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Great Nicobar Project: एक ही व्यक्ति के 60 हस्ताक्षर-एक जैसी भाषा पर सवाल…बाहरी लोगों की सहमति को आदिवासियों की मंजूरी कैसे, जानिए इस केस को

Great Nicobar Project: कलकत्ता हाई कोर्ट की पोर्ट ब्लेयर बेंच में ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट (Great Nicobar Project) को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी चुनौती पेश की गई है।

विवाद का मुख्य केंद्र 166.10 वर्ग किमी वन भूमि का डायवर्जन

पूर्व केंद्रीय सचिव मीना गुप्ता द्वारा दायर इस जनहित याचिका (PIL) में आरोप लगाया गया है कि परियोजना के लिए वन भूमि डायवर्जन हेतु आदिवासियों की सहमति लेने की प्रक्रिया में भारी अनियमितताएं और धोखाधड़ी हुई है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए इस याचिका पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है। विवाद का मुख्य केंद्र 166.10 वर्ग किमी वन भूमि का डायवर्जन है। प्रशासन का दावा है कि उन्होंने वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत आदिवासियों की सहमति प्राप्त कर ली है, लेकिन याचिकाकर्ता ने साक्ष्यों के साथ इसे चुनौती दी है।

एक ही समय पर तीन जगह ‘उपस्थिति’: हस्ताक्षरों का खेल

  • प्रशासन ने 12 अगस्त, 2022 को कैंपबेल बे, गोविंद नगर और लक्ष्मी नगर में हुई तीन ग्राम सभाओं के प्रस्ताव सौंपे थे। याचिकाकर्ता ने विश्लेषण के बाद निम्नलिखित चौंकाने वाले तथ्य रखे:
  • समान हस्ताक्षर: प्रशासन के अपने दस्तावेजों के अनुसार, कम से कम 60 लोगों के नाम और हस्ताक्षर दो या तीनों ग्राम सभाओं के प्रस्तावों में पाए गए।
  • असंभव समय: ये सभाएं एक ही दिन सुबह 10:30, 11:00 और 11:30 बजे अलग-अलग स्थानों पर हुईं। एक ही व्यक्ति का इतनी कम समय अवधि में तीनों जगहों पर उपस्थित होकर हस्ताक्षर करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
  • एक जैसी भाषा: तीनों प्रस्तावों की भाषा शब्द-दर-शब्द एक जैसी (Identical) है, जो इनके पूर्व-नियोजित होने का संकेत देती है।

सेटलर्स बनाम आदिवासी (The Tribal Consent Issue)

  • याचिका का सबसे गंभीर कानूनी बिंदु यह है कि जिन लोगों ने प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए, वे निकोंबारी या शोंपेन जनजाति के नहीं थे।
  • बाहरी लोग (Settlers): हस्ताक्षर करने वाले मुख्य रूप से ‘सेटलर्स’ हैं (मुख्य भूमि से आए पूर्व सैनिक और नागरिक)। FRA, 2006 के तहत आदिवासियों की वन भूमि के डायवर्जन पर सहमति देने का अधिकार केवल संबंधित जनजातियों को है, बाहरी निवासियों को नहीं।
  • प्रतिनिधित्व का अभाव: प्रशासन का दावा था कि ‘अंडमान आदिम जनजाति विकास समिति’ ने शोंपेन जनजाति का प्रतिनिधित्व किया। याचिकाकर्ता ने इसे गलत बताते हुए कहा कि कोई भी संगठन किसी विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) की ओर से सहमति देने का कानूनी अधिकार नहीं रखता।

समितियों के गठन में अवैधता

  • FRA के तहत ग्राम सभा के प्रस्तावों की जांच के लिए उप-मंडलीय स्तरीय समिति (SDLC) का गठन अनिवार्य है।
  • अधूरा कोरम: कानून के अनुसार SDLC में अनुसूचित जनजाति समुदाय के दो सदस्य होने चाहिए। याचिका में बताया गया कि इस समिति में केवल एक आदिवासी सदस्य था, जबकि अन्य दो सदस्य पंचायती राज संस्थाओं से थे।
  • देरी से गठन: FRA लागू होने के 14 साल बाद और ग्राम सभा आयोजित होने के मात्र दो महीने पहले इन समितियों का गठन किया गया, जो प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल उठाता है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुविवरण
प्रोजेक्ट का दायरा166.10 वर्ग किमी वन भूमि का डायवर्जन।
मुख्य आरोपफर्जी ग्राम सभा प्रस्ताव और हस्ताक्षरों का दोहराव।
कानूनी उल्लंघनवन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 का उल्लंघन।
प्रभावित जनजातियांनिकोबारी और शोंपेन (PVTG)।
कोर्ट की स्थितिमुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल की पीठ सुनवाई के लिए सहमत।

पर्यावरण बनाम विकास की बहस

ग्रेट निकोबार परियोजना रणनीतिक और आर्थिक रूप से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन कलकत्ता हाई कोर्ट के सामने आए ये तथ्य दर्शाते हैं कि विकास की दौड़ में कानूनी प्रक्रियाओं और स्वदेशी समुदायों के अधिकारों की अनदेखी की गई है। यदि ये आरोप सिद्ध होते हैं, तो परियोजना की वन क्लीयरेंस (Forest Clearance) संकट में पड़ सकती है।

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