Dog’s Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट ने देश में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और रेबीज के मामलों पर कुत्तों को कानून सम्मत प्रक्रिया के तहत इच्छामृत्यु (Euthanasia) पर सुनवाई की।
मामले का सारांश (Quick Highlights)
| मुख्य कानूनी बिंदु | सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्देश |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया |
| इच्छामृत्यु की शर्त | केवल पशु चिकित्सकों की जांच में रेबीज पीड़ित, असाध्य बीमार या अत्यधिक हिंसक साबित होने पर। |
| सुरक्षा कवच | नेक नीयत से काम करने वाले सरकारी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज करने पर रोक। |
| निगरानी की जिम्मेदारी | देश के सभी हाई कोर्ट्स को इस मामले की निरंतर निगरानी (Continuing Mandamus) करने का आदेश। |
बच्चों और बुजुर्गों पर हो रहे कुत्तों के हमले से परेशानी
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन जजों की पीठ ने देश भर में बच्चों और बुजुर्गों पर हो रहे “अत्यंत परेशान करने वाले” हमलों का संज्ञान लेते हुए यह फैसला दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि मानव जीवन और सार्वजनिक सुरक्षा की रक्षा के लिए रेबीज से पीड़ित (Rabid), असाध्य रूप से बीमार (Incurably Ill) और प्रमाणित रूप से खतरनाक या आक्रामक (Demonstrably Dangerous) कुत्तों को कानून सम्मत प्रक्रिया के तहत इच्छामृत्यु (Euthanasia) दी जा सकती है।
कुत्तों के हमलों वाले क्षेत्र में कानूनी कार्रवाई हो
यह आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवारा कुत्तों के आतंक पर चल रही स्वतः संज्ञान (Suo Motu) कार्यवाही के दौरान आया है। कोर्ट ने साफ किया कि जिन क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की आबादी खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है और जहां हमले लगातार हो रहे हैं, वहां अधिकारी कानून के दायरे में रहते हुए कड़े कदम उठा सकते हैं।
इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर कोर्ट का रुख
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जहां सार्वजनिक सुरक्षा को लगातार खतरा बना हुआ है, वहां पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act 1960) और एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) रूल्स 2023 के कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाए। “योग्य पशु चिकित्सा विशेषज्ञों (Qualified Veterinary Experts) द्वारा उचित मूल्यांकन के बाद, रेबीज से पीड़ित, असाध्य रूप से बीमार, या प्रमाणित रूप से खतरनाक/आक्रामक कुत्तों के मामलों में इच्छामृत्यु (Euthanasia) सहित वे सभी कानूनी रूप से अनुमेय उपाय किए जा सकते हैं, जो मानव जीवन और सुरक्षा के खतरे को प्रभावी ढंग से रोकने के लिए आवश्यक हों।”
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी 11 नए अतिरिक्त दिशा-निर्देश (Additional Directions)
- अदालत ने देश भर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के लिए व्यापक गाइडलाइंस जारी की हैं।
- समयबद्ध बुनियादी ढांचा: राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एबीसी (ABC) ढांचे के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए समन्वित और समयबद्ध कदम उठाने होंगे।
- हर जिले में एबीसी केंद्र: प्रत्येक जिले में पर्याप्त पशु चिकित्सा बुनियादी ढांचे, सर्जिकल सुविधाओं, प्रशिक्षित कर्मियों और रसद से लैस कम से कम एक पूर्ण कार्यात्मक एबीसी केंद्र होना अनिवार्य है।
- केंद्रों का विस्तार: जिलों की जनसंख्या घनत्व और क्षेत्रीय विस्तार को देखते हुए एबीसी केंद्रों की संख्या बढ़ाने पर निर्णय लिया जाए।
- बिना किसी ढिलाई के कार्यान्वयन: शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और सार्वजनिक परिसरों से कुत्तों को हटाने और उन्हें नसबंदी/टीकाकरण के बाद वापस उसी स्थान पर न छोड़ने के पुराने आदेशों को बिना किसी ढिलाई या देरी के पूरी तरह लागू किया जाए।
- अधिक फुटफॉल वाले क्षेत्रों पर निर्णय: अधिकारी जमीनी वास्तविकताओं और जोखिम का आकलन करके इस आदेश का दायरा अन्य भारी भीड़भाड़ वाले और पारगमन (Transit) वाले सार्वजनिक स्थानों पर भी बढ़ा सकते हैं।
- क्षमता निर्माण (Capacity Building): पशु चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करने, आश्रय सुविधाओं (Shelter Homes) को बेहतर बनाने और संबंधित विभागों के समन्वय में व्यापक टीकाकरण अभियान चलाने के निर्देश।
- एंटी-रेबीज दवाओं का स्टॉक: सभी सरकारी चिकित्सा सुविधाओं में एंटी-रेबीज वैक्सीन (Anti-rabies vaccine) और इम्युनोग्लोबुलिन (Immunoglobulin) की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
- राजमार्गों और एक्सप्रेसवे के लिए तंत्र: भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) राज्यों के साथ मिलकर राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे से आवारा कुत्तों और मवेशियों को सुरक्षित हटाने, उनके लिए विशेष वाहनों की तैनाती और शेल्टर होम बनाने के लिए एक समयबद्ध प्रणाली तैयार करे।
- कानूनी सुरक्षा कवच: इन निर्देशों को ईमानदारी से (In Good Faith) लागू करने वाले अधिकारियों को कानूनी संरक्षण मिलेगा। जब तक दुर्भावना या शक्ति के घोर दुरुपयोग का प्रथम दृष्टया मामला न बने, अधिकारियों के खिलाफ कोई एफआईआर (FIR) या आपराधिक कार्रवाई शुरू नहीं की जाएगी।
- हाई कोर्ट्स द्वारा निरंतर निगरानी (Continuing Mandamus): सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों (High Courts) को निर्देश दिया है कि वे इन आदेशों के अनुपालन के लिए अपने स्तर पर स्वतः संज्ञान रिट याचिकाएं (Suo Motu Writ Petitions) दर्ज करें।
- स्थानीय स्तर पर बदलाव की छूट: हाई कोर्ट्स को स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार इन निर्देशों के दायरे को विस्तार देने या ढालने की स्वतंत्रता होगी, बशर्ते कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की मूल भावना कमजोर न हो। लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ अवमानना (Contempt) की कार्रवाई करने का अधिकार भी क्षेत्रीय अदालतों के पास होगा।
प्रशासनिक जवाबदेही और जन सुरक्षा की ओर बड़ा कदम
यह ऐतिहासिक आदेश देश में आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के तरीके में एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी बदलाव लाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने जहां एक तरफ हिंसक और बीमार पशुओं को हटाने और कानूनी तौर पर इच्छामृत्यु देने जैसे कड़े रास्तों को मंजूरी दी है, वहीं दूसरी तरफ हाई कोर्ट्स को सीधे मॉनिटरिंग सौंपकर और अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा देकर यह सुनिश्चित किया है कि इस संकट से निपटने में अब कोई प्रशासनिक शिथिलता न रहे।

