UP Red-Tapism-II: प्रशासनिक अधिकारियों का स्वभाव घोड़ों की तरह चंचल होता है, इसलिए चाणक्य के अर्थशास्त्र में भी उनके कार्यों का रोजाना मूल्यांकन करने की बात कही गई है।
अपर मुख्य सचिव (गृह) पर सीधी कार्रवाई का रास्ता
जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) – ACS (Home) संजय प्रसाद के रवैये और आचरण पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उनके खिलाफ सीधी कार्रवाई का रास्ता खोल दिया है। उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और प्रशासनिक ढर्रे पर एक बार फिर ऐतिहासिक प्रहार करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद अभूतपूर्व आदेश जारी किया है। कहा, उत्तर प्रदेश में नौकरशाही की बेलगाम और अनियंत्रित शक्तियां कानून के शासन को कमजोर कर रही हैं।
केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भेजें फाइल
हाई कोर्ट ने वरिष्ठ आईएएस (IAS) अधिकारी संजय प्रसाद के आचरण की फाइल केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) भविष्य में उन्हें कोई भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने से पहले उनकी पात्रता और उपयुक्तता का मूल्यांकन कर सके। कहा, वरिष्ठ अधिकारी अदालती सुधारों को लागू करने के बजाय उन्हें टालने के लिए ‘प्रस्तावित याचिकाओं’ का बहाना बना रहे हैं, जो सीधे तौर पर कोर्ट की अवमानना है।
क्या था मामला? (एक मां की गुहार और पुलिस की नाकामी)
नाबालिग बेटी की बरामदगी की याचिका: इस पूरे विवाद की शुरुआत एक बेहद संवेदनशील मामले से हुई। मेघा रायकवार नामक महिला ने हाई कोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दायर कर अपनी 15 वर्षीय लापता बेटी को अवैध कब्जे से छुड़ाने की गुहार लगाई थी।
पुलिस की लापरवाही: सुनवाई के दौरान कोर्ट को पता चला कि पुलिस ने इस मामले में चार्जशीट तो दाखिल कर दी, लेकिन वह पूरी तरह से मुख्य आरोपियों के बयानों पर आधारित थी और ‘असली’ गुनाहगारों को आरोपी तक नहीं बनाया गया था। कोर्ट ने इस जांच को पूरी तरह से निष्पक्षता और वैज्ञानिक मानदंडों के खिलाफ पाया।
पुराने अदालती निर्देशों की अवहेलना: कोर्ट ने नोट किया कि यह चार्जशीट हाई कोर्ट द्वारा ‘सुभाष चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में दिए गए उन ऐतिहासिक और व्यापक दिशानिर्देशों के खिलाफ थी, जो पुलिस सुधारों, निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच को बढ़ावा देने के लिए जारी किए गए थे।
चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ का हवाला: नौकरशाहों पर रोजाना नजर जरूरी
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी: जस्टिस विनोद दिवाकर ने अपने फैसले की शुरुआत 2300-2400 साल पुराने चाणक्य (कौटिल्य) के अर्थशास्त्र (द्वितीय पुस्तक, अध्याय IX) के श्लोकों और सिद्धांतों को उद्धृत करते हुए की। कहा, कौटिल्य ने स्पष्ट लिखा है कि सरकारी विभागों के अधीक्षकों (अफसरों) के कार्यों की रोजाना जांच होनी चाहिए। इंसानों का दिमाग स्वभाव से चंचल होता है, वे काम के दौरान घोड़ों की तरह अपना रंग और मिजाज बदलते रहते हैं। इसलिए वे किस साधन का उपयोग कर रहे हैं, कितना खर्च कर रहे हैं और क्या परिणाम दे रहे हैं, इसका रोजाना आकलन होना चाहिए। यह प्राचीन ज्ञान आज के आधुनिक प्रशासनिक ढांचे पर भी उतना ही लागू होता है।
ACS (होम) पर कोर्ट क्यों भड़का? (‘प्रस्तावित’ सुप्रीम कोर्ट याचिका का बहाना)
जवाब-तलब: जब हाई कोर्ट ने यह जांचने के लिए उत्तर प्रदेश के 10 अलग-अलग जिलों की चार्जशीट मंगवाई, तो पाया कि कहीं भी कोर्ट के पुलिस सुधारों वाले आदेश का पालन नहीं हो रहा था। इस पर कोर्ट ने ACS (होम) से जवाब तलब किया।
नौकरशाही का बहाना: गृह विभाग ने 20 फरवरी 2026 को कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर कहा कि राज्य सरकार इस पुलिस सुधार वाले फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ‘प्रस्ताव’ (Proposed SLP) रख रही है। इसलिए, जब तक सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला न कर दे, हाई कोर्ट इस आदेश को लागू करने का दबाव न बनाए।
