UP Red-Tapism-III: उत्तर प्रदेश में पुलिस अधिकारियों की वफादारी संविधान (Constitution) के प्रति नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे आकाओं (Ruling Dispensation) के प्रति होती है।
यूपी सरकार को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने ‘राजेंद्र त्यागी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य में नेताओं और नौकरशाहों की ‘सामंती मानसिकता’ (Feudal Mindset) ने संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत प्रभुत्व का जरिया बना दिया है। कहा, फील्ड में तैनात अफसर ट्रांसफर-पोस्टिंग के डर से अपनी हर कार्रवाई को राजनीतिक आकाओं को खुश करने के हिसाब से तय करते हैं।”उत्तर प्रदेश की पुलिसिंग, कानून व्यवस्था और प्रशासनिक मशीनरी पर अब तक की सबसे तीखी और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी सरकार को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
‘लॉ ऑफ लैंड’ नहीं, ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग इकोनॉमी’ से चलती है पुलिस
मलाईदार जिलों का इनाम: हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यूपी पुलिस के भीतर फैले राजनीतिक संरक्षण के खेल को बेनकाब करते हुए बेहद गंभीर बातें कहीं।
अदालत ने कहा कि यह एक जगजाहिर हकीकत (Well-known fact) है कि उत्तर प्रदेश में अफसरों के तबादले, पोस्टिंग और प्रमोशन योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक वफादारी के इनाम के तौर पर होते हैं। जो अफसर नेताओं के प्रति वफादार दिखते हैं, उन्हें ‘शहरी कमिश्नरेट’ और ‘मलाईदार/कमाऊ जिले’ (Lucrative Districts) सौंपे जाते हैं। इसके विपरीत, जो स्वतंत्र रूप से काम करने की हिम्मत दिखाते हैं, उन्हें सजा के तौर पर महत्वहीन जगहों (Punitive Transfers) पर फेंक दिया जाता है।
संविधान को दरकिनार करना: कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की कि अधिकारियों का एक बड़ा हिस्सा कानून के शासन (Rule of Law) को संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपने काम में एक ‘प्रशासनिक अड़चन’ (Operational Inconvenience) मानता है।
एनकाउंटर, गैंगस्टर एक्ट और मनमानी गिरफ्तारियों पर उठाए सवाल
बिना प्रक्रिया के गिरफ्तारियां: हाई कोर्ट ने पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग का जिक्र करते हुए उन मुद्दों को छुआ जो यूपी में लगातार चर्चा का विषय बने रहते हैं। अदालत ने कहा कि राज्य में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जा रही हैं। अपने निहित स्वार्थों और एजेंडे को पूरा करने के लिए या तो फर्जी एफआईआर दर्ज की जाती हैं, या फिर असली शिकायतों को दबा दिया जाता है। प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक निरोध) के प्रावधानों का इस्तेमाल अफसरों की सनक के हिसाब से हो रहा है।
कानून को धोखा देना: कोर्ट के मुताबिक, पहले सीआरपीसी (CrPC) और अब नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के सुरक्षात्मक प्रावधानों को सरेआम बाईपास किया जा रहा है। यूपी पुलिस अदालती आदेशों का कागजी तौर पर तो पालन करती है, लेकिन उसकी मूल भावना को पूरी तरह से मार देती है।
हाई कोर्ट के रोंगटे खड़े करने वाले शब्द: “एनकाउंटर किलिंग (Encounter Killings), चुनिंदा तरीके से की जाने वाली कार्रवाई (Selective Crackdowns), और असुविधाजनक लोगों के खिलाफ ‘गैंगस्टर एक्ट’ का टारगेटेड इस्तेमाल ऐसी चीजें हैं जो समय-समय पर न्यायपालिका के संज्ञान में आती रही हैं।”
बिकरू कांड का उदाहरण: ‘8 पुलिसवालों की मौत के जिम्मेदार अफसर को सिर्फ चेतावनी!’
