Wednesday, July 22, 2026
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Empanelled Officer: अपनी ईमानदारी के लिए देश भर में मशहूर आईएएस अशोक खेमका…यह भेदभाव बर्दाश्त नहीं, जानिए पूरे केस के बारे में

Empanelled Officer: पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट से अपने 34 साल के करियर में 57 तबादले झेलने वाले और अपनी ईमानदारी के लिए देश भर में मशहूर हरियाणा कैडर के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी अशोक खेमका को एक बड़ी कानूनी जीत मिली है।

हाईकोर्ट के जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की डिवीजन बेंच ने 29 मई को दिए अपने फैसले में साफ कहा कि नियमों में ढील (Relaxation) देने के मामले में केंद्र सरकार का रुख खेमका के प्रति भेदभावपूर्ण था, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (अवसर की समानता) का सीधा उल्लंघन है। हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए निर्देश दिया है कि अशोक खेमका को भविष्य के किसी भी असाइनमेंट या पदस्थापना के लिए केंद्र सरकार के एम्पैनल्ड अतिरिक्त सचिव के रूप में माना जाए।

क्या था पूरा विवाद? (क्यों अटका था एम्पैनलमेंट?)

1991 बैच के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका 30 अप्रैल 2025 को सेवामुक्त (Superannuated) हुए थे। उन्होंने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के जुलाई 2023 के उन तीन आदेशों को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिन्होंने केंद्र सरकार में अतिरिक्त सचिव/सचिव स्तर पर उनके एम्पैनलमेंट के दावे को खारिज कर दिया था।

केंद्र सरकार का नियम: केंद्र सरकार का नियम है कि किसी भी आईएएस अधिकारी को एडिशनल सेक्रेटरी या सेक्रेटरी रैंक पर एम्पैनल (सूचीबद्ध) होने के लिए कम से कम ३ साल तक केंद्र में डेपुटेशन (केंद्रीय प्रतिनियुक्ति) पर ‘डिप्टी सेक्रेटरी या उससे ऊपर’ के पद पर काम करना अनिवार्य है। खेमका ने यह शर्त पूरी नहीं की थी।

खेमका की दलील: खेमका ने अदालत में साबित किया कि ऐसे कई आईएएस अधिकारी हैं जिनके पास केंद्र सरकार में इस रैंक पर काम करने का शून्य (Nil) अनुभव था, लेकिन केंद्र सरकार ने नियमों में ढील (Relaxation) देकर उन्हें अतिरिक्त सचिव के पद पर एम्पैनल कर दिया। तो फिर उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया गया?

हाई कोर्ट का कड़ा रुख: जब दूसरों को छूट दी, तो खेमका को क्यों नहीं?

हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने केंद्र सरकार की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

समानता का सिद्धांत (Parity): कोर्ट ने कहा कि जब केंद्र सरकार के पास नियमों में ढील देने का अधिकार है और उसने कई अन्य आईएएस अधिकारियों को यह छूट दी है, तो खेमका को इससे वंचित रखना सीधे तौर पर भेदभाव (Discrimination) है।

कोई अंतर नहीं: अदालत ने नोट किया कि केंद्र सरकार ऐसा कोई भी ठोस या अलग तथ्य (Differentiating Fact) कोर्ट के सामने नहीं रख सकी जो अशोक खेमका को उन अन्य अधिकारियों से अलग करता हो जिन्हें छूट दी गई थी।

अधिकारों का उल्लंघन: कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक जैसे हालात वाले अधिकारियों के बीच ऐसा दोहरा मापदंड अपनाना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। इसलिए खेमका को भी अन्य अधिकारियों के समान ही लाभ (Parity) मिलना चाहिए।

रिटायरमेंट के बाद अब इस फैसले के क्या मायने हैं?

अशोक खेमका पिछले साल ही रिटायर हो चुके हैं, ऐसे में कोर्ट ने इस फैसले के व्यावहारिक क्रियान्वयन को लेकर स्थिति साफ की।

भविष्य के असाइनमेंट का रास्ता साफ: हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं और एम्पैनलमेंट का मुख्य उद्देश्य केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति पर लाना होता है, इसलिए वर्तमान में उन्हें सीधे पद का लाभ तो नहीं दिया जा सकता। लेकिन, भविष्य के उन सभी असाइनमेंट्स, ट्रिब्यूनल पदों, या सरकारी समितियों (Future Assignments) के लिए जहां उन अधिकारियों को प्राथमिकता दी जाती है जो केंद्र के अतिरिक्त सचिव/सचिव के रूप में एम्पैनल्ड रहे हों, अशोक खेमका को भी उन्हीं के समकक्ष (Equal Footing) माना जाएगा।

विश्लेषण: अशोक खेमका के करियर और इस फैसले के निहितार्थ

पहलूविवरण और कानूनी प्रभाव
ईमानदारी की कीमत और पहचानखेमका अपने ३४ साल के करियर में ५७ तबादलों के लिए जाने जाते हैं। वे २०१२ में तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की गुरुग्राम भूमि सौदे के म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) को रद्द कर दिया था।
कैट (CAT) का आदेश पलटाहाई कोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया जिसने खेमका की याचिका को खारिज कर दिया था।
प्रशासनिक व्यवस्था को संदेशयह फैसला नौकरशाही में बैठे उन ईमानदार अफसरों के लिए एक संबल है जो राजनीतिक या प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि नियमों का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से प्रताड़ित करने के लिए नहीं किया जा सकता।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का यह फैसला अशोक खेमका के शानदार और बेदाग करियर पर न्यायपालिका की एक तरह से अंतिम मुहर है। अदालत ने साफ कर दिया कि नियम सभी के लिए बराबर होने चाहिए और किसी भी अधिकारी को उसकी ‘सच्चाई और कड़े स्टैंड’ के कारण प्रशासनिक भेदभाव का शिकार नहीं बनाया जा सकता। भले ही यह फैसला उनके रिटायरमेंट के बाद आया है, लेकिन इसने उनके सेवा-रिकॉर्ड की गरिमा को बहाल किया है और भविष्य में मिलने वाली महत्वपूर्ण भूमिकाओं के लिए उनके दरवाजे खोल दिए हैं।

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