Saturday, June 13, 2026
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Cognizable Offence: स्थानीय SHO के बजाय सीधे DGP के पास जाना कानूनन गलत…CrPC की प्रक्रिया के पालन करने का क्या है मामला, पढ़ें केस

Cognizable Offence: अगर किसी शिकायतकर्ता को संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की शिकायत करनी है, तो उसे सबसे पहले संबंधित पुलिस थाने के प्रभारी (SHO) के पास ही जाना होगा।

आपराधिक मामले में दर्ज की गई एफआईआर

यह महत्वपूर्ण फैसला हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने सुनाते हुए एक आपराधिक मामले में दर्ज की गई एफआईआर और उस पर आए मजिस्ट्रेट के आदेश को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है। जस्टिस राकेश कैंथला की एकल पीठ ने साफ किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 154 के तहत दी गई कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई भी मजिस्ट्रेट धारा 156(3) के तहत एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकता। स्थानीय थाने को छोड़कर सीधे पुलिस महानिदेशक (DGP) या अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाना और फिर सीधे मजिस्ट्रेट से एफआईआर (FIR) का आदेश करा लेना कानूनन पूरी तरह गलत है।”

क्या था पूरा मामला? (रसूखदारों का डर और कानूनी बाईपास)

करोड़ों का जमीन विवाद: यह मामला संजीव कुमार शर्मा नामक एक शिकायतकर्ता और कुछ रसूखदार आरोपियों के बीच जमीन के विवाद से जुड़ा है। शिकायतकर्ता संजीव शर्मा का दावा था कि उन्होंने साल 2004 में एक ‘एग्रीमेंट टू सेल’ (Agreement to Sell) के तहत आरोपियों को ₹1.49 करोड़ से अधिक का भुगतान किया था और जमीन पर कब्जा ले लिया था। उनका आरोप था कि पूरा पैसा मिलने के बाद भी आरोपी जमीन की रजिस्ट्री (Sale Deed) नहीं कर रहे थे।

धमकी और मारपीट का आरोप: शिकायतकर्ता के अनुसार, फरवरी 2024 में आरोपियों ने उनके प्लॉट पर अवैध रूप से घुसकर (Criminal Trespass) उनके और उनके मजदूरों के साथ मारपीट और गाली-गलौज की।

स्थानीय थाने को छोड़ा, सीधे DGP के पास गए: शिकायतकर्ता ने स्थानीय थाना प्रभारी (SHO) के पास जाने के बजाय सीधे राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) और अन्य सीनियर अफसरों को शिकायत भेजी। उनका तर्क था कि आरोपी सत्ताधारी दल (Ruling Party) से जुड़े रसूखदार लोग हैं, इसलिए उन्हें स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं था कि वे एफआईआर दर्ज करेंगे।

मजिस्ट्रेट का आदेश: जब वरिष्ठ अधिकारियों से भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई, तो वे सीधे इलाका मजिस्ट्रेट के पास गए। मजिस्ट्रेट ने आरोपों को गंभीर मानते हुए धारा 156(3) CrPC के तहत पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया।

हाई कोर्ट का कानूनी डंडा: सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले का हवाला

आरोपियों ने इस एफआईआर को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनके वकीलों (वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर ठाकुर और आशिमा मंडला) ने दलील दी कि यह विवाद विशुद्ध रूप से दीवानी (Civil Nature) का है और शिकायतकर्ता ने एफआईआर कराने के लिए तय कानूनी प्रक्रिया का ‘शॉर्टकट’ अपनाया है।

रंजीत सिंह बाथ बनाम केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ का हवाला

हाई कोर्ट ने इस दलील को सही माना और सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसले रंजीत सिंह बाथ बनाम केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ (2025) का हवाला देते हुए कहा, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ तौर पर तय कर दिया है कि धारा 154(1) के तहत संज्ञेय अपराध की जानकारी अनिवार्य रूप से सबसे पहले ‘थाना प्रभारी’ (Officer-in-Charge of the Police Station) को दी जानी चाहिए। यदि शिकायत थाने के बजाय सीधे किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी को दी जाती है, तो इसे धारा 154(1) का अनुपालन नहीं माना जाएगा। ऐसी स्थिति में सीधे मजिस्ट्रेट के पास धारा 156(3) के तहत जाना कानूनन वर्जित है। जस्टिस राकेश कैंथला ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हाई कोर्ट पर पूरी तरह बाध्यकारी (Binding) है, इसलिए केवल इसी तकनीकी आधार पर मजिस्ट्रेट का आदेश और दर्ज की गई एफआईआर पूरी तरह खारिज होने योग्य है।

एफआईआर दर्ज कराने की सही कानूनी सीढ़ी क्या है?

