Tuesday, June 16, 2026
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Muslim Marriage: मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी अवैध नहीं…5 वीं शादी करने पर ही चलेगा द्विविवाह का मुकदमा, यह है मामला

Muslim Marriage: गुवाहाटी हाई कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ और देश के नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के बीच टकराव को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक विधिक व्यवस्था दी है।

एक मुस्लिम पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को किया खारिज

हाई कोर्ट के जस्टिस मृदुल कुमार कलिता की एकल पीठ ने अपने फैसले में एक मुस्लिम पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को पूरी तरह खारिज (Quash) कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी मुस्लिम पुरुष पर द्विविवाह का मुकदमा केवल तभी चलाया जा सकता है, जब वह अपनी पहले से मौजूद चार पत्नियों के रहते हुए, किसी को तलाक दिए बिना पांचवीं शादी (Fifth Marriage) करता है, क्योंकि पर्सनल लॉ के तहत केवल पांचवीं शादी ही ‘शून्य’ (Void) मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चूंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक पुरुष को एक साथ चार पत्नियां रखने की अनुमति देता है, इसलिए किसी मुस्लिम व्यक्ति द्वारा की गई दूसरी शादी बीएनएस के तहत ‘द्विविवाह’ (Bigamy) का अपराध नहीं मानी जा सकती।

नए विधिक प्रावधानों की व्याख्या की

अदालत ने नए विधिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए अपने आदेश में कहा, “याचिकाकर्ता पर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 82 के तहत केवल तभी मुकदमा चलाया जा सकता है, जब वह अपनी पूर्व की चार पत्नियों के जीवनकाल के दौरान, उनमें से किसी को तलाक दिए बिना पांचवीं शादी करता है, क्योंकि ऐसी शादी कानूनन शून्य होगी। इसी कारण से, बीएनएस की धारा 83 के प्रावधान भी लागू नहीं होंगे, क्योंकि मुस्लिम पुरुष पर लागू होने वाले पर्सनल लॉ के तहत उसकी दूसरी शादी कोई अवैध या गैर-कानूनी विवाह नहीं है।”

कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि: पत्नी के आरोपों पर पुलिस की चार्जशीट

यह मामला धुबरी (असम) के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) की अदालत में लंबित एक आपराधिक मामले से जुड़ा था।

पत्नी की शिकायत (2025): एक मुस्लिम महिला ने ४ अगस्त २०२५ को गौरीपुर पुलिस स्टेशन में प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसका पति उसे प्रताड़ित करता था और उसके रहते हुए पति ने उसी दिन (४ अगस्त २०२५) दूसरी महिला से शादी कर ली, जो कि द्विविवाह का अपराध है।

पुलिस की चार्जशीट: पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद पति के खिलाफ बीएनएस, 2023 की धारा 82(2) और 83 (जो कपटपूर्ण और अवैध विवाह से संबंधित अपराधों को संबोधित करती हैं) के तहत आरोप पत्र (Charge-sheet) दाखिल कर दिया था, जिसे पति ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट रूम बहस: क्या पहली शादी छुपाना अपराध है?

सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों ने अपने-अपने विधिक तर्क पेश किए।

पति के वकील का तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ता एच.आर.ए. चौधरी ने दलील दी कि बीएनएस की धारा 82 केवल तभी लागू होती है जब कानूनन दूसरी शादी ‘शून्य’ (Void) हो। चूंकि मुस्लिम पर्सनल लॉ चार शादियों की इजाजत देता है, इसलिए दूसरी शादी स्वतः शून्य नहीं होती और यह धारा यहाँ लागू ही नहीं हो सकती।

पत्नी के वकील का तर्क: पत्नी के वकील बी. शर्मा ने तर्क दिया कि भले ही पर्सनल लॉ दूसरी शादी की अनुमति देता हो, लेकिन यह पति का नैतिक और कानूनी दायित्व है कि वह दूसरी पत्नी को अपनी पहली शादी के बारे में सूचित करे। ऐसा न करने पर (पहली शादी छुपाने पर) उस पर धारा 82(2) (जिसमें पहली शादी छुपाकर दोबारा शादी करने पर 10 साल तक की जेल का प्रावधान है) के तहत मुकदमा चलना चाहिए।

सरकारी वकील का रुख: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) के. बैश्य ने अदालत का ध्यान ‘असम कंपलसरी रजिस्ट्रेशन ऑफ मुस्लिम मैरिजेस एंड डिवोर्स एक्ट, 2024’ की ओर खींचा, जिसके तहत मुस्लिम विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि पति की दूसरी शादी इस कानून के तहत पंजीकृत थी, हालांकि उन्होंने निष्पक्ष रूप से यह स्वीकार किया कि महज पंजीकरण न होने से कोई शादी कानूनी रूप से शून्य नहीं हो जाती।

विधिक विश्लेषण: IPC 494 बनाम BNS 82 और हाई कोर्ट का निष्कर्ष

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट और केरल हाई कोर्ट के पिछले ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए बीएनएस की धाराओं का विस्तृत विश्लेषण किया।

बीएनएस, 2023 की धाराकानूनी प्रावधान और दायरागुवाहाटी हाई कोर्ट की विधिक व्याख्या
धारा 82(1) (पुरानी IPC 494)जीवनसाथी के जीवित रहते दोबारा शादी करना (द्विविवाह/Bigamy)।इसके लिए अनिवार्य शर्त है कि पहली शादी के रहते की गई दूसरी शादी कानूनन शून्य (Void) होनी चाहिए। मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी शून्य नहीं होती, इसलिए यह लागू नहीं होगी।
धारा 82(2)पिछली शादी की बात छुपाकर (Concealment) दोबारा विवाह करना।कोर्ट ने साफ किया कि धारा 82(2) के तहत अपराध तभी बन सकता है जब धारा 82(1) की बुनियादी शर्तें (यानी शादी का शून्य होना) पूरी होती हों। अतः यह भी लागू नहीं होगी।
धारा 83 (पुरानी IPC 496)यह जानते हुए कि विवाह कानूनी नहीं है, बेईमानी से विवाह की रस्म पूरी करना।चूंकि मुस्लिम पुरुष की दूसरी शादी पर्सनल लॉ में ‘अवैध’ नहीं है, इसलिए धारा 83 के तहत भी कोई अपराध नहीं बनता।
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