3 महीने तक कोई एक्शन नहीं: हाई कोर्ट ने इस उम्मीद में मामले को टाल दिया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट जाएगी। लेकिन 3 महीने से अधिक का समय बीत जाने और मूल फैसले को आए 1 साल से ज्यादा होने के बाद भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कोई याचिका (SLP) दायर नहीं की थी।
कोर्ट की फटकार: कोर्ट ने कहा कि ACS (होम) द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने की बात केवल एक बहाना थी ताकि वे अपनी नाकामी और अदालती आदेशों की अवहेलना पर पर्दा डाल सकें। यह रवैया पारदर्शिता, व्यावसायिकता और जवाबदेही में रोड़ा अटकाने वाला है।
हाई कोर्ट की केंद्र सरकार को सिफारिश: अधिकारियों की तय हो ‘आपराधिक जवाबदेही’
सिफारिश: प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के DoPT सचिव को एक बेहद कड़ा और नया कानूनी सिद्धांत ‘सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (Superior Responsibility – उच्च जिम्मेदारी का सिद्धांत) विकसित करने की सिफारिश की है।
अधीनस्थों के पाप की सजा सीनियर्स को: यदि किसी विभाग का निचला कर्मचारी या अधिकारी भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, या सरकारी आदेशों की जानबूझकर अनदेखी करता है, तो उसके लिए सीधे तौर पर उसके सीनियर अधिकारी (Hierarchy) को आपराधिक रूप से जिम्मेदार (Criminally Accountable) ठहराया जाना चाहिए।
दिमाग का भ्रष्टाचार (Corruption of Mind): कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार सिर्फ पैसों का नहीं होता (Corruption of Purse)। जब कोई अधिकारी निजी स्वार्थों या राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए अपनी आधिकारिक शक्तियों का दुरुपयोग करके निर्णय लेने की प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत करता है, तो वह ‘वैचारिक या मानसिक भ्रष्टाचार’ है, और इसके लिए सख्त सजा होनी चाहिए।
विश्लेषण: अदालती आदेश बनाम प्रशासनिक शिथिलता
यह आदेश यूपी के पुलिस महकमे और गृह विभाग में सुधारों के प्रति प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को पूरी तरह उजागर करता है।
| कोर्ट के निर्देश (सुभाष चंद्र केस) | गृह विभाग और पुलिस का जमीनी आचरण (2026) |
| वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच: पुलिस को चार्जशीट दाखिल करते समय एक तय ‘चेकलिस्ट’ का पालन करना होगा ताकि निर्दोष न फंसे और जांच पारदर्शी हो। | कागजी खानापूर्ति: फील्ड स्तर पर इस चेकलिस्ट को पूरी तरह गायब पाया गया। जिलों में पुरानी ढर्रे की, त्रुटिपूर्ण और पक्षपातपूर्ण जांच जारी रही। |
| न्यायिक आदेश की गरिमा: हाई कोर्ट के आदेशों को तत्काल पूरे राज्य में लागू किया जाए। | टालमटोल की नीति: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की केवल बातें करके महीनों तक हाई कोर्ट के सुधारवादी आदेशों को ठंडे बस्ते में डाले रखा गया। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
हालांकि मुख्य मामले में राहत की बात यह रही कि स्थानीय पुलिस ने नाबालिग लड़की को सकुशल बरामद कर उसके माता-पिता को सौंप दिया, जिसके बाद याचिका का निस्तारण कर दिया गया; लेकिन इस केस के बहाने इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी के प्रशासनिक तंत्र की रीढ़ को हिला कर रख दिया है। कोर्ट का रजिस्ट्रार को यह आदेश देना कि फाइल सीधे दिल्ली में DoPT और देश की सबसे ताकतवर ‘कैबिनेट की नियुक्ति समिति’ (ACC) को भेजी जाए, यह साफ संदेश है कि कोई भी आईएएस अधिकारी कितना भी रसूखदार क्यों न हो, वह देश के कानून और अदालती सुधारों से ऊपर नहीं हो सकता। यूपी के प्रशासनिक गलियारों में इस फैसले के बाद हड़कंप मचना तय है।

