Sunday, May 17, 2026
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Shiv Sena Split: यहां तारीख मांगते हैं, बाहर कहते हैं कि कोर्ट फैसला नहीं कर रहा…शिवसेना (UBT) विवाद में तारीख मांगने पर सुप्रीम फटकार की खबर जरूर पढ़ें

Shiv Sena Split: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान शिवसेना के उद्धव बालासाहेब ठाकरे (UBT) गुट को कड़ी चेतावनी दी है।

शिवसेना विवाद के फैसले में जानबूझकर देरी का लग रहा था आरोप

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक तरफ अदालत के भीतर वकील तारीखें मांगते हैं या स्थगन (Adjournment) का अनुरोध करते हैं, और दूसरी तरफ बाहर जाकर राजनेता जनता के बीच अदालतों की छवि धूमिल करते हैं। ऐसा दोहरा आचरण (Conduct) बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने मीडिया में शीर्ष अदालत के खिलाफ दिए जा रहे उन बयानों पर तीखी नाराजगी जताई, जिनमें न्यायपालिका पर शिवसेना विवाद (Shiv Sena Split Dispute) के फैसले में जानबूझकर देरी करने का आरोप लगाया जा रहा था।

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विधायकों की अयोग्यता याचिका पर सुनवाई

यह पूरा कानूनी विवाद जून 2022 में शिवसेना के विभाजन, एकनाथ शिंदे गुट को वास्तविक पार्टी के रूप में मान्यता देने और महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा दोनों पक्षों के विधायकों की अयोग्यता याचिकाएं खारिज करने के फैसलों से जुड़ा है। इसके खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया हुआ है।

कोर्ट की सख्त हिदायत: अपने लोगों को मीडिया में जाने से रोकें

  • जब कोर्ट में सुनवाई के दौरान उद्धव गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत ने अंतिम सुनवाई के लिए तारीख तय करने का अनुरोध किया, तो सीजेआई सूर्या कांत भड़क गए।
  • गैर-जिम्मेदाराना आचरण: “पहले आप अपने लोगों को मीडिया में जाकर गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी करने से रोकें। आप यहाँ कोर्ट में खुद तारीख मांगते हैं और फिर बाहर जाकर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट फैसला नहीं कर रहा है। हम चेतावनी जारी कर रहे हैं। अपने शब्दों के चयन में सावधानी बरतें।”
  • दबाव बनाने की कोशिश नामंजूर: “मैं इस तरह का आचरण स्वीकार करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ। यहाँ आप बहस नहीं करना चाहते, और बाहर बयानबाजी करते हैं। यदि कोई राजनीतिक दल यह सोचता है कि वह मीडिया के जरिए अदालत पर दबाव बना सकता है, तो यह कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
    काम का भारी दबाव: “हम शाम 4 बजे तक खाली नहीं बैठते”

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हम यहाँ हर रोज शाम 4 बजे तक बैठते हैं…

  • अदालतों पर बढ़ते मुकदमों के बोझ और जजों के कार्यघंटों को रेखांकित करते हुए पीठ ने गंभीर टिप्पणी की।
  • न्यायिक समय सारिणी: “हम यहाँ हर रोज शाम 4 बजे तक बैठते हैं और मुकदमों का निपटारा करते हैं। अगर कोई हमें खाली बैठा हुआ देखता है, तब तो हम उसकी शिकायत समझ सकते हैं। हम जानते हैं कि एक ही तारीख पर सभी मामलों को विस्तार से नहीं सुना जा सकता, इसलिए हम हर चीज को एडजस्ट (सामंजस्य) करते हुए चलते हैं।”
  • तत्काल बहस का ऑफर: जब वकील ने कहा कि वे पिछले तीन साल से इंतजार कर रहे हैं और जल्द सुनवाई चाहते हैं, तो बेंच ने कहा कि वे आज (शुक्रवार को) ही बहस शुरू करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, वकीलों ने अपनी दलीलें पूरी करने के लिए कम से कम दो घंटे का समय मांगा, जिसके चलते आज तुरंत बहस शुरू नहीं हो सकी।

वकीलों ने खुद को बयानों से किया अलग

इस तीखी बहस के बीच दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों उद्धव गुट की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत और मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कोर्ट रूम के बाहर राजनेताओं द्वारा दिए जा रहे बयानों से खुद को पूरी तरह अलग (Distance) कर लिया
दोनों ही वरिष्ठ वकीलों ने स्वीकार किया कि कोर्ट ने हमेशा सभी पक्षों को सुनने में अत्यधिक धैर्य और उदारता दिखाई है। राजनेताओं द्वारा न्यायपालिका की आलोचना किया जाना किसी भी तरह से उचित या स्वीकार्य नहीं है।

मुख्य हाइलाइट्स (Quick Case Summary)

कानूनी पहलूविवरण
सुप्रीम कोर्ट की पीठमुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची।
मूल विवादजून 2022 का शिवसेना विभाजन, ‘तीर-कमान’ प्रतीक चिन्ह और विधायकों की अयोग्यता का मामला।
कोर्ट की आपत्तिअदालती कार्यवाही को लंबित बताकर मीडिया में की जा रही राजनीतिक बयानबाजी।
अगली सुनवाई की तिथिअदालत ने दोनों पक्षों के वकीलों के आपसी अनुरोध पर अंतिम बहस के लिए 30 जुलाई 2026 की तारीख तय की है।

30 जुलाई 2026 को होगी अंतिम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों गुटों को साफ निर्देश दिया है कि अगली तारीख पर वे पूरी तैयारी के साथ आएं और कोर्ट का समय बर्बाद न करें। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि 30 जुलाई 2026 को जब अदालतें ग्रीष्मकालीन अवकाश (Summer Vacation) के बाद सुचारू रूप से खुलेंगी, तब इस मामले को प्राथमिकता पर सुना जाएगा। अदालत ने राजनेताओं को कड़ा संदेश दिया है कि न्याय की प्रक्रिया को मीडिया ट्रायल या राजनीतिक भाषणों के जरिए प्रभावित नहीं किया जा सकता।

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