Wednesday, July 22, 2026
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UP Red-Tapism-I: सीएम योगी आदित्यनाथ को सीधा संदेश…भ्रष्ट और लापरवाह IAS व नौकरशाहों पर तय हो आपराधिक जवाबदेही, पढ़िए मामला

UP Red-Tapism-I: उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और प्रशासनिक ढर्रे पर लगातार तीखे प्रहार कर रहे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अब सीधे सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दरवाजा खटखटाया है।

व्यवसायी के पासपोर्ट नवीनीकरण से जुड़े मामलों की सुनवाई

हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने एक व्यवसायी के पासपोर्ट नवीनीकरण (Passport Renewal) से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए 16 पन्नों का एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक आदेश पारित किया है। कोर्ट ने ‘सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (उच्च जिम्मेदारी का सिद्धांत) अपनाने पर जोर देते हुए यूपी के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को निर्देश दिया है कि इस फैसले की प्रति सीधे मुख्यमंत्री के सामने उनके व्यक्तिगत अवलोकन (Personal Perusal) के लिए पेश की जाए। कोर्ट ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि “अब वह समय आ गया है जब विभागों की कमियों और मातहतों (subordinates) की गंभीर लापरवाहियों के लिए शीर्ष प्रशासनिक प्रमुखों और वरिष्ठ नौकरशाहों (Bureaucrats) को सीधे जवाबदेह, और जरूरत पड़ने पर आपराधिक रूप से उत्तरदायी (Criminally Liable) बनाया जाए।”

मामला क्या था? (20 साल तक लटकी रही जांच, सुलगती रहीं फाइलें)

पासपोर्ट अड़ंगा: यह पूरा मामला बरेली के एक कारोबारी अवनेश कुमार अग्रवाल की याचिका से शुरू हुआ था। बरेली की एक विशेष अदालत ने अवनेश के पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) देने से इनकार कर दिया था, जिसे उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

18 साल की देरी और जलती फाइलें: कारोबारी के खिलाफ दर्ज एक मामले की जांच लगभग दो दशकों (20 साल) से लंबित थी। दूसरे मामले में चार्जशीट पूरे 18 साल की देरी के बाद साल 2024 में दाखिल की गई। इस बीच, “कुछ अज्ञात असामाजिक तत्वों” द्वारा सरकारी दफ्तर में आग लगाकर आधिकारिक रिकॉर्ड को नष्ट करने के गंभीर आरोप भी सामने आए।

कोर्ट का फैसला: हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बरेली के क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण को नियमानुसार उनका पासपोर्ट जारी/नवीनीकृत करने का आदेश दिया।

‘मानसिक भ्रष्टाचार’ बनाम ‘बटुए का भ्रष्टाचार’: संस्थागत सड़न पर प्रहार

मानसिक भ्रष्टाचार (Corruption of the Mind): अदालत ने अपने आदेश में सरकारी तंत्र को खोखला कर रही दो तरह की बीमारियों (Institutional Decay) को बहुत खूबसूरती और कड़ाई से परिभाषित किया। जब कोई अधिकारी अपने पद और आधिकारिक अधिकार की आड़ में, अपने निजी या बाहरी हितों को साधने के लिए सरकारी निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत (Pervert) कर देता है।

बटुए का भ्रष्टाचार (Corruption of the Purse): जब कोई लोक सेवक अपने सार्वजनिक पद का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत आर्थिक लाभ और अवैध कमाई (Pecuniary Gain) के हथियार के रूप में करने लगता है। अदालत ने साफ कहा कि जहां मातहतों की लापरवाही के कारण भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिकॉर्ड को जानबूझकर दबाना, अदालती आदेशों की अवमानना या ‘स्टेट पॉलिसी’ (जैसे भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस) को लागू करने में नाकामी दिखती है, वहां सीनियर अफसरों को जेल भेजने जैसी आपराधिक धाराओं के तहत लपेटा जाना चाहिए।

2 साल तक सोती रही हाई-पावर्ड कमेटी; कोर्ट ने जताई निराशा

हाई-पावर्ड कमेटी: इस मामले के पीछे एक और बड़ी प्रशासनिक सुस्ती छिपी हुई थी। साल 2023 में हाई कोर्ट ने ‘मनीष कुमार सिंह बनाम यूपी राज्य’ मामले में सरकार को एक ‘हाई-पावर्ड कमेटी’ (High-Powered Committee) बनाने का आदेश दिया था, ताकि भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों में विभागों द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर (FIR) की समयबद्ध निगरानी की जा सके।

