Friday, June 5, 2026
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DNA Test: अस्थायी पद का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते…AIIMS दिल्ली के एक्टिंग डायरेक्टर संग क्या हुआ, जानिए यहां पर

DNA Test: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम किसी भी डायरेक्टर या एक्टिंग डायरेक्टर को ‘अज्ञानता’ या ‘अस्थायी पद’ का बहाना बनाकर बचने का फायदा नहीं देंगे।

एक्टिंग डायरेक्टर डॉ. निखिल टंडन के खिलाफ अवमानना का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने एम्स प्रशासन के इस रवैये को “अति-चौंकाने वाला और अजीब” करार दिया है। यह तल्ख टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली के एक्टिंग डायरेक्टर डॉ. निखिल टंडन के खिलाफ अवमानना का नोटिस (Contempt Notice) जारी करते हुए की है। कोर्ट ने यह कदम अदालत के आदेश के बावजूद हलफनामा (Affidavit) दाखिल न करने और प्रशासनिक टालमटोल रवैया अपनाने पर उठाया है। कहा, “अगर कोई व्यक्ति किसी पद पर बैठा है चाहे वह स्थायी (Substantive) क्षमता में हो या कार्यकारी/अस्थायी (Acting) क्षमता में, उसे उस पद की पूरी जिम्मेदारी उठानी होगी और अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा।

क्या था पूरा मामला? (एक रिटायरमेंट और कोर्ट का आदेश)

यह पूरा विवाद एक वैवाहिक विवाद (Matrimonial Dispute) से जुड़ा है, जिसकी सुनवाई मूल रूप से इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस केस में माता-पिता और बच्चे का डीएनए टेस्ट (DNA Test) कराने का आदेश एम्स (AIIMS) दिल्ली को दिया था।

एम्स का पहला बहाना: एम्स प्रशासन ने कोर्ट में एक रिपोर्ट दाखिल कर कहा कि जो डॉक्टर/अधिकारी इस डीएनए टेस्ट को करने के लिए जिम्मेदार थे, वे रिटायर (Superannuated) हो चुके हैं, इसलिए यह टेस्ट नहीं किया जा सकता।

कोर्ट की नाराजगी: सुप्रीम कोर्ट इस दलील पर भड़क गया। कोर्ट ने कहा कि जब डायरेक्टर को पता था कि इस केस में डीएनए टेस्ट कितना महत्वपूर्ण है और सर्वोच्च अदालत एम्स पर भरोसा कर रही है, तो वे उन रिटायर्ड अधिकारी की सेवाएं लेने के लिए कोर्ट से विशेष अनुमति मांग सकते थे। इसके बाद कोर्ट ने तत्कालीन एम्स डायरेक्टर को केस में प्रतिवादी (Respondent No. 3) बनाते हुए स्पष्टीकरण मांगा था।

‘डायरेक्टर बदल गए, इसलिए डिप्टी सेक्रेटरी से हलफनामा लगवा दिया’

जब 27 मई 2026 को इस मामले की दोबारा सुनवाई हुई, तो एम्स के वकील ने कोर्ट के सामने अजीबोगरीब दलीलें पेश कीं।

वकील की दलील: एम्स के वकील ने बताया कि पुराने डायरेक्टर साहब अब पद छोड़ चुके हैं (Demitted Office)। चूंकि पद खाली था, इसलिए एम्स के डिप्टी सेक्रेटरी (Deputy Secretary) को हलफनामा दाखिल करने के लिए अधिकृत (Authorize) कर दिया गया।

कोर्ट का वीटो: सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त आपत्ति जताई। बेंच ने कहा कि जब अदालत ने विशेष रूप से डायरेक्टर से स्पष्टीकरण मांगा था, तो यह किसी अधिकारी के विवेक पर निर्भर नहीं करता कि वह अपनी मर्जी से किसी अन्य जूनियर अधिकारी को हलफनामा दाखिल करने के लिए अधिकृत कर दे।

