Monday, June 1, 2026
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Bypass The Process: वकील की दी एक निजी शिकायत पर फंसे लखनऊ के डीएम व एडीएम(न्यायिक)…देना होगा जेब से जुर्माना, पढ़ें पूरा मामला

Bypass The Process: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग पर लखनऊ के जिलाधिकारी (DM) और अपर जिलाधिकारी – न्यायिक (ADM Judicial) पर जुर्माना लगाया है।

अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की गई

यह आदेश जस्टिस पंकज भाटिया ने ‘निवास कॉलोनाइजर्स प्राइवेट लिमिटेड’ (Nivas Colonizers Private Limited) द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। हाईकोर्ट ने पाया कि इन अधिकारियों ने अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर जाकर और बिना किसी वैधानिक अधिकार के कार्यवाही शुरू की, जिससे याचिकाकर्ता को अनावश्यक रूप से प्रताड़ित होना पड़ा। दोनों ही संबंधित अधिकारियों पर हाईकोर्ट ने 20,000-20,000 रुपये का व्यक्तिगत जुर्माना (Personal Cost) लगाया है।

क्या था पूरा मामला? (Background of the Case)

विवादित आदेश: कोर्ट ने एडीएम (न्यायिक) द्वारा 10 मार्च 2026 को जारी उस आदेश को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसके तहत कंपनी को विवादित भूमि बेचने और वहां निर्माण गतिविधियां चलाने से रोक दिया गया था।

वकील की भूमिका पर सवाल: याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि आर. पी. सिंह नामक एक वकील ने, जिनका विवादित संपत्ति से कोई सीधा संबंध नहीं था, पहले कंपनी को एक कानूनी नोटिस भेजा और बाद में सीधे डीएम (DM) के पास एक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जमीन का हस्तांतरण अवैध रूप से किया गया है।

अधिकारियों की लापरवाही: डीएम ने इस निजी शिकायत को स्वीकार किया और इसे सीधे एडीएम (न्यायिक) को भेज दिया। एडीएम ने मामले की गंभीरता या प्राथमिक सत्यता (Prima Facie Satisfaction) की जांच किए बिना ही सीधे निर्माण और बिक्री पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश पारित कर दिया।

हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और विधिक निष्कर्ष (Key Judicial Observations)

तय प्रक्रिया का पूरी तरह उल्लंघन: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले की पड़ताल के बाद उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता (UP Revenue Code) के नियमों की अनदेखी पर अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की धारा 104 और 105 के तहत किसी भी प्रकार की कानूनी कार्यवाही शुरू करने का अधिकार केवल उप-जिलाधिकारी (SDM) के पास है, न कि डीएम या एडीएम के पास।

नियमों को बाईपास करना: संहिता का नियम 103 यह अनिवार्य करता है कि किसी भी कार्रवाई से पहले संबंधित ‘लेखपाल’ (Lekhpal) से एक रिपोर्ट ली जाए और एसडीएम द्वारा संबंधित पक्षों को बकायदा नोटिस जारी किया जाए। इस मामले में इस पूरी कानूनी प्रक्रिया को पूरी तरह से दरकिनार (Bypass) कर दिया गया।

ब्लैकमेलिंग का प्रयास और विवेकशून्यता: पीठ ने बेहद सख्त लहजे में टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता वकील ने याचिकाकर्ता को डराने-धमकाने और ब्लैकमेल (Blackmail) करने के लिए अपने कानूनी ज्ञान का दुरुपयोग किया। कोर्ट ने माना कि डीएम ने मामले को दर्ज करने में अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया, जबकि एडीएम (न्यायिक) ने बिना सोचे-समझे (Without application of mind) और बिना किसी कानूनी संतुष्टि के आदेश पारित कर दिया।

ऐतिहासिक सजा: सरकारी खजाने से नहीं, अपनी जेब से देंगे जुर्माना

अदालत ने न केवल इस पूरी अवैध कार्यवाही और एडीएम के आदेश को रद्द (Quash) कर दिया, बल्कि दोनों अधिकारियों को वित्तीय रूप से सीधे जवाबदेह बनाया। डीएम और एडीएम (न्यायिक) दोनों को छह सप्ताह के भीतर अपने व्यक्तिगत बैंक खातों (Personal Accounts) से 20,000-20,000 रुपये की जुर्माना राशि का भुगतान करना होगा। कोर्ट ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि इस राशि का भुगतान किसी भी स्थिति में सरकारी धन (Government Funds) से नहीं किया जाएगा।

मामला एक नज़र में (Core Matrix)

पैरामीटरमामला और विधिक उल्लंघनहाई कोर्ट का सुधारात्मक कदम
अधिकार क्षेत्र का उल्लंघनDM और ADM (Judicial) ने वह केस संभाला जो कानूनन केवल SDM के अधिकार क्षेत्र में आता है।पूरी कार्यवाही और रोक संबंधी आदेश को निरस्त (Quash) कर दिया गया।
प्रक्रियात्मक चूकबिना लेखपाल की रिपोर्ट और बिना नोटिस दिए (नियम 103 का उल्लंघन) सीधे रोक लगाई।अधिकारियों की इस कार्रवाई को याचिकाकर्ता का ‘अनावश्यक उत्पीड़न’ माना।
जुर्माने की प्रकृतिअधिकारियों की व्यक्तिगत लापरवाही और शक्तियों का दुरुपयोग।₹20,000 ईच (प्रत्येक पर) व्यक्तिगत जुर्माना; सरकारी खजाने के इस्तेमाल पर पूर्ण रोक।

निष्कर्ष (Takeaway)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन नौकरशाहों (Bureaucrats) के लिए एक कड़ा सबक है जो बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए या अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर रसूखदार लोगों की शिकायतों पर एकतरफा आदेश पारित कर देते हैं। अधिकारियों की जेब पर सीधे वित्तीय जुर्माना लगाकर कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों को कानून के दायरे में रहकर और विवेक का इस्तेमाल करके ही काम करना होगा।

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