A Missing Crime: कर्नाटक हाई कोर्ट जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने इस स्थिति को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग और उत्पीड़न का हथियार करार देते हुए अतुल सदानंद कामथ के खिलाफ कार्यवाही को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने बेंगलुरू के एक 65 वर्षीय निवासी को बड़ी राहत देते हुए 30 साल पुराने एक ऐसे आपराधिक मामले को रद्द (Quash) कर दिया है, जिसका कोई भी रिकॉर्ड न तो पुलिस के पास मौजूद था और न ही अदालती दस्तावेजों में। यह मामला अतुल सदानंद कामथ का है, जिन्हें 30 साल तक पता ही नहीं था कि वे किसी केस में आरोपी हैं। उन्हें इस ‘भूतिया’ केस की जानकारी तब मिली जब वे अपना पासपोर्ट रिन्यू कराने गए।
पासपोर्ट रिन्यूअल से खुला राज
- पृष्ठभूमि: बेंगलुरू में 40 साल से रह रहे कामथ पिछले साल अपना 45 साल पुराना पासपोर्ट रिन्यू कराने के लिए आवेदन किया।
- पुलिस वेरिफिकेशन: वेरिफिकेशन के दौरान कब्बन पार्क पुलिस ने उन्हें बताया कि हलसूरु पुलिस स्टेशन में दर्ज क्राइम नंबर 755/1996 में उनका नाम एक आरोपी के रूप में दर्ज है।
- अदृश्य चार्जशीट: रिकॉर्ड के अनुसार, पुलिस ने जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर दी थी और मामला 10वें अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत में लंबित था।
रिकॉर्ड्स का गायब होना (The Missing Link)
- जब कामथ ने इस मामले की जानकारी जुटानी शुरू की, तो हैरान करने वाली बातें सामने आईं।
- पुलिस के पास जानकारी नहीं: कामथ कई बार थाने गए, लेकिन पुलिस ने हाथ खड़े कर दिए कि उनके पास 1996 के उस केस या चार्जशीट का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
- RTI और IT डेटाबेस: RTI के जरिए भी कोई जानकारी नहीं मिली। पुलिस के IT डेटाबेस में भी इस क्राइम नंबर या चार्जशीट का कोई संकेत नहीं मिला।
- लटकाती तलवार: अदालत में मामला तो दिख रहा था, लेकिन किस आधार पर और क्या आरोप थे, इसका कोई भौतिक साक्ष्य (Physical Evidence) मौजूद नहीं था।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: यह उत्पीड़न है
- जस्टिस नागप्रसन्ना ने पुलिस और व्यवस्था की इस चूक पर कड़ी टिप्पणी की।
- अकेली गवाही: “जहां अपराध के विवरण या चार्जशीट को जानने के लिए कोई रिकॉर्ड ही नहीं है, वहां दशकों पुराने इस मामले को जारी रखना याचिकाकर्ता के सिर पर लटकती तलवार की तरह होगा।”
- पुलिस की वैधानिक विफलता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस अपने वैधानिक कर्तव्य (Statutory Duty) के तहत रिकॉर्ड बनाए रखने और प्रस्तुत करने में विफल रही है, तो उसकी सजा एक नागरिक को नहीं भुगतनी चाहिए।
- प्रक्रिया का दुरुपयोग: बिना रिकॉर्ड के ट्रायल चलाना कानून का मजाक उड़ाना और व्यक्ति को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना है।
केस के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
| बिंदु | विवरण |
| याचिकाकर्ता | अतुल सदानंद कामथ (65 वर्ष)। |
| अधिनियम | प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स (बैनिंग) एक्ट, 1978। |
| पुलिस स्टेशन | हलसूरु पुलिस स्टेशन, बेंगलुरू (1996 का मामला)। |
| कोर्ट का आदेश | मामले की कार्यवाही को पूरी तरह ‘ओब्लिटरेट’ (मिटा) दिया गया। |
सिस्टम की गलती और न्याय की जीत
यह मामला भारतीय न्यायिक प्रणाली में रिकॉर्ड कीपिंग की बदहाली का एक बड़ा उदाहरण है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता को केवल ‘सिस्टम की फाइलों में दर्ज एक पुराने नंबर’ की वजह से बाधित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब सिस्टम खुद यह न बता सके कि वह नंबर किस बारे में है।

