Body Donation: केरल हाई कोर्ट ने किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके शरीर (पार्थिव देह) पर अधिकार के सवाल पर एक ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सुनाया है।
ग्रीनी टॉमी बनाम केरल राज्य का मामला
हाईकोर्ट के जस्टिस ए. के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए. के. की डिवीजन बेंच ने ग्रीनी टॉमी बनाम केरल राज्य मामले में फैसला देते हुए साफ किया कि “एक जीवित व्यक्ति को अपने शरीर के भविष्य का फैसला करने का जो अधिकार है, वह उसकी मृत्यु के बाद भी उसकी शारीरिक अखंडता (Posthumous Bodily Integrity) का हिस्सा रहता है।
देहदान की अंतिम इच्छा की मांग
कोर्ट ने व्यवस्था दी कि किसी व्यक्ति की देहदान (Body Donation) की अंतिम इच्छा को परिवार के सदस्य अपनी धार्मिक प्रथाओं या दफनाने की मांग के आधार पर खारिज नहीं कर सकते। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके शरीर (पार्थिव देह) पर किसका अधिकार होना चाहिए, खुद उस व्यक्ति की वसीयत/इच्छा का या उसके परिवार की धार्मिक मान्यताओं का? इस बेहद संवेदनशील और दार्शनिक कानूनी सवाल पर एक ऐतिहासिक और फैसला अहम है।
क्या था पूरा विवाद? (भाई-बहनों के बीच बंटा परिवार)
यह भावुक कर देने वाला मामला ‘मैरी’ नाम की एक ईसाई महिला की मौत से जुड़ा है, जिनकी मृत्यु 23 फरवरी 2026 को हुई थी।
तीन बच्चों का विरोध: मैरी के तीन बच्चों (अपीलकर्ताओं) ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनका आरोप था कि उनके बाकी भाई-बहनों और जीजा ने उनकी जानकारी या सहमति के बिना मां के शव को एक सरकारी मेडिकल कॉलेज को दान कर दिया।
धार्मिक अंतिम संस्कार की मांग: इन बच्चों का तर्क था कि कानूनी वारिस होने के नाते उन्हें अपनी मां का शव वापस मिलना चाहिए ताकि वे ईसाई धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार सम्मानजनक तरीके से उन्हें दफना (Burial) सकें।
इच्छा का सम्मान: दूसरी तरफ, देहदान करने वाले बच्चों का कहना था कि उनकी मां ने अपने जीवनकाल में ही ‘केरल एनाटॉमी एक्ट, 1957’ की धारा 4A के तहत एक सहमति पत्र (Consent Letter) पर हस्ताक्षर किए थे। उन्होंने स्पष्ट इच्छा जताई थी कि मेडिकल छात्रों की पढ़ाई और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उनका शरीर दान किया जाए। उन्होंने केवल मां की आखिरी इच्छा को पूरा किया था।
हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मौत के बाद भी खत्म नहीं होती स्वायत्तता
सिंगल जज द्वारा देहदान को सही ठहराए जाने के बाद मामला डिवीजन बेंच के पास पहुंचा था। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए अपने फैसले में लिखा। कहा, अपने शरीर पर व्यक्ति की स्वायत्तता (Autonomy) मौत के साथ पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती। यदि किसी व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी मृत्यु के बाद उसके शरीर का क्या किया जाए, तो कानून उस पसंद का सम्मान और सुरक्षा करता है। यह सच है कि आमतौर पर मनुष्य एक सम्मानजनक दफन या अंतिम संस्कार चाहते हैं, लेकिन समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के रूप में इंसानों का वैज्ञानिक अध्ययन के लिए देहदान चुनना भी असामान्य नहीं है। अदालत ने आगे उदाहरण दिया कि जिस तरह कानून किसी व्यक्ति की ‘वसीयत’ (Will) को बिना शर्त मान्यता देता है, उसी तरह देहदान के फैसले को भी कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
कानून की दो बड़ी ढाल: मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम और एनाटॉमी एक्ट
केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानूनी व्यवस्था में मृत व्यक्ति की इच्छाओं को हमेशा प्राथमिकता दी गई है। इसके लिए कोर्ट ने दो प्रमुख कानूनों का हवाला दिया- मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 (Transplantation of Human Organs Act) और केरल एनाटॉमी एक्ट, 1957 (Kerala Anatomy Act)। इन दोनों कानूनों के तहत अगर किसी नागरिक ने जीते जी अंगदान या देहदान की लिखित सहमति दी है, तो परिवार के सदस्य कानूनी तौर पर उस इच्छा को पलटने का अधिकार नहीं रखते।
विश्लेषण: व्यक्तिगत अधिकार बनाम पारिवारिक भावनाएं
यह फैसला देश के उन तमाम लोगों के लिए एक मील का पत्थर है जो रूढ़िवादी सामाजिक या धार्मिक दबावों से परे जाकर समाज कल्याण के लिए अपनी देह विज्ञान को सौंपना चाहते हैं।
| पक्ष | परिवार/वारिसों का दावा | मृतक की इच्छा (कानून का रुख) |
| अधिकार का आधार | ‘कानूनी वारिस’ होने के नाते शव पर अधिकार और धार्मिक रीति से अंतिम संस्कार का भाव। | जीवनकाल में हस्ताक्षरित ‘सहमति पत्र’ और शारीरिक अखंडता (Bodily Autonomy) का अधिकार। |
| न्यायालय का निर्णय | पारिवारिक भावनाएं या धार्मिक रिवाज महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा से बड़े नहीं हो सकते। | मृतक की देहदान की वसीयत सर्वोपरि है। मेडिकल कॉलेज को दिया गया शव वहीं रहेगा। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
केरल हाई कोर्ट का यह फैसला उन लोगों को बड़ी राहत देता है जो मृत्यु के बाद भी चिकित्सा विज्ञान के माध्यम से समाज के काम आना चाहते हैं। अदालत ने साफ संदेश दिया है कि आपकी देह पर पहला और आखिरी अधिकार आपका खुद का है। अगर आपने अपनी इच्छा कानूनी रूप से दर्ज करा दी है, तो आपके जाने के बाद आपका परिवार या समाज अपनी मर्जी या धार्मिक रीति-रिवाजों को आपकी आत्मा और शरीर पर थोप नहीं सकता।