मामला: अदालत ने यूपी पुलिस में फैली जवाबदेही की कमी और आंतरिक संरक्षण को समझाने के लिए साल 2020 के कुख्यात बिकरू कांड (जिसमें गैंगस्टर विकास दुबे को पकड़ने गई पुलिस टीम पर हमला हुआ था और एक डीएसपी सहित 8 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे) का उदाहरण दिया। हाई कोर्ट ने हैरान होते हुए नोट किया कि उस पूरे ऑपरेशन की देखरेख करने वाले और सुपरवाइजरी फेलियर (प्रशासनिक लापरवाही) के जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारी को सरकार ने सजा के नाम पर केवल एक औपचारिक ‘चेतावनी’ (Formal Caution) देकर छोड़ दिया।
कोर्ट की टिप्पणी: “8 पुलिसकर्मियों की शहादत जैसी गंभीर लापरवाही के बदले इतना हल्का रवैया अपनाना समझ से परे है। संस्थागत ढीठपन (Institutional Impunity) का यही वो कल्चर है जो अधिकारियों को बेलगाम और गैर-जवाबदेह बनाता है।”
होम सेक्रेटरी (गृह सचिव) पर भी गंभीर आरोप
हाई कोर्ट ने केवल निचले पुलिसकर्मियों पर ही नहीं, बल्कि लखनऊ में बैठे शीर्ष अधिकारियों पर भी उंगली उठाई। कोर्ट ने कहा कि गृह सचिव (Home Secretary) जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे कुछ अधिकारी निष्पक्ष संवैधानिक निर्णय लेने के बजाय व्यक्तिगत और बाहरी स्वार्थों को पूरा करने वाले ‘माध्यम’ (Conduits) के रूप में काम करते रहे हैं। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया कि वह अपने गृह विभाग के अधिकारियों की कार्यकुशलता और पात्रता का स्वतंत्र मूल्यांकन करे।
विश्लेषण: ‘गैंगस्टर एक्ट’ की आड़ में मनमानी?
यह पूरा मामला यूपी गैंगस्टर एक्ट (UP Gangsters Act, 1986) के तहत दर्ज एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान सामने आया। चूंकि सुप्रीम कोर्ट भी इस समय इस कानून के दुरुपयोग से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रहा है, इसलिए जस्टिस दिवाकर ने इस पर कोई अंतिम फैसला तो नहीं सुनाया, लेकिन यूपी पुलिस का पूरा कच्चा चिट्ठा जरूर खोल दिया।
| यूपी पुलिस की कार्यशैली (हाई कोर्ट के अनुसार) | संवैधानिक मर्यादा (अनुच्छेद 14 और 21) |
| राजनीतिक वफादारी: सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए कानून की धाराओं (जैसे गैंगस्टर एक्ट) का चुनिंदा इस्तेमाल। | समानता का अधिकार: कानून सभी के लिए समान होना चाहिए, इसे किसी चुनिंदा व्यक्ति को निशाना बनाने या राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार नहीं बनाया जा सकता। |
| प्रक्रिया का उल्लंघन: अदालती आदेशों और कानूनी सुरक्षा उपायों (BNSS/CrPC) को केवल फाइलों में पूरा दिखाना, जमीन पर मनमानी करना। | जीने और स्वतंत्रता का अधिकार: किसी भी नागरिक को बिना उचित और न्यायसंगत कानूनी प्रक्रिया के गिरफ्तार या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। |
बॉटमलाइन (The Bottom Line)
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला उत्तर प्रदेश की मौजूदा प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था के मुंह पर एक ज़ोरदार कानूनी तमाचा है। कोर्ट ने बेहद साफ शब्दों में संदेश दे दिया है कि “संवैधानिक शासन को किसी व्यक्ति की सुविधा या राजनीतिक दल के फायदे के लिए बंधक नहीं बनाया जा सकता। राज्य की मशीनरी केवल और केवल भारत के संविधान के प्रति जवाबदेह है, किसी सत्ताधारी दल के प्रति नहीं।” यह टिप्पणी आने वाले समय में यूपी में होने वाले एनकाउंटर्स, बुलडोजर कार्रवाइयों और गैंगस्टर एक्ट के मुकदमों में अदालती रुख को तय करने में मील का पत्थर साबित होगी।

