Digital Fraud: दिल्ली हाई कोर्ट ने डिजिटल बैंकिंग और साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बैंकों की जिम्मेदारी और ग्राहकों की सतर्कता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है।
एसबीआई की अपील को किया स्वीकार
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने 29 मई 2026 को दिए अपने आदेश में साफ किया कि डिजिटल बैंकिंग में लापरवाही का मतलब सिर्फ ओटीपी (OTP) या पासवर्ड बताना नहीं है, बल्कि किसी अनजान या संदिग्ध लिंक पर क्लिक करना भी ग्राहक की गंभीर लापरवाही की श्रेणी में आता है। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) की अपील को स्वीकार करते हुए उसे एक उपभोक्ता को ₹2.60 लाख का रिफंड देने के आदेश से पूरी तरह मुक्त कर दिया है।
सिंगल जज का फैसला पलटा: कोर्ट ने क्यों बदला रुख?
यह मामला वास्तव में एक सिंगल जज के उस पुराने आदेश (18 नवंबर 2024) के खिलाफ था, जिसमें कोर्ट ने एसबीआई को आदेश दिया था कि वह पीड़ित ग्राहक को ₹2.60 लाख और ₹25,000 अदालती खर्च के रूप में लौटाए। डिवीजन बेंच ने उस फैसले को पलटते हुए बैंक के पक्ष में निम्नलिखित मुख्य बिंदु नोट किए:
बैंक के सिस्टम में कोई चूक नहीं: हाई कोर्ट ने पाया कि जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि एसबीआई के सुरक्षा तंत्र (Banking System) में कोई सेंधमारी या ब्रीच (Breach) हुआ था।
प्रोफेसर की खुद की गलती: पीड़ित व्यक्ति, जो खुद कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर हैं, ने स्वीकार किया था कि पैसे कटने से ठीक पहले उन्होंने किसी अज्ञात व्यक्ति द्वारा भेजे गए एक संदिग्ध लिंक पर क्लिक किया था।
प्रक्रिया का पूरा पालन: बैंक के रिकॉर्ड से साबित हुआ कि दोनों ट्रांजैक्शन इंटरनेट बैंकिंग क्रेडेंशियल्स और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे गए ओटीपी के जरिए प्रमाणित (Authenticate) होने के बाद ही पूरे हुए थे। इसमें बैंक की तरफ से ‘सेवा में कोई कमी’ (Deficiency in Service) नहीं थी।
बैंक का तुरंत एक्शन: जैसे ही प्रोफेसर ने धोखाधड़ी की सूचना कस्टमर केयर को दी, एसबीआई ने तुरंत उनके इंटरनेट बैंकिंग प्रोफाइल को ब्लॉक कर दिया, जिससे आगे का नुकसान रुक गया।
आरबीआई (RBI) गाइडलाइंस का हवाला: ‘लापरवाही तो नुकसान भी आपका’
दिल्ली हाई कोर्ट ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के साल 2017 के उस मशहूर सर्कुलर का हवाला दिया जो अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन (Unauthorized Electronic Transactions) पर बात करता है। कहा, आरबीआई का नियम स्पष्ट रूप से बैंक की खामी और ग्राहक की लापरवाही के बीच अंतर करता है। यदि नुकसान ग्राहक की लापरवाही के कारण हुआ है (जिसमें भुगतान क्रेडेंशियल्स साझा करना या अनजाने में उन्हें लीक करना शामिल है), तो जब तक ग्राहक बैंक को फ्रॉड की रिपोर्ट नहीं कर देता, तब तक का पूरा नुकसान खुद ग्राहक को ही उठाना होगा।
मामला क्या था? (2021 से चल रही थी कानूनी जंग)
यह मामला ग्रेटर नोएडा में एसबीआई की शाखा में खाता रखने वाले कंप्यूटर साइंस के प्रोफेसर हरे राम सिंह से जुड़ा है।
18 अप्रैल 2021: प्रोफेसर एक फिशिंग/विशिंग (Phishing/Vishing) फ्रॉड का शिकार हुए। उनके खाते से दो बार में (₹1 लाख और ₹1.60 लाख) कुल ₹2.60 लाख उड़ा लिए गए।
बैंकिंग ओम्बड्समैन का रुख: प्रोफेसर ने साइबर क्राइम और बैंकिंग लोकपाल (Ombudsman) में शिकायत की। अक्टूबर 2021 में लोकपाल ने बैंक को केवल ₹1 लाख वाले ट्रांजैक्शन का एक-तिहाई हिस्सा देने को कहा था क्योंकि बैंक ने चार्जबैक प्रक्रिया समय पर शुरू नहीं की थी, लेकिन ₹1.60 लाख के पेटीएम (Paytm) ट्रांजैक्शन पर राहत देने से मना कर दिया था।
वकील की दलील: प्रोफेसर के वकील रवि चंद्र प्रकाश ने दलील दी थी कि बैंक और ग्राहक का रिश्ता भरोसे (Fiduciary) का होता है, और डिजिटल सुरक्षा में लूपहोल्स का खामियाजा किसी मासूम ग्राहक को नहीं भुगतना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने माना कि तकनीकी रूप से जागरूक (Computer Science Professor) होने के बावजूद अनजान लिंक पर क्लिक करना खुद पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था।
विश्लेषण: बैंक ऑफ इंडिया (BOI) और एसबीआई (SBI) के मामलों में अंतर क्यों?
हाल ही में उपभोक्ता अदालत (NCDRC) ने बैंक ऑफ इंडिया पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया था और एक अन्य डिजिटल फ्रॉड में एसबीआई को ही प्रोफेसर के ₹13 लाख लौटाने को कहा था। ऐसे में इस मामले में फैसला बैंक के पक्ष में क्यों गया? इसे समझना जरूरी है।
| कोर्ट का केस / परिस्थिति | बैंक पर गाज गिरी या ग्राहक पर? | फैसला ऐसा होने की मुख्य वजह |
| बैंक ऑफ इंडिया (Ours/BOI Case) | बैंक दोषी (₹10 लाख जुर्माना) | बैंक ने खुद बिना पूछे घर के असली कागजात किसी और को सौंप दिए। यह 100% बैंक की प्रशासनिक लापरवाही थी। |
| बेंगलुरु एसबीआई केस (RBI Zero Liability) | बैंक दोषी (₹13 लाख रिफंड) | वहां डिजिटल स्कैम में बैंकिंग सिस्टम की तकनीकी खामी थी और ग्राहक की कोई व्यक्तिगत गलती या लापरवाही (ओटीपी शेयरिंग/लिंक क्लिक) साबित नहीं हुई थी। |
| वर्तमान दिल्ली हाई कोर्ट केस (SBI) | ग्राहक दोषी (बैंक लायबिलिटी से मुक्त) | ग्राहक ने खुद सक्रिय रूप से (Actively) एक अज्ञात लिंक पर क्लिक किया, जिससे उनके क्रेडेंशियल्स हैकर्स के हाथ लग गए। इसे कोर्ट ने ‘कस्टमर नेग्लिजेंस’ माना। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला उन सभी स्मार्टफोन और नेट बैंकिंग यूजर्स के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है जो हर आते-जाते लिंक पर क्लिक कर देते हैं। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि आपकी डिजिटल सुरक्षा की पहली जिम्मेदारी आपकी खुद की है। अगर आप खुद किसी संदेहास्पद लिंक के जाल में फंसते हैं, तो आप अपनी शिक्षा या पद की आड़ लेकर बैंक पर हर्जाने का दावा नहीं ठोक सकते।