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में देश के नागरिकों और पुलिस महकमे के लिए एफआईआर दर्ज कराने की अनिवार्य क्रोनोलॉजी (Step-by-Step Procedure) को एक बार फिर स्पष्ट किया है।

धारा 154(1) CrPC: स्थानीय थाना (SHO): पहला अनिवार्य कदम के तहत किसी भी संज्ञेय अपराध की शिकायत सबसे पहले संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारी (SHO) को लिखित या मौखिक रूप से दी जानी चाहिए।

धारा 154(3) CrPC: पुलिस अधीक्षक (SP):थाने द्वारा मना करने पर, यदि स्थानीय SHO शिकायत दर्ज करने से मना या आनाकानी करता है, तब शिकायतकर्ता अपनी लिखित शिकायत रजिस्टर्ड पोस्ट या मिलकर क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक (SP/SSP) को भेज सकता है।

धारा 156(3) CrPC: इलाका मजिस्ट्रेट:आखिरी कानूनी उपाय में यदि SHO और SP दोनों स्तरों पर वैधानिक उपाय आजमाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं होती, केवल तभी शिकायतकर्ता मजिस्ट्रेट की अदालत में अर्जी लगाकर पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की गुहार लगा सकता है।

विश्लेषण: रसूखदारों के डर बनाम कानूनी प्रक्रिया की जंग

अदालत का यह फैसला साफ करता है कि कानून की नजर में प्रक्रियात्मक शुद्धता (Procedural Propriety) कितनी मायने रखती है।

शिकायतकर्ता का तर्कहाई कोर्ट का कानूनी जवाब (2026)
आरोपी सत्ताधारी दल के हैं: अगर मैं स्थानीय थाने जाता, तो आरोपियों के राजनीतिक रसूख के कारण छोटे पुलिस अधिकारी मेरी शिकायत को कूड़ेदान में डाल देते, इसलिए मैं सीधे DGP के पास गया।डर कानून बदलने का आधार नहीं: आपका डर जायज हो सकता है, लेकिन कानून आपको सीधे सर्वोच्च अधिकारी या मजिस्ट्रेट के पास कूदने (Jump) की इजाजत नहीं देता। आपको पहले थाने में ही शिकायत देनी होगी, भले ही वह खारिज हो जाए।
मजिस्ट्रेट ने अपराध पाया है: जब खुद कोर्ट ने माना कि मेरे साथ मारपीट और धोखाधड़ी हुई है, तो तकनीकी आधार पर एफआईआर रद्द करना नाइंसाफी है।तकनीकी चूक से केस खत्म: मजिस्ट्रेट तभी अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं जब उन्हें यह सबूत दिया जाए कि शिकायतकर्ता ने पहले SHO और SP का दरवाजा खटखटाया था। बिना इस सीढ़ी के आया आदेश अवैध है।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला उन सभी मुकदमों के लिए एक बड़ी नजीर है जहां लोग प्रभाव दिखाने या जल्दबाजी में सीधे बड़े अधिकारियों या कोर्ट का रुख करते हैं। कानून का सीधा संदेश है: व्यवस्था का एक तय रास्ता है, आप रसूख या डर का हवाला देकर कानून की सीढ़ियों को ‘बाईपास’ नहीं कर सकते। हालांकि, हाई कोर्ट ने शिकायतकर्ता को पूरी तरह निराश नहीं किया है; कोर्ट ने उसे छूट दी है कि वह अब कानून के मुताबिक पहले स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज कराए और प्रक्रिया का पालन करते हुए नए सिरे से अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई लड़े।

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