Wednesday, September 30, 2026
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Divorce Case: कानून के छात्र ने कहा-केवल पत्नियां तलाक की हकदार, पुरुष क्यों नहीं…इस पर सुप्रीम जवाब सुनकर आप चौंकेंगे, पढ़ें रोचक केस

Divorce Case: सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के एक विशिष्ट प्रावधान को चुनौती देनेवाले जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

विवरणतथ्य
चुनौतीपूर्ण धाराहिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(2)(iii)।
याचिका का आधारलैंगिक समानता (Gender Equality) की मांग।
कोर्ट का आधारअनुच्छेद 15(3) – महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान वैध हैं।
परिणामजनहित याचिका (PIL) पूरी तरह खारिज।
न्यायाधीशसीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची।

पीआईएल में तलाक के केस में महिला अधिकार पर था सवाल

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता की खिंचाई करते हुए स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत विवादों को सुलझाने के लिए जनहित याचिका का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान केवल पत्नियों को इस आधार पर तलाक मांगने का अधिकार देता है कि भरण-पोषण (Maintenance) की डिक्री पारित होने के बाद एक साल तक सहवास (Cohabitation) फिर से शुरू नहीं हुआ है। यह याचिका हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(2)(iii) के खिलाफ दायर की गई थी। यह धारा विशेष रूप से महिलाओं को यह अधिकार देती है कि यदि पति के खिलाफ भरण-पोषण का आदेश होने के बाद एक साल तक वे साथ नहीं रहे हैं, तो पत्नी तलाक की अर्जी दे सकती है।

लैंगिक समानता बनाम विशेष प्रावधान

  • याचिकाकर्ता, जो स्वयं एक कानून का छात्र है, ने तर्क दिया कि इस प्रावधान में “लैंगिक समानता” (Gender Parity) होनी चाहिए और यह पुरुषों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इसे संवैधानिक रूप से सही ठहराया।
  • अनुच्छेद 15(3) का संरक्षण: जस्टिस बागची ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए “विशेष प्रावधान” बनाने की अनुमति देता है।
  • विशेष कानून: कोर्ट ने कहा कि यह एक विशेष कानून है जिसे महिलाओं के संरक्षण के लिए बनाया गया है, और इसे केवल इसलिए असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह पुरुषों को समान अधिकार नहीं देता।

निजी पीड़ा को PIL का रूप देना

  • सुनवाई के दौरान जब सीजेआई ने याचिकाकर्ता से पूछा कि उन्हें इस प्रावधान से क्या समस्या है, तो याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि वह स्वयं एक वैवाहिक विवाद का सामना कर रहे हैं।
  • अदालत की फटकार: सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, “यही वह बात थी जिसे मैं आपसे कबूल करवाना चाहता था। हमें आप पर भारी जुर्माना क्यों नहीं लगाना चाहिए? व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए अनुच्छेद 32 (रिट क्षेत्राधिकार) का सहारा न लें।”
  • छात्रों को संदेश: कोर्ट ने याचिकाकर्ता के कानून के छात्र होने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं कानून के छात्रों के लिए अच्छा संदेश नहीं देतीं।

कोर्ट की सहानुभूति और कड़ा संदेश

  • पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि उनकी अपनी कुछ वास्तविक शिकायतें हो सकती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे कानून की पूरी योजना को ही चुनौती दे दें।
  • संतुलित दृष्टिकोण: सीजेआई ने कहा, “हमें आपके प्रति सहानुभूति है, लेकिन हमें आपकी अलग रह रही पत्नी के प्रति भी सहानुभूति है।”
  • पुरुष अधिकारों के स्वयंभू नेता: कोर्ट ने याचिकाकर्ता से तीखे सवाल पूछे कि क्या वे “पुरुष अधिकारों के स्वयंभू नेता” हैं जो व्यक्तिगत लाभ के लिए अदालती प्रक्रिया का उपयोग कर रहे हैं।

व्यक्तिगत विवाद और जनहित का अंतर

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि जनहित याचिका (PIL) का उपयोग सार्वजनिक मुद्दों के लिए होना चाहिए, न कि किसी के व्यक्तिगत वैवाहिक विवाद को “कानूनी सुधार” का मुखौटा पहनकर पेश करने के लिए। इसके अलावा, महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बने विशेष कानूनी प्रावधानों को केवल ‘लैंगिक भेदभाव’ के आधार पर तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक वे संवैधानिक दायरे के भीतर हैं।

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