Friday, June 5, 2026
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Justice Delay: अगर चुनाव याचिकाओं पर समय से फैसला न हो, तो भारत में तानाशाही आ जाएगी…2016 का केस में 6 साल की सुप्रीम देरी, यह केस पढ़ें

Justice Delay: मद्रास हाई कोर्ट ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) द्वारा एक चुनावी विवाद को 6 साल तक लंबित रखने पर चिंता जताई है।

हाईकोर्ट के जस्टिस जी. जयचंद्रन की एकल पीठ ने साल 2016 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के ‘राधापुरम सीट’ विवाद पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली पर गहरा असंतोष व्यक्त किया। हाई कोर्ट ने इस पूरी देरी को “न्याय का गंभीर मज़ाक” (Grave Mockery of Justice) करार दिया है। कहा, अगर अदालतें चुनाव याचिकाओं (Election Petitions) पर समय सीमा के भीतर फैसला करने में नाकाम रहीं, तो चुनावी लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। नतीजतन, देश में तानाशाही (Autocracy) हावी हो सकती है। यह बेहद गंभीर और अभूतपूर्व चेतावनी है।

क्या था पूरा मामला? (2016 का चुनाव, 2026 में फैसला)

महज 49 वोटों से हार: यह कानूनी लड़ाई तमिलनाडु के दो बड़े नेताओं डीएमके (DMK) के एम. अप्पावु (जो वर्तमान में तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष/स्पीकर भी हैं) और एआईएडीएमके (AIADMK) के आई.एस. इनबादुरै के बीच थी। साल 2016 के विधानसभा चुनाव में राधापुरम सीट से एआईएडीएमके के इनबादुरै को 49 वोटों से विजेता घोषित किया गया था। डीएमके के अप्पावु ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनका दावा था कि उनके पक्ष में पड़े वैध पोस्टल बैलेट (Postal Ballots) को गलत तरीके से खारिज किया गया और ईवीएम (EVM) की गिनती के आखिरी तीन राउंड्स में गड़बड़ी हुई।

हाई कोर्ट ने दिया था दोबारा गिनती का आदेश: अक्टूबर 2019 में मद्रास हाई कोर्ट ने वोटों की दोबारा गिनती (Recounting) का आदेश दिया। कोर्ट ने पाया कि चुनाव अधिकारी ने 203 पोस्टल बैलेट सिर्फ इसलिए खारिज कर दिए थे क्योंकि उन पर मिडिल स्कूल के हेडमास्टरों के दस्तखत थे। हाई कोर्ट ने माना कि हेडमास्टर ‘राजपत्रित अधिकारी’ (Gazetted Officers) होते हैं, इसलिए उनके हस्ताक्षर वैध हैं।

सुप्रीम कोर्ट का स्टे और 6 साल का सन्नाटा: इनबादुरै इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए। 4 अक्टूबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने वोटों की गिनती की अनुमति तो दे दी, लेकिन नतीजे घोषित करने पर रोक (Stay) लगा दी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट की फाइलों में दब गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में क्या कहा, जिससे भड़का हाई कोर्ट?

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में तब तक लंबित रहा जब तक कि 2016-2021 का विधानसभा कार्यकाल खत्म नहीं हो गया और तमिलनाडु में दो और विधानसभा चुनाव (2021 और उसके बाद) नहीं हो गए। 21 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार इस अपील का निपटारा किया, लेकिन किसी कानूनी नतीजे पर पहुंचे बिना। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, चूंकि काफी समय बीत चुका है और संबंधित विधानसभा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका है, इसलिए अब इस कानूनी सवाल (कि हेडमास्टर गजटेड ऑफिसर हैं या नहीं) पर फैसला करने का कोई उपयोगी उद्देश्य (No Useful Purpose) नहीं रह गया है। इस सवाल को भविष्य के लिए खुला छोड़ दिया जाता है।

मद्रास हाई कोर्ट का तीखा पलटवार: ‘हम अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते’

सुप्रीम कोर्ट के इस ‘अप्रोच’ से पूरी तरह असहमत होते हुए जस्टिस जी. जयचंद्रन ने कहा कि समय बीत जाने का मतलब यह नहीं है कि हाई कोर्ट अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाए। हाई कोर्ट ने दोबारा हुई गिनती के बंद लिफाफे को खोला और पाया कि खारिज किए गए 203 पोस्टल वोटों में से 153 वोट एम. अप्पावु (DMK) को मिले थे, जबकि इनबादुरै (AIADMK) को सिर्फ 1 वोट मिला था (बाकी अमान्य थे)। इस आधार पर डीएमके के एम. अप्पावु वास्तव में 103 वोटों से यह चुनाव जीत चुके थे। हाई कोर्ट ने इनबादुरै के निर्वाचन को पूरी तरह अवैध (Void) घोषित करते हुए आधिकारिक रिकॉर्ड में एम. अप्पावु को 2016-2021 के कार्यकाल के लिए राधापुरम का वास्तविक विधायक घोषित करने का आदेश दिया।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणियां…जनता पर थोपा गया गलत प्रतिनिधि

अदालत ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act) की धारा 86(7) का हवाला दिया, जो कहती है कि चुनाव याचिकाओं का निपटारा 6 महीने के भीतर होना चाहिए। कोर्ट ने कहा, दुर्भाग्यपूर्ण शब्द भी इस मामले की गंभीरता को बताने के लिए नाकाफी है। न्याय देने की आड़ में भारत के लोगों और खासकर राधापुरम के मतदाताओं के साथ न्याय का क्रूर मज़ाक किया गया है। उन्हें 5 साल तक एक ऐसे व्यक्ति को अपना विधायक मानने पर मजबूर किया गया, जो लोकतांत्रिक रूप से चुना ही नहीं गया था।

तानाशाही की चेतावनी: “अगर अदालतें इस वैधानिक समय सीमा की अनदेखी करती रहीं, तो मुझे डर है कि हमारा देश भी उन्हीं देशों की राह पर चला जाएगा जो हमारे साथ करीब 75 साल पहले आज़ाद तो हुए थे, लेकिन आज वहां तानाशाही (Autocracy) का शासन है।”

विश्लेषण: देरी से मिले न्याय का लोकतंत्र पर असर

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय चुनाव प्रणाली और न्यायिक सुस्ती पर एक कड़ा आईना है।

विषयवास्तविक स्थिति (फैक्ट्स)न्यायपालिका का रवैया (सुप्रीम कोर्ट बनाम हाई कोर्ट)
कार्यकाल का अंत2016-2021 का कार्यकाल खत्म।सुप्रीम कोर्ट: अब समय बीत चुका है, इसलिए इस केस का फैसला करने का कोई मतलब नहीं है।
हाई कोर्ट: समय बीतने से सच नहीं बदलता। हम जनता के साथ हुए धोखे को आधिकारिक रिकॉर्ड में सुधारेंगे।
विधायक के लाभइनबादुरै 5 साल तक गलत तरीके से पद पर रहे।हाई कोर्ट का आदेश: चूंकि इसमें इनबादुरै की अपनी कोई धोखाधड़ी नहीं थी, इसलिए वे अयोग्य नहीं होंगे। लेकिन वे 2016-2021 के कार्यकाल के लिए विधायक की पेंशन पाने के हकदार नहीं होंगे

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा, जहां एक हाई कोर्ट ने अपने संवैधानिक दायित्वों को निभाते हुए सुप्रीम कोर्ट की देरी पर इतनी बेबाक टिप्पणी की है। यह फैसला याद दिलाता है कि चुनाव के फैसलों में देरी केवल ‘न्याय में देरी’ नहीं है, बल्कि यह करोड़ों मतदाताओं के मत (वोट) की हत्या है। अगर कोई गलत व्यक्ति अदालत की सुस्ती के कारण 5 साल का कार्यकाल पूरा कर लेता है, तो यह देश के लोकतंत्र के ताबूत पर सबसे आखिरी कील साबित हो सकती है।

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