EPFO Defraud: दिल्ली की एक विशेष सीबीआई (CBI) अदालत ने देश की राजधानी में करीब 22 साल पुराने एक हाई-प्रोफाइल भ्रष्टाचार के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
सीबीआई के विशेष न्यायाधीश अतुल कृष्ण अग्रवाल ने 6 जून के अपने आदेश में इस बात पर गहरी चिंता जताई कि 2004 के इस मामले में फैसला आने में दो दशक से अधिक का समय लग गया। जज ने टिप्पणी करते हुए कहा, यह एक कड़वी सच्चाई है कि भारत में मुकदमों में देरी होना अब एक सामान्य विशेषता बन गई है। इसके लिए हर पक्षकार जिम्मेदार है चाहे वे पार्टियां हों, उनके वकील हों, जांच एजेंसी हो या फिर कभी-कभी खुद अदालत ही क्यों न हो। अदालत ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और आम जनता से ₹83 लाख की धोखाधड़ी करने के मामले में 9 आरोपियों को दोषी करार दिया है।
क्या था ₹83 लाख का ‘मास्टरमाइंड’ घोटाला? (The Modus Operandi)
यह पूरा मामला 12 अप्रैल 2004 को दिल्ली के क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त (पेंशन) कार्यालय द्वारा दर्ज कराई गई एक शिकायत से शुरू हुआ था। सीबीआई ने 21 मई 2004 को ईपीएफओ दिल्ली कार्यालय के एक लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC), कुछ अज्ञात अधिकारियों और निजी व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। जांच में जो साजिश सामने आई, वह बेहद हैरान करने वाली थी:
फर्जी कंपनियां