जब ‘एक्टिंग डायरेक्टर’ ने लिया अस्थायी होने का बहाना

आग में घी: मामला तब और गंभीर हो गया जब कोर्ट ने पूछा कि इस समय जो एक्टिंग डायरेक्टर (डॉ. निखिल टंडन) कार्यभार संभाल रहे हैं, उन्होंने हलफनामा क्यों नहीं कड़ा किया? इस पर एम्स के वकील ने जवाब दिया कि वह अभी केवल अस्थायी क्षमता (Temporary Capacity) में काम देख रहे हैं। एम्स प्रशासन के इस गैर-जिम्मेदाराना जवाब ने आग में घी का काम किया।

सुप्रीम कोर्ट की फटकार: “हम इस जवाब से न केवल हैरान हैं बल्कि स्तब्ध (Shocked) हैं। हमारा यह प्राथमिक मत (Tentative View) है कि नई दिल्ली एम्स के वर्तमान एक्टिंग डायरेक्टर ने अदालत की अवमानना की है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा आदेश और व्यक्तिगत रूप से पेश होने का फरमान

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रशासनिक लापरवाही को बर्दाश्त न करते हुए कड़े आदेश जारी किए हैं। एम्स दिल्ली के एक्टिंग डायरेक्टर डॉ. निखिल टंडन को इस मामले में व्यक्तिगत रूप से प्रतिवादी नंबर 4 (Respondent No. 4) बनाया गया है। उनके खिलाफ अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का नोटिस जारी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. निखिल टंडन को 7 जुलाई 2026 को अदालत के सामने व्यक्तिगत रूप से पेश (Personally Present) होने और इस घोर लापरवाही पर लिखित स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया है।

मुख्य केस का क्या हुआ?

अदालत की इस सख्त फटकार के बाद आखिरकार एम्स ने संबंधित पक्षों का डीएनए टेस्ट पूरा कर लिया है। रिपोर्ट में डीएनए मैच हो गया है, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य याचिका को निपटा दिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया है कि वे इस डीएनए रिपोर्ट को इलाहाबाद हाई कोर्ट के समक्ष पेश करें, जहां मुख्य वैवाहिक विवाद की सुनवाई चल रही है।

विश्लेषण: प्रशासनिक पदों पर ‘एक्टिंग’ या ‘अस्थायी’ होने का कानूनी सच

यह फैसला देश के सभी सरकारी और स्वायत्त संस्थानों (Autonomous Bodies) के प्रमुखों के लिए एक बड़ा सबक है जो ‘अस्थायी’ चार्ज मिलने पर अदालती आदेशों को हल्के में लेते हैं।

एम्स प्रशासन का भ्रमसुप्रीम कोर्ट का कानूनी सच
भ्रम: मैं तो सिर्फ कुछ समय के लिए ‘कार्यकारी’ या ‘अस्थायी’ डायरेक्टर हूं, इसलिए स्थायी नीतिगत फैसलों या अदालती जवाबदेही के लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूं।कानूनी सच: पद पर बैठते ही उस कुर्सी की सारी शक्तियां और सारी कानूनी जवाबदेही (Legal Liabilities) आपकी हो जाती हैं। आप कोर्ट के सामने ‘टेम्परेरी’ होने का बहाना नहीं बना सकते।
प्रशासनिक ढुलमुल रवैया: डायरेक्टर साहब नहीं हैं, तो किसी भी प्रशासनिक अधिकारी (डिप्टी सेक्रेटरी) के दस्तखत कराकर कोर्ट में एफिडेविट भेज दो।कानूनी सच: जब कोर्ट ने किसी विशिष्ट पद (Specific Post) से जवाब मांगा है, तो उसी रैंक के अधिकारी को जवाब देना होगा। आदेश की ऐसी अवहेलना सीधे अवमानना (Contempt) का मामला बनती है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण है। एम्स जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान में एक डीएनए टेस्ट के लिए “डॉक्टर रिटायर हो गए” या “डायरेक्टर बदल गए” जैसे बहाने बनाना यह दिखाता है कि लालफीताशाही (Red Tapism) किस कदर हावी है। अदालत ने साफ कर दिया है कि सरकारी कुर्सियां सिर्फ अधिकारों का उपभोग करने के लिए नहीं हैं; जब अदालत का डंडा चलेगा, तो एक्टिंग चीफ को भी पूरी जिम्मेदारी के साथ कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा। अब 7 जुलाई 2026 को एम्स के एक्टिंग डायरेक्टर को सुप्रीम कोर्ट के गुस्से का सामना करना होगा।

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