माँ (R5)5,000
तीन बच्चे (R2, R3, R4)2,500 प्रत्येक (कुल ₹7,500)
कुल राशि₹17,500 प्रति माह

दूसरी शादी गुज़ारा भत्ते से बचने का आधार नहीं

कर्नाटक हाई कोर्ट का यह फैसला उन पुरुषों के लिए एक बड़ा सबक है जो दूसरी शादी कर लेते हैं और पहली पत्नी व बच्चों को बेसहारा छोड़ देते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि दूसरी शादी करना ही पहली पत्नी के लिए अलग रहने और गुज़ारा भत्ता मांगने का एक वैध कारण है। साथ ही, आपकी लाइफस्टाइल और खर्च करने की क्षमता ही आपकी असली आय का प्रमाण है, चाहे आप कागजों में उसे कितना ही कम क्यों न दिखाएं।

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