Consultation Process: केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने न्यायपालिका (Judiciary) और कार्यपालिका (Executive) के रिश्तों को लेकर एक बड़ा बयान दिया है।
केंद्रीय कानून मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उच्चतर न्यायपालिका (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों) में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका के बीच कोई टकराव या खींचतान (No Tussle) नहीं है। इसके विपरीत, दोनों के बीच रिक्तियों को भरने के लिए एक बेहतर और स्वस्थ परामर्श प्रक्रिया (Consultation Process) अपनाई जा रही है। एक विशेष साक्षात्कार में कानून मंत्री ने यह भी खुलासा किया कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए दुनिया के विभिन्न देशों में अपनाई जाने वाली प्रणालियों का अध्ययन कर रही है।
कानून मंत्री के बयान के मुख्य बिंदु (Key Highlights)
कोई टकराव नहीं, मजबूत परामर्श प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मतभेदों के सवाल पर मेघवाल ने कहा, “सबसे पहले, मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि हमारे बीच कोई टकराव नहीं है, बल्कि एक बेहतरीन परामर्श प्रक्रिया चल रही है। कई बार ऐसा होता है जब सरकार द्वारा सुझाए गए नामों पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम असहमत होता है। इसी तरह, सरकार भी नकारात्मक बैकग्राउंड जांच (Negative Background Checks) जैसे कारणों से कॉलेजियम की कुछ सिफारिशों को रोक देती है। लेकिन इसे टकराव नहीं कहा जा सकता।”
वैश्विक प्रणालियों का अनौपचारिक अध्ययन: जब उनसे पूछा गया कि क्या देश में न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) का कोई विकल्प हो सकता है, तो उन्होंने बताया कि सरकार विभिन्न देशों में जजों की नियुक्ति के लिए लागू प्रणालियों का परीक्षण कर रही है।
हालांकि, यह अध्ययन पूरी तरह से अनौपचारिक (Informal) स्तर पर किया जा रहा है और इसके लिए कोई औपचारिक तंत्र या समिति नहीं बनाई गई है।
कानून मंत्री ने कहा, “देखते हैं कि इस अध्ययन से क्या निकलकर सामने आता है।”
पेंडेंसी (लंबित मामलों) को कम करने पर जोर: देश की अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, 25 हाई कोर्ट और निचली अदालतों) में 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों पर चिंता व्यक्त करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि मोदी सरकार अदालतों का बोझ कम करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) तंत्र, जिसमें मध्यस्थता (Arbitration) और सुलह शामिल हैं, को लगातार मजबूत किया जा रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: कॉलेजियम बनाम NJAC विवाद
संसद का प्रयास: जजों की नियुक्ति को लेकर सरकार और न्यायपालिका का इतिहास काफी चर्चा में रहा है। भारतीय संसद के दोनों सदनों ने लगभग सर्वसम्मति से एक विधेयक पारित किया था, जिसका उद्देश्य कॉलेजियम प्रणाली को बदलकर जजों की नियुक्ति के लिए एक नया निकाय (Commission) बनाना था। NJAC एक्ट और सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: इसके बाद राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम और 99वां संविधान संशोधन अधिनियम लागू किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त: 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए NJAC अधिनियम को पूरी तरह असंवैधानिक और शून्य (Void) घोषित कर दिया था।
मूल संरचना का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि NJAC न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत को कमजोर करता है, जो भारतीय संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का हिस्सा है। इस फैसले के बाद सरकार का प्रस्तावित पैनल रद्द हो गया और दशकों पुरानी कॉलेजियम प्रणाली फिर से पूरी तरह बहाल हो गई थी।
मामला एक नज़र में (Core Matrix)
| विषय | वर्तमान स्थिति | सरकार का रुख (2026) |
| जजों की नियुक्ति प्रणाली | कॉलेजियम व्यवस्था (Collegium System) लागू है। | अन्य देशों के मॉडलों का अनौपचारिक अध्ययन जारी। |
| कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंध | सिफारिशों पर मतभेद स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। | “कोई टकराव नहीं” – आपसी संवाद और परामर्श बेहतर है। |
| लंबित मामले (Pendency) | कुल अदालतों में 5 करोड़ से अधिक केस लंबित। | ADR (आर्बिट्रेशन/मध्यस्थता) के जरिए समाधान की कोशिश। |
निष्कर्ष (Takeaway)
कानून मंत्री के इस बयान से यह साफ है कि सरकार वर्तमान में न्यायपालिका के साथ सीधे टकराव का रास्ता चुनने के बजाय ‘सकारात्मक संवाद’ और बैकग्राउंड चेक्स के जरिए नियुक्तियों की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है। साथ ही, वैश्विक प्रणालियों के अध्ययन के संकेत यह दर्शाते हैं कि भविष्य में नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने के लिए सरकार दीर्घकालिक विकल्पों पर भी विचार कर रही है।