दिसंबर 2025 में खुली नींद: कोर्ट को बताया गया कि 2023 के आदेश के बावजूद सरकार ने करीब दो साल की देरी से, दिसंबर 2025 में इस कमेटी का गठन किया, और वह भी तब जब हाई कोर्ट ने इस मौजूदा केस में सख्ती दिखाई।

3 महीने तक नहीं दिया जवाब: कोर्ट ने इस फैसले को सुरक्षित रखने के बाद 3 महीने से ज्यादा समय तक इंतजार किया कि कमेटी अपनी प्रगति रिपोर्ट सौंपेगी, लेकिन प्रशासनिक अमले से कोई जानकारी नहीं आई। कोर्ट ने इस स्थिति को ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया।

लालफीताशाही (Red-Tapism) का असली कारण: विवेकाधिकार खोने का डर

जस्टिस विनोद दिवाकर ने नौकरशाही की मानसिकता का ऐसा ‘एक्स-रे’ किया जो प्रशासनिक सुधारों की सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई है। कहा, अदालती निर्देशों के क्रियान्वयन में सबसे बड़ा रोड़ा कुछ नौकरशाहों की वो मानसिकता है जो समावेशी (Inclusive) नहीं है। वे विवेकाधिकार (Discretionary Power) को अपने पास बचाए रखने को ही अंतिम लक्ष्य मानते हैं। लोक प्रशासन में ‘लालफीताशाही’ (Red-Tapism) के पीछे का असली कारण ही यही है कि अफसरों को डर रहता है कि नियम-कायदे आने से उनकी ‘अपनी मर्जी चलाने की ताकत’ (Discretion) छिन जाएगी। नियम और कानून इसलिए बनाए जाते हैं ताकि अफसरों की इस बेलगाम शक्ति को सीमित कर एक नियम-बद्ध संस्कृति (Rule-bound culture) स्थापित की जा सके।

मुख्य सचिव राज्य प्रशासन की मेहराब की आधारशिला हैं

अदालत ने सरकारी वकीलों (AGA) को नसीहत देते हुए याद दिलाया कि मुख्य सचिव (Chief Secretary) कोई आम पद नहीं है। वह कैबिनेट और मंत्रिपरिषद के सचिव हैं और मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार हैं। कहा, मुख्य सचिव हर मायने में राज्य प्रशासन की मेहराब की आधारशिला (Keystone of the Arch) हैं। इसलिए सरकारी वकीलों की यह जिम्मेदारी है कि वे कोर्ट में उनका प्रतिनिधित्व करते समय अत्यधिक सतर्कता, दूरदर्शिता और संस्थागत जिम्मेदारी की भावना का परिचय दें।

विश्लेषण: प्रशासनिक विफलता पर कोर्ट का हथौड़ा

मामलायूपी प्रशासनिक अमले का रवैयाइलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्देश (2026)
भ्रष्टाचार मामलों की जांच18 से 20 साल तक एफआईआर को ठंडे बस्ते में लटकाए रखना, फाइलों में आग लगना।हाई-पावर्ड कमेटी की कार्यवाही को समयबद्ध और प्रभावी ढंग से तुरंत समाप्त किया जाए।
अदालती आदेशों का पालन2023 के आदेश पर 2025 के अंत तक सोए रहना, फैसले सुरक्षित होने के बाद भी 3 महीने तक स्टेटस रिपोर्ट न देना।रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) सीधे मुख्य सचिव को प्रमाणित प्रति भेजें, जो इसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के व्यक्तिगत विचार के लिए रखेंगे।
जवाबदेही का दायराकेवल छोटे या जूनियर कर्मचारियों को सस्पेंड करके सीनियर अधिकारियों का बच निकलना।‘सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ के तहत विभागाध्यक्षों पर सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष नेतृत्व के लिए खतरे का सबसे बड़ा सायरन है। अदालत ने सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की याद दिलाते हुए गेंद उनके पाले में डाल दी है। कोर्ट का यह कहना कि नियम अफसरों की मर्जी चलाने की सनक को रोकने के लिए होते हैं, लालफीताशाही की जड़ों पर सीधा वार है। अब देखना यह है कि इस अदालती चाबुक के बाद क्या यूपी के मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री सचिवालय मिलकर उन आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की सूची तैयार करते हैं, जो फाइलों को सालों-साल दबाकर न्याय का गला घोंटते हैं।

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