सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- शुरुआती चरण (CrPC 482) में कर्मचारी का नाम आवश्यक नहीं: कोर्ट ने कहा कि आरोप पत्र से यह स्पष्ट होना चाहिए कि कॉरपोरेशन ने अपराध किया है। शुरुआती चरण में ही कर्मचारी की पहचान पर जोर देने से वैध मुकदमों का गला घुट जाएगा, क्योंकि शिकायतकर्ता को अक्सर यह नहीं पता होता कि कंपनी के भीतर किस व्यक्ति ने वह कृत्य किया है।
- मुकदमे (Trial) के दौरान तय होगा मामला: अदालत ने माना कि व्यक्ति के आपराधिक इरादे को कंपनी से जोड़ना ऐसा विषय है जिसकी जांच मुकदमे (ट्रायल) के दौरान साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट आपराधिक दायित्व (Corporate Criminal Liability) और ‘मेंस रिया’ (Mens Rea – आपराधिक मंशा) के सिद्धांतों को लेकर एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने सनोफी इंडिया लिमिटेड द्वारा कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। इसके साथ ही, अदालत ने किसी व्यक्ति के आपराधिक कृत्य और मानसिक स्थिति को कंपनी पर आरोपित करने के लिए ‘थ्री-स्टेज फ्रेमवर्क’ (Three-Stage Framework) निर्धारित किया। शीर्ष अदालत ने फैसला दिया है कि किसी कंपनी पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है, भले ही जांच एजेंसी ने उस विशिष्ट कर्मचारी या अधिकारी की पहचान न की हो या उसे आरोपी न बनाया हो जिसके माध्यम से कंपनी ने कथित अपराध को अंजाम दिया था [सनोफी इंडिया लिमिटेड बनाम सीबीआई]।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. आरोप पत्र में कंपनी का अपराध दिखना पर्याप्त दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत कार्यवाही रद्द करने के स्तर पर स्थिति स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा: “आरोप पत्र (Chargesheet) में प्रथम दृष्टया यह प्रदर्शित होना चाहिए कि स्वयं कॉरपोरेशन/कंपनी ने अपराध किया है; यह अनिवार्य नहीं है कि आरोप पत्र में उस विशिष्ट व्यक्ति की भी पहचान की गई हो जिसके माध्यम से ऐसा किया गया। कंपनी की भूमिका उसके स्वयं के आचरण, निर्णयों और लेन-देन के जरिए सामने आ सकती है, भले ही इसे क्रियान्वित करने वाले व्यक्ति का नाम दर्ज न हो।”
2. शुरुआती स्तर पर पहचान की अनिवार्यता से न्याय बाधित होगा अदालत ने व्यावहारिक पहलू पर टिप्पणी करते हुए कहा:
- किसी कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता को अक्सर केवल यह पता होता है कि कंपनी के भीतर किसी ने यह कृत्य किया है, लेकिन उसके पास यह जानने का साधन नहीं होता कि वह व्यक्ति वास्तव में कौन है।
- शुरुआत में ही विशिष्ट व्यक्ति की पहचान पर जोर देने से वैध और वास्तविक अभियोजन बाधित हो जाएंगे।
आपराधिक मंशा (Mens Rea) के आरोपण हेतु ‘थ्री-स्टेज फ्रेमवर्क’
पीठ ने कंपनियों पर आपराधिक मंशा लागू करने के लिए एक पदानुक्रमित और क्रमिक (Hierarchical and Sequential) तीन-चरणीय ढांचा तय किया:
- प्रथम चरण (संवैधानिक दस्तावेज व कंपनी नियम): अदालतें पहले यह जांचेंगी कि क्या कंपनी के संवैधानिक दस्तावेजों (Memorandum/Articles) या कंपनी लॉ के नियमों के तहत उस व्यक्ति के पास वह कार्य करने की शक्ति निहित थी।
