Tuesday, September 8, 2026
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Court Time: महिला वकील ने ड्राफ्ट तैयार कर नाबालिग से POCSO केस कराया…ऐसे केस से पुलिस-अदालत का वक्त होता है बर्बाद, जानिए पूरा मामला

Court Time: मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बने कड़े कानून पॉक्सो (POCSO) एक्ट, 2012 के बढ़ते दुरुपयोग पर बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

4 अलग-अलग मामलों की एक साथ सुनवाई की गई

पीठ के जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की सिंगल बेंच ने तिरुचिरापल्ली, थूथुकुडी, पुदुक्कोट्टई और मदुरै से जुड़े 4 अलग-अलग मामलों की एक साथ सुनवाई करते हुए यह साझा आदेश पारित किया। कोर्ट ने पाया कि वयस्कों (Adults) द्वारा पारिवारिक दुश्मनी, वैवाहिक विवाद, निजी प्रतिशोध और गांवों की गुटबाजी का बदला लेने के लिए बच्चों को ‘हथियार’ बनाकर पॉक्सो के झूठे मुकदमे दर्ज कराए जा रहे हैं। कोर्ट ने कहा है कि पॉक्सो के झूठे मामले न केवल बेकसूर आरोपियों को बर्बाद करते हैं, बल्कि देश की अदालतों और पुलिस की जांच प्रणालियों का वो कीमती वक्त और संसाधन भी सोख लेते हैं, जिसे वास्तव में पीड़ित बच्चों को न्याय दिलाने में लगाया जाना चाहिए था।

वयस्कों के आपसी झगड़े का औजार नहीं बन सकता बच्चों का कानून

हाई कोर्ट ने 3 मामलों में चल रही कानूनी कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया और एक अन्य मामले में आगे की जांच के आदेश दिए। जस्टिस गौरी ने कानून के दुरुपयोग और बच्चों पर पड़ने वाले इसके असर पर चिंता जताते हुए कहा, पॉक्सो एक्ट का असली मकसद केवल एफआईआर दर्ज करना, चार्जशीट दाखिल करना या सजा दिलाना नहीं है। न्याय प्रणाली में आने वाले बच्चे को सुरक्षित, आश्वस्त और भावनात्मक रूप से मजबूत होकर बाहर निकलना चाहिए, न कि सिस्टम की संवेदनहीन प्रक्रियाओं के कारण और गहरे मानसिक सदमे (Trauma) के साथ। जब इतने सख्त कानून को बिना सोचे-समझे या गैर-जिम्मेदाराना तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, तो सबसे बड़ा शिकार मासूम बच्चा ही बनता है। अदालत ने साफ किया कि इन टिप्पणियों का मतलब वास्तविक बाल यौन शोषण के मामलों की गंभीरता को कम करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पॉक्सो कानून की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को और मजबूत करना है।

केस स्टडी: वकील महिला ने ही रची थी डॉक्टर को फंसाने की साजिश!

सुनवाई के दौरान तिरुचिरापल्ली (त्रिची) का एक ऐसा मामला सामने आया जिसने अदालत को हैरान कर दिया। इस मामले में एक डॉक्टर पर इंस्टाग्राम के जरिए मिली एक नाबालिग लड़की के अपहरण और यौन उत्पीड़न का आरोप था।

काउंसलिंग में खुली पोल: जब नाबालिग लड़की की काउंसलिंग रिपोर्ट कोर्ट के सामने आई, तो बच्ची ने बताया कि उसने यह शिकायत खुद नहीं की थी। बल्कि एक महिला वकील (जो खुद को आरोपी डॉक्टर की पत्नी बताती थी) ने उसे डरा-धमकाकर और दबाव बनाकर इस शिकायत पर दस्तखत कराए थे। शिकायत का ड्राफ्ट भी उसी महिला वकील ने तैयार किया था।

