Nationwide Directions: भारत में मेडिकल शिक्षा के स्तर और क्रिटिकल केयर (ICU) सुविधाओं की बदहाली पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और चिंताजनक रुख अपनाया है।
आईसीयू के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए कई बड़े देशव्यापी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने देश में आईसीयू के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए कई बड़े देशव्यापी निर्देश (Nationwide Directions) जारी किए हैं। कोर्ट ने इंडियन नर्सिंग काउंसिल (INC) के उस नियम पर गहरी हैरानी और नाराजगी जताई, जो नर्सिंग कॉलेजों को आईसीयू (ICU) सुविधा वाले अस्पतालों से 30 किलोमीटर तक की दूरी पर खोलने की इजाजत देता है।
कोर्ट रूम की तल्ख टिप्पणी: “यह अंतरात्मा को झकझोरने वाला है”
- सुनवाई के दौरान जब कोर्ट को बताया गया कि नर्सिंग के छात्रों को व्यावहारिक (Practical) ट्रेनिंग के लिए रोज आईसीयू जाना होता है, लेकिन नियम के मुताबिक कॉलेज से अस्पताल 30 किमी दूर हो सकता है, तो बेंच का गुस्सा फूट पड़ा।
- छात्रों के साथ अत्याचार: जस्टिस अमानुल्लाह ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा, “क्या छात्र हर दिन अस्पताल जाने के लिए 40-50 किमी का सफर तय करेगा? यह दिशानिर्देश कैसे अस्तित्व में आया? यह सिस्टम के साथ धोखाधड़ी के अलावा और कुछ नहीं है। यह अत्याचारपूर्ण है और इस कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोरने वाला (Shocking to the conscience) है।”
- बिना प्रैक्टिकल अनुभव के मरीजों की जान को खतरा: कोर्ट ने आदेश में लिखा कि नर्सिंग के छात्रों को कोर्स के अंत में असली मरीजों (Real Patients) पर काम करना होता है। बिना वास्तविक क्लिनिकल एक्सपोजर और व्यावहारिक अनुभव के, उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती।
- 1 किलोमीटर का दायरा हो: कोर्ट ने साफ किया कि आदर्श स्थिति में नर्सिंग कॉलेज अस्पताल से जुड़े होने चाहिए, और यदि ऐसा नहीं है, तो आईसीयू अस्पताल कॉलेज के 1 किलोमीटर के दायरे में होना चाहिए। कोर्ट ने नर्सिंग काउंसिल से ऐसे 800 कॉलेजों की रिपोर्ट मांगी है।
ICU सुविधाओं को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 5 बड़े निर्देश
- अदालत ने देश में क्रिटिकल केयर इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए एक विस्तृत गाइडलाइन (Guidelines for Organisation and Delivery of Intensive Care Services) को मंजूरी दी है।
- ICU का थ्री-टियर वर्गीकरण (Level I, II, III): देश के सभी आईसीयू को तीन श्रेणियों Level I, Level II और Level III में बांटा जाएगा। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 2 महीने के भीतर अपने अस्पतालों का ‘गैप असेसमेंट’ (कमी का मूल्यांकन) पूरा करना होगा और कम से कम ‘Level I’ (शुरुआती आपातकालीन आपात चिकित्सा) के न्यूनतम मानकों को तुरंत लागू करना होगा।
- GPS-आधारित नेशनल ग्रिड और टेली-आईसीयू: केंद्र सरकार को एक राष्ट्रव्यापी GPS-आधारित सिस्टम बनाने को कहा गया है, जो रीयल-टाइम में यह मैप करेगा कि किस अस्पताल में कितने आईसीयू बेड खाली हैं, ताकि आपातकालीन स्थिति में मरीजों को तुरंत सही जगह ट्रांसफर किया जा सके। डिजिटल कम्युनिकेशन ग्रिड के जरिए Tele-ICU और ऑनलाइन कंसल्टेशन को बढ़ावा दिया जाएगा।
- कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) से फंडिंग: अस्पतालों के बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए राज्यों को CSR फंड, एनजीओ (NGO) और सार्वजनिक दान से मदद लेने का सुझाव दिया गया है। हालांकि, कोर्ट ने आगाह किया कि इस फंड की ‘रिंग-फेंसिंग’ होगी, यानी इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ आईसीयू इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ही किया जा सकेगा।
- हर जिले में वेंटिलेटर एम्बुलेंस: राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे दान में मिले फंड के जरिए हर जिले में कम से कम 5 पूरी तरह से सुसज्जित एम्बुलेंस (Ventilator Support और प्रशिक्षित स्टाफ के साथ) बनाए रखने की व्यवहार्यता (Feasibility) की जांच करें।
- राइट टू लाइफ (Article 21) का हिस्सा है हेल्थकेयर: सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि देश की बढ़ती आबादी के कारण स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी दबाव है और गंभीर स्थिति में मरीजों को स्टेबल (स्थिर) करने के लिए सुविधाओं की भारी कमी है। कोर्ट ने याद दिलाया कि स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच संविधान के आर्टिकल 21 (Right to Life) का सीधा हिस्सा है और सरकारें इससे पीछे नहीं हट सकतीं।
मामले का अंतिम निष्कर्ष (Case Takeaways at a Glance)
| मुख्य पहलू | सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और आदेश |
| नर्सिंग कॉलेजों पर कड़ाई | बिना नजदीकी (1 KM के भीतर) आईसीयू अस्पताल के चल रहे फर्जीवाड़े जैसे नियमों पर रोक लगेगी; 800 कॉलेजों की दूरी की जांच होगी। |
| आदेश का दायरा | यह आदेश किसी एक राज्य के लिए नहीं बल्कि पूरे देश (Nationwide) के लिए अनिवार्य है। |
| फंडिंग का नया जरिया | सरकारी बजट के अलावा CSR और पब्लिक डोनेशन का इस्तेमाल विशेष रूप से आईसीयू के लिए करने की छूट। |
| अगली सुनवाई | यह मामला अब अगस्त 2026 में सुना जाएगा, जब कोर्ट द्वारा नियुक्त कमेटी अपनी अंतिम सिफारिशें पेश करेगी। |
निष्कर्ष (Analysis Summary)
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के दो सबसे कमजोर छोरों पर प्रहार करता है— पहला, कागजी नर्सिंग कॉलेज जो बिना व्यावहारिक ट्रेनिंग के नर्सें तैयार कर रहे हैं, और दूसरा, देश के सरकारी अस्पतालों में आईसीयू और एम्बुलेंस की भारी किल्लत। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि जीवन के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सरकार को न केवल डॉक्टरों-नर्सों की पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारनी होगी, बल्कि तकनीक (GPS और टेली-मेडिसिन) का इस्तेमाल कर हर नागरिक तक आपातकालीन चिकित्सा पहुंचानी होगी।