- दूसरा चरण (प्रत्यायोजित शक्तियां): यदि पहले चरण से निर्धारण न हो, तो यह देखा जाएगा कि क्या वह शक्ति पर्याप्त विवेक और स्वतंत्रता (Discretion and Independence) के साथ उस व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सौंपी (Delegate) गई थी।
- तीसरा चरण (विधिक कानून का उद्देश्य): अदालत संबंधित आपराधिक कानून के व्यापक या संकीर्ण उद्देश्य का परीक्षण करेगी और जरूरत पड़ने पर आरोपण का एक विशेष नियम (Special Rule of Attribution) तैयार करेगी।
मामले की पृष्ठभूमि (BARC – सनोफी विवाद)
- भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) मामला: यह मामला बार्क के ‘रेयर मैटेरियल्स प्रोजेक्ट’ के लिए सनोफी इंडिया द्वारा दवाओं की आपूर्ति से जुड़ा है।
- सीबीआई का आरोप: आरोप था कि बार्क के वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. पी. आनंद ने अधिक दरों पर और आवश्यकता से अधिक मात्रा में दवाएं खरीदने का षड्यंत्र रचा, जिससे बार्क को ₹3.53 लाख का नुकसान हुआ।
- रिश्वत का आरोप: जांच के अनुसार, वैज्ञानिक अधिकारी को कथित तौर पर ₹42,750 का अनुचित लाभ दिया गया था। हालांकि, चार्जशीट में सनोफी के किसी व्यक्तिगत कर्मचारी को नामजद आरोपी नहीं बनाया गया था।
- सनोफी का बचाव: कंपनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि जब तक कंपनी के ‘डायरेक्टिंग माइंड’ (Directing Mind) या ऑल्टर ईगो (Alter Ego) वाले व्यक्ति की पहचान और नामजदगी न हो, तब तक कंपनी पर आपराधिक मंशा थोपकर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सनोफी इंडिया की दलीलों को खारिज करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की आपराधिक मंशा कंपनी से जुड़ती है या नहीं, यह अंततः ट्रायल (मुकदमे) के दौरान परीक्षण का विषय है।
आपराधिक इरादे को कंपनी से जोड़ने का ‘3-स्टेप फ्रेमवर्क’ (Three-Stage Framework)
सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने के लिए एक क्रमिक (Hierarchical and Sequential) ढांचा पेश किया कि किसी व्यक्ति के कृत्य और Mens Rea को कंपनी पर कब आरोपित किया जाएगा:
[चरण 1: संवैधानिक दस्तावेज / नियम]
└─ क्या कंपनी के आर्टिकल्स या कानून के तहत व्यक्ति को वह कार्य करने का अधिकार प्राप्त था?
│
▼ (यदि चरण 1 लागू न हो)
[चरण 2: शक्तियों का प्रत्योजन (Delegation of Power)]
└─ क्या व्यक्ति को पर्याप्त स्वायत्तता और विवेक के साथ वह शक्ति स्पष्ट या निहित रूप से सौंपी गई थी?
│
▼ (यदि चरण 2 स्पष्ट न हो)
[चरण 3: कानून का उद्देश्य (Statutory Purpose)]
└─ संबंधित आपराधिक कानून के उद्देश्य को देखते हुए विशेष नियम बनाकर यह तय करना कि क्या व्यक्ति इसके दायरे
विधिक प्रतिनिधित्व
- सनोफी इंडिया लिमिटेड की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा, अधिवक्ता आदित्य विक्रम भट, अनिंद थॉमस, प्रियांक लडोइया, मयंक पांडे आदि।
- सीबीआई की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू, अधिवक्ता मुकेश कुमार मारोरिया, सचिन शर्मा, ऋत्विज ऋषभ और हरीश पांडे।
Corporate Criminal Liability: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा |
| केस का शीर्षक | Sanofi India Ltd. Vs CBI |
| जांच एजेंसी | केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | कॉर्पोरेट आपराधिक दायित्व (Corporate Criminal Liability) एवं ‘3-स्टेप एट्रिब्यूशन फ्रेमवर्क’ |

