Sunday, October 4, 2026
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Attendance Matter: शून्य उपस्थिति और अटेंडेंस में कमी के अंतर को लॉ स्टूडेंट्स के एक केस में समझिए…सभी छात्रों को यह केस जरूर पढ़ना चाहिए

Attendance Matter: एक भी क्लास न लेने वाले लॉ स्टूडेंट्स को अटेंडेंस नियमों में ढील का फायदा नहीं: दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ (Division Bench) ने कानून (Law) के छात्रों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है।

‘अमन बंसल बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय’ मामले में सुनवाई

यह निर्णय मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय (Devendra K Upadhyaya) और जस्टिस तेजस कारिया (Justice Tejas Karia) की पीठ ने ‘अमन बंसल बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय’ मामले में छात्र की अपील को खारिज करते हुए दिया। छात्र ने पिछले सेमेस्टर की कक्षाएं और परीक्षाएं छोड़े बिना सीधे अगले सेमेस्टर में प्रवेश (Promotion) की मांग की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जो छात्र पूरे सेमेस्टर में एक भी कक्षा (Class) में शामिल नहीं हुए हैं, वे अटेंडेंस (उपस्थिति) नियमों में ढील का कोई लाभ नहीं पा सकते। अदालत ने कहा कि शून्य उपस्थिति (0% Attendance) और ‘अटेंडेंस में कमी’ (Shortage of Attendance) दो पूरी तरह अलग बातें हैं।

सुशांत रोहिल्ला मामले के ऐतिहासिक फैसले की व्याख्या

  • छात्र ने दिल्ली हाई कोर्ट के ही एक प्रसिद्ध पुराने फैसले ‘इन री सुशांत रोहिल्ला’ (In Re Sushant Rohilla) का हवाला देकर राहत मांगी थी, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि अटेंडेंस कम होने के बावजूद छात्रों को परीक्षा देने से नहीं रोका जाना चाहिए। इस पर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर स्पष्ट किया।
  • 0% अटेंडेंस बनाम कम अटेंडेंस: कोर्ट ने कहा कि सुशांत रोहिल्ला मामला उन छात्रों के लिए था जिनकी अटेंडेंस अनिवार्य प्रतिशत से कम रह गई थी। यह लाभ उन छात्रों को बिल्कुल नहीं दिया जा सकता जिनकी उपस्थिति शून्य (Nil) रही हो।
  • सेमेस्टर को बायपास करने की अनुमति नहीं: कोर्ट के शब्दों में, अपीलकर्ता को सुशांत रोहिल्ला के फैसले का सहारा लेकर एक भी क्लास अटेंड किए बिना पूरे सेमेस्टर को बायपास (छोड़ने) करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 0% अटेंडेंस और अटेंडेंस शॉर्टेज के मामलों में कोई समानता नहीं है।

छात्र का मामला और टाइमलाइन (Case Background)

  • मई-जून 2025: छात्र को कम अटेंडेंस के कारण सेमेस्टर-II (Semester-II) की परीक्षा से रोक दिया गया था। हालांकि, दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की शिकायत समिति के समक्ष मामला लंबित होने के कारण उसे अनंतिम (Subject to outcome) रूप से परीक्षा में बैठने दिया गया।
  • दिसंबर 2025: सेमेस्टर-II का परिणाम रोक दिया गया और छात्र को सेमेस्टर-III में प्रोमोट नहीं किया गया, जिसके कारण वह दिसंबर 2025 में हुई सेमेस्टर-III की परीक्षाओं में शामिल नहीं हो सका।
  • जनवरी 2026: छात्र ने दोबारा सेमेस्टर-II में पुनर्निवेश (Re-admission) लिया और कक्षाएं लेना शुरू किया।
  • मार्च 2026: छात्र ने हाई कोर्ट का रुख किया और “अकादमिक निरंतरता” (Academic Continuity) के आधार पर सीधे सेमेस्टर-IV (चौथे सेमेस्टर) में प्रवेश की मांग की। सिंगल जज (Single Judge) द्वारा याचिका खारिज होने के बाद उसने इस खंडपीठ में अपील की थी।

कोर्ट का सख्त रुख: परिस्थितियां जो भी हों, क्लास जरूरी

हाई कोर्ट ने कहा कि भले ही किसी छात्र को उसकी गलती के बिना (परिस्थितियों के वश) किसी सेमेस्टर में प्रवेश न मिला हो, फिर भी वह पिछले सेमेस्टर की पढ़ाई और परीक्षा पूरी किए बिना अगले सेमेस्टर का दावा नहीं कर सकता। इसके अलावा, कोर्ट ने छात्र द्वारा कानूनी कदम उठाने में की गई देरी पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने नोट किया कि जब छात्र को सेमेस्टर-III में बैठने से रोका गया था, तब वह अदालत नहीं आया। उसने सेमेस्टर-III को समाप्त होने दिया, सेमेस्टर-II में दोबारा दाखिला लिया और तब कोर्ट आया जब सेमेस्टर-IV पहले ही शुरू हो चुका था।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य कानूनी बिंदुदिल्ली उच्च न्यायालय का रुख
माननीय न्यायाधीशचीफ जस्टिस देवेंद्र के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया
मूल सिद्धांतशून्य उपस्थिति (0% Attendance) वाले छात्र अकादमिक लाभ या प्रोमोशन के हकदार नहीं हैं।
प्रतिवादी पक्षदिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI)
अंतिम निर्णयछात्र की अपील पूरी तरह खारिज; सिंगल जज का राहत न देने का फैसला बरकरार।

कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के उन कड़े नियमों का समर्थन करता है जो कानूनी शिक्षा में नियमित कक्षाओं की महत्ता को रेखांकित करते हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पेशेवर कोर्स (जैसे LLB) में केवल परीक्षाओं में बैठ जाना ही काफी नहीं है, बल्कि कक्षाओं में शामिल होकर ली जाने वाली औपचारिक शिक्षा अनिवार्य है।

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