Saturday, August 15, 2026
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No-Sense Driving: भारत में लेन ड्राइविंग की कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं है…तभी तो अधिकांश मौत में यही अहम वजह है, ट्रैफिक पर यह बड़ी टिप्पणी पढ़ें

No-Sense Driving: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में सड़क सुरक्षा और यातायात अनुशासन पर एक बहुत ही सटीक और सख्त टिप्पणी की है।

मामले का सारांश (Quick Highlights)

मुख्य बिंदुसुप्रीम कोर्ट का निर्देश / टिप्पणी
लेन ड्राइविंगभारत में इसका कोई कॉन्सेप्ट नहीं है; सरकार इसे प्राथमिकता दे।
ट्रैकिंग डिवाइस1% से कम वाहनों में होना चिंताजनक; ‘वाहन’ पोर्टल से लिंक करना अनिवार्य।
नया नियमबिना VLTD और पैनिक बटन के फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा।
डेडलाइनरोड सेफ्टी बोर्ड के गठन के लिए 3 महीने का अंतिम समय।
स्पीड कंट्रोलस्पीड गवर्नर्स के लिए सभी राज्यों को ताज़ा हलफनामा देना होगा।

भारतीय सड़कों की जमीनी हकीकत पर सवाल उठाया

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ‘एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ’ मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें कोर्ट समय-समय पर सड़क सुरक्षा नियमों को लागू करने के निर्देश दे रहा है। कोर्ट ने कहा कि भारत में प्रभावी रूप से “लेन ड्राइविंग की कोई अवधारणा (Concept) नहीं है” और देश में होने वाली अधिकांश सड़क दुर्घटनाओं का एक मुख्य कारण यही है। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने भारतीय सड़कों की जमीनी हकीकत पर सवाल उठाते हुए कहा कि लेन ड्राइविंग का पालन करने से दुर्घटनाओं में भारी कमी आ सकती है और सरकार को इस पहलू पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

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लेन ड्राइविंग और दुर्घटनाएं

  • अनुशासन का अभाव: “आप इस देश में यह कैसे सुनिश्चित करते हैं कि ड्राइवर लेन ड्राइविंग का उल्लंघन न करें? यहाँ लेन ड्राइविंग जैसा कुछ है ही नहीं।”
  • समाधान: पीठ ने जोर देकर कहा कि लेन अनुशासन न केवल सड़क सुरक्षा को सुधारेगा बल्कि यातायात के प्रवाह को भी व्यवस्थित करेगा।

सुरक्षा उपकरणों पर “परेशान करने वाले” आंकड़े

  • कोर्ट इस बात से काफी नाखुश दिखा कि नियम 125H (जो सार्वजनिक वाहनों में लोकेशन ट्रैकिंग और पैनिक बटन अनिवार्य करता है) के बावजूद जमीन पर स्थिति शून्य के बराबर है।
  • 1% से भी कम: कोर्ट ने नोट किया कि 1% से भी कम व्यावसायिक वाहनों में वर्तमान में ट्रैकिंग डिवाइस लगे हैं। इसे “परेशान करने वाली स्थिति” बताते हुए सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिए गए।
  • परमिट पर रोक: कोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक VLTD और पैनिक बटन ‘वाहन’ (Vahan) ऐप पर अपडेट न दिखें, तब तक किसी भी सार्वजनिक वाहन को ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ या ‘परमिट’ जारी न किया जाए।
  • मैन्युफैक्चरर्स की भूमिका: कोर्ट ने सुझाव दिया कि कंपनियां गाड़ी बेचते समय ही ये डिवाइस पहले से फिट करके दें।

स्पीड गवर्नर और नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड

  • स्पीड गवर्नर (SLD): राज्यों द्वारा अनुपालन रिपोर्ट दाखिल न करने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और कहा कि सभी निर्माताओं को गति सीमा उपकरण लगाना अनिवार्य है।
  • बोर्ड का गठन: कोर्ट ने ‘नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड’ के गठन में हो रही देरी पर “अंतिम अवसर” देते हुए सरकार को 3 महीने के भीतर इसे गठित करने का आदेश दिया।

उत्तर प्रदेश के सड़क दुर्घटना मामलों पर विचार

यूपी सरकार द्वारा पुराने सड़क दुर्घटना मामलों को खत्म करने (Abate) के फैसले पर कोर्ट ने कहा कि वह राज्य के नए अध्यादेश (8 अप्रैल 2026) पर विचार करेगा, जिसका उद्देश्य गंभीर और गैर-शमनीय (Non-compoundable) मामलों को दोबारा बहाल करना है।

सख्त नियमों से ही थमेंगे हादसे

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि भारत की सड़कों को सुरक्षित बनाने के लिए केवल कागजी कानून पर्याप्त नहीं हैं। लेन अनुशासन की कमी और सुरक्षा उपकरणों की अनदेखी सीधे तौर पर लोगों की जान ले रही है। कोर्ट ने अब गेंद केंद्र और राज्य सरकारों के पाले में डाल दी है ताकि तकनीक और प्रवर्तन के जरिए इन हादसों को रोका जा सके।

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