Monday, June 1, 2026
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Religious Trusts: मंदिर में कितने श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं…इससे सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट का स्वरूप तय नहीं हो सकता, पढ़ें मंदिर का यह केस

Religious Trusts: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धार्मिक और धर्मार्थ ट्रस्टों के प्रबंधन को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है।

सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट घोषित करने का मामला

हाईकोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार की एकल पीठ ने ‘श्री राम लक्ष्मण-जानकी विराजमान मंदिर ट्रस्ट’ को एक सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट घोषित करने और नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 92 के तहत इसके प्रबंधन में हस्तक्षेप करने की मांग करने वाली दो याचिकाओं को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल इस तथ्य से कि आम जनता किसी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए आती है, उस मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट का स्वरूप ‘सार्वजनिक’ (Public Character) साबित नहीं होता।

क्या है सीपीसी की धारा 92? (What is Section 92 of CPC?)

अधिकार: नागरिक प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 92 सार्वजनिक धर्मार्थ और धार्मिक ट्रस्टों (Public Charitable and Religious Trusts) के नियमन से संबंधित है। यह अदालतों को यह कानूनी अधिकार देती है कि यदि किसी सार्वजनिक ट्रस्ट में नियमों का उल्लंघन या गड़बड़ी होती है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है, ट्रस्टियों को हटा सकती है या नया प्रशासनिक ढांचा तैयार कर सकती है।

अदालत का फैसला: चूंकि यह धारा केवल ‘सार्वजनिक ट्रस्टों’ पर लागू होती है, इसलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘निजी ट्रस्ट’ (Private Trust) होने के कारण इस मामले में धारा 92 के तहत दायर किया गया मुकदमा विचारणीय (Maintainable) नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद (Background of the Dispute)

याचिकाकर्ताओं का तर्क: यह विवाद मुख्य रूप से ट्रस्ट के प्रबंधन और उसके ‘सरबराहकार’ (Sarvarahkar – प्रबंधक) की नियुक्ति को लेकर था। साल 2022 के एक ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) के आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ताओं ने दलील दी थी कि चूंकि आम लोग इस मंदिर में आते हैं, इसलिए यह एक सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट है और इसके नए प्रबंधक की नियुक्ति के लिए अदालत को सीपीसी की धारा 92 के तहत हस्तक्षेप करना चाहिए।

ट्रस्ट का पक्ष: दूसरी तरफ, ट्रस्ट ने दलील दी कि इस मंदिर और ट्रस्ट की स्थापना मूल संस्थापक गुलजारी लाल ने अपने आवासीय परिसर (Residential Premises) के भीतर की थी। इसका संचालन हमेशा संस्थापक द्वारा बनाई गई एक निजी व्यवस्था (Private Scheme) के तहत ही किया गया है।

हाई कोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष (Key Judicial Findings)

जनता का आना बनाम मालिकाना हक: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानूनी सिद्धांत तय किए। अदालत ने कहा कि किसी मंदिर में आम जनता को पूजा करने की अनुमति देना, अपने आप में उस ट्रस्ट को ‘सार्वजनिक’ घोषित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। भारत में कई निजी तौर पर स्थापित मंदिरों में जनभावनाओं का आदर करते हुए लोगों को दर्शन की अनुमति दी जाती है, लेकिन इससे उसका प्रशासनिक स्वरूप नहीं बदलता।

नियंत्रण और संपत्तियों का समर्पण: साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने पाया कि इस ट्रस्ट का नियंत्रण और प्रबंधन हमेशा संस्थापक और उनके वंशजों (Successors) के पास ही रहा है। साथ ही, ट्रस्ट की संपत्तियां पूरी तरह से मंदिर के रखरखाव के लिए समर्पित थीं, न कि किसी सार्वजनिक उपयोग के लिए। इसलिए यह ट्रस्ट पूरी तरह निजी प्रकृति (Private Nature) का है।

‘रेस ज्यूडिकाटा’ (Res Judicata) का सिद्धांत लागू: अदालत ने नोट किया कि पूर्व की न्यायिक कार्यवाहियों में शिव गोपाल को पहले ही ट्रस्ट का वैध प्रबंधक (Manager) स्वीकार किया जा चुका था और वे फैसले अंतिम हो चुके थे। उनके बाद श्री नारायण को प्रबंधक बनाने पर ट्रस्ट कमेटी के किसी सदस्य ने आपत्ति नहीं जताई थी। कोर्ट ने कहा कि चूंकि प्रबंधक के पद का मुद्दा पहले ही न्यायिक रूप से तय हो चुका है, इसलिए यह मामला ‘प्राडन्याय’ या ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (Res Judicata) के सिद्धांत के तहत दोबारा मुकदमा दायर करने से वर्जित (Barred) है। यह सिद्धांत एक ही पक्षकारों के बीच पहले से तय हो चुके मामलों को दोबारा अदालत में खींचने से रोकता है।

फैसले का मुख्य सार (Core Matrix)

विधिक मापदंडयाचिकाकर्ताओं का दावाहाई कोर्ट का अंतिम निर्णय (2026)
ट्रस्ट का स्वरूपआम जनता के आने के कारण यह एक ‘सार्वजनिक ट्रस्ट’ है।यह ‘निजी ट्रस्ट’ है; क्योंकि नियंत्रण और स्थापना निजी परिसर में वंशजों के पास रही।
CPC की धारा 92 की प्रयोज्यताप्रबंधन में सुधार के लिए इस धारा के तहत कोर्ट हस्तक्षेप करे।यह धारा केवल सार्वजनिक ट्रस्टों के लिए है; निजी ट्रस्ट पर लागू नहीं होती।
जनता द्वारा पूजा का अधिकारइसे सार्वजनिक ट्रस्ट का अकाट्य प्रमाण माना जाए।पूजा की अनुमति देना एक सामाजिक/धार्मिक आचरण हो सकता है, यह ट्रस्ट का कानूनी चरित्र तय नहीं करता।
पुनः मुकदमेबाजी (Re-litigation)प्रबंधक की नियुक्ति को दोबारा चुनौती दी जा सकती है।Res Judicata के तहत वर्जित; एक बार तय हो चुका मुद्दा दोबारा नहीं उछाला जा सकता।

निष्कर्ष (Takeaway)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उन सभी निजी और पारिवारिक धार्मिक ट्रस्टों के लिए एक बड़ी कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, जिन्हें केवल आम जनता की आवाजाही के आधार पर सरकारी या अदालती नियंत्रण में लाने का प्रयास किया जाता है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी ट्रस्ट का स्वरूप उसके ‘मूल प्रशासनिक नियंत्रण’ और ‘स्थापना के उद्देश्य’ से तय होता है, न कि इस बात से कि वहां कितने श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।

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