Department Order: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर एक महिला अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और उनकी सैलरी इंक्रीमेंट रोकने के उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
निजी रैली की आलोचना करना कदाचार नहीं: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की डिवीजन बेंच ने ‘यूपी पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल’ के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसने महिला अधिकारी को दी गई सजा को पहले ही रद्द (Quash) कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अधिकारियों ने बिना सोचे-समझे और बिना दिमाग लगाए’ (No Application of Mind) यह दंडात्मक आदेश पारित किया था। कोर्ट ने यूपी सरकार की याचिका को खारिज करते हुए बेहद सख्त टिप्पणी की और कहा कि किसी निजी रैली की आलोचना करना या उस पर टिप्पणी करना सरकार के खिलाफ कदाचार (Misconduct) नहीं माना जा सकता।
क्या था पूरा मामला? (फेसबुक पोस्ट और तिरंगा रैली का विवाद)
मामला: यह मामला साल 2018 का है, जब संबंधित महिला अधिकारी सहारनपुर संभाग में आर्थिक एवं सांख्यिकी प्रभाग (Planning Department) में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर तैनात थीं।
फेसबुक टिप्पणी: 2018 में अांबेडकर जयंती के मौके पर एक ‘तिरंगा यात्रा’ निकाली गई थी। इस पर टिप्पणी करते हुए अधिकारी ने कथित तौर पर फेसबुक पर लिखा था कि “रैली से अांबेडकर गायब थे, और उस पर ‘भगवा रंग’ हावी हो गया था।”
सरकार का एक्शन: एक अखबार की रिपोर्ट के आधार पर योजना विभाग ने इसे यूपी सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली, 1999 के तहत ‘कदाचार’ और सरकार की आलोचना माना। विभाग ने जांच बिठाई और नवंबर 2019 में सजा सुनाते हुए अधिकारी की दो सैलरी इंक्रीमेंट (Increments) को हमेशा के लिए रोक दिया और उनके सर्विस रिकॉर्ड में निंदा प्रविष्टि (Censure) दर्ज कर दी।
ट्रिब्यूनल का रुख: महिला अधिकारी ने इस सजा के खिलाफ पब्लिक सर्विस ट्रिब्यूनल का रुख किया। पिछले साल 8 दिसंबर को ट्रिब्यूनल ने सरकार के इस सजा वाले आदेश को रद्द कर दिया, जिसके खिलाफ यूपी सरकार ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: अखबार के भरोसे रहे, मूल पोस्ट तक नहीं देखी
हाई कोर्ट ने सरकार के तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए जांच प्रक्रिया की गंभीर कमियों को उजागर किया।
निजी रैली सरकार नहीं होती: कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने सिर्फ रैली में डॉ. भीमराव अांबेडकर की तस्वीर या संदर्भ न होने पर टिप्पणी की थी। बेंच ने कहा, “हम यह समझने में असमर्थ हैं कि यह टिप्पणी सरकार की आलोचना कैसे हो गई? इस पोस्ट में न तो सरकार का कोई जिक्र था और न ही उसकी किसी नीति का। वह एक ‘तिरंगा रैली’ थी जो पूरी तरह से निजी (Private Rally) थी और उसका सरकार या उसकी किसी एजेंसी से कोई लेना-देना नहीं था।
लापरवाह जांच प्रणाली: महिला अधिकारी ने शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया था कि जिस अखबार की कतरन के आधार पर उनके खिलाफ एक्शन लिया गया, उसने उनकी फेसबुक पोस्ट को सही तरीके से नहीं दिखाया था। कोर्ट ने नोट किया कि अधिकारी के इस जवाब के बाद भी जांच अधिकारियों ने कभी भी उनकी मूल (Original) फेसबुक पोस्ट को रिकॉर्ड पर लेने की जहमत नहीं उठाई और आंख मूंदकर अखबार की रिपोर्ट के भरोसे चलते रहे।
संस्थागत अनुशासनहीनता: कोर्ट ने साफ कहा कि न तो जांच अधिकारी ने और न ही अनुशासनात्मक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) ने महिला अधिकारी द्वारा अपने बचाव में दिए गए तर्कों पर विचार किया। यह दिखाता है कि सजा का आदेश बिना सोचे-समझे और दुर्भावना या लापरवाही से पारित किया गया था।
विश्लेषण: सोशल मीडिया और सरकारी कर्मचारियों के अधिकार
यह फैसला देश भर के सरकारी कर्मचारियों और सिविल सर्वेंट्स के लिए अभिव्यक्ति की आजादी के लिहाज से एक महत्वपूर्ण नजीर है।
| इम्पैक्ट एरिया | हाई कोर्ट के फैसले के मायने और सामाजिक असर |
| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा | कोर्ट ने साफ किया कि सर्विस रूल्स के तहत सरकारी नीतियों की आलोचना पर रोक है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि कोई अधिकारी देश में चल रही किसी भी सामाजिक या निजी गतिविधि पर अपनी राय नहीं रख सकता। |
| अखबारी रिपोर्ट बनाम डिजिटल साक्ष्य | डिजिटल युग में किसी भी अधिकारी पर सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कार्रवाई करने से पहले स्क्रीनशॉट या मूल यूआरएल (URL) की फॉरेंसिक जांच जरूरी है। सिर्फ अखबार की खबर के आधार पर किसी का करियर खराब नहीं किया जा सकता। |
| अधिकारियों को सुरक्षा | इस फैसले से उन नौकरशाहों को राहत मिलेगी जो अक्सर सत्ताधारी दलों या स्थानीय नेताओं के दबाव में छोटी-मोटी सोशल मीडिया पोस्ट के कारण राजनीतिक प्रतिशोध या विभागीय कार्रवाई का शिकार हो जाते हैं। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह रुख प्रशासनिक व्यवस्था को आईना दिखाने वाला है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘भगवा रंग’ या किसी ‘निजी आयोजन’ पर की गई टिप्पणी को सरकार पर हमला मान लेना अधिकारियों की अति-संवेदनशीलता और कानूनी समझ की कमी को दर्शाता है। कानून के दायरे में रहकर हर नागरिक की तरह एक सरकारी सेवक को भी बुनियादी सामाजिक टिप्पणियां करने का हक है।