महिला वकील का पुराना रिकॉर्ड: पुलिस की स्टेटस रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि इस महिला वकील ने पहले भी कई अलग-अलग लोगों के खिलाफ इसी तरह के गंभीर आरोप लगवाकर केस दर्ज कराए थे, जिनमें बाद में शिकायतकर्ता मुकर गए और आरोपी बरी हो गए।

यह रही कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

न्याय प्रणाली में वकालत का पेशा एक पवित्र और संवैधानिक स्थान रखता है। अगर बिना किसी नैतिक साख वाले लोग इस पेशे में घुसपैठ कर कानूनी ज्ञान का इस्तेमाल सीधे-साधे और भावनात्मक रूप से कमजोर नागरिकों को धमकाने, ब्लैकमेल करने या उनका शोषण करने के लिए करेंगे, तो यह न्याय प्रणाली पर से जनता के भरोसे की जड़ों पर प्रहार होगा। हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए बार काउंसिल ऑफ केरल (संबंधित राज्य बार) से उस महिला वकील के नामांकन (Enrolment) दस्तावेजों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र जांच करने को कहा है।

राज्य सरकार को निर्देश: शुरू की जाए सिंगापेन संवेदीकरण कार्यशाला (Singapen Sensitisation Workshop)

अदालत ने भविष्य में ऐसे झूठे मामलों को रोकने और पुलिस-प्रशासन को अधिक संवेदनशील बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार को एक राज्यव्यापी कार्यक्रम ‘सिंगापेन संवेदीकरण कार्यशाला’ शुरू करने का सुझाव दिया।

इस कार्यशाला के मुख्य बिंदु इस प्रकार होंगे

किसे शामिल किया जाए: इसमें पुलिस अधिकारी, सरकारी वकील, बाल कल्याण समितियां (CWC), काउंसलर, मनोवैज्ञानिक और शिक्षा अधिकारी शामिल हों।

फोकस एरिया: बच्चों के मनोविज्ञान को समझना, पीड़ितों से पूछताछ की नैतिक और संवेदनशील तकनीकें, पॉक्सो के दुरुपयोग को रोकना और झूठी शिकायत दर्ज कराने पर सजा से जुड़ी पॉक्सो एक्ट की धारा 22 के प्रति जागरूकता बढ़ाना।

अदालत ने इन सभी निर्देशों के अनुपालन (Compliance) की रिपोर्ट सौंपने के लिए मामले की अगली तारीख 1 अगस्त 2026 तय की है।

डिजिटल विश्लेषण: पॉक्सो के दुरुपयोग पर हाई कोर्ट के कड़े रुख के मायने

कानूनी और सामाजिक पहलूहाई कोर्ट का स्टैंड और इसका प्रभाव
बच्चों का मोहरे के रूप में इस्तेमालकोर्ट ने माना कि माता-पिता या वयस्क अपने आपसी विवादों (जैसे प्रॉपर्टी विवाद या तलाक) में बच्चों को झूठे बयान देने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जो बच्चों के मानसिक विकास के लिए खतरनाक है।
धारा 22 (Section 22 of POCSO)यह धारा झूठी शिकायत या झूठी गवाही देने वालों के लिए सजा का प्रावधान करती है। कोर्ट ने इस धारा के प्रचार-प्रसार पर जोर दिया ताकि कानून का दुरुपयोग करने वालों में डर पैदा हो।
संसाधनों की बर्बादी पर चिंताजब पुलिस और जज झूठे मामलों को सुलझाने में महीनों बर्बाद करते हैं, तो असली पीड़ित बच्चे न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटते रह जाते हैं।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला आंखें खोलने वाला है। यह याद दिलाता है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बने ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल वयस्कों को अपनी आपसी रंजिशें साधने के लिए ब्लैकमेलिंग टूल के रूप में नहीं करने दिया जा सकता। कानून का काम सुरक्षा देना है, प्रतिशोध की आग में बेकसूरों को जलाना नहीं।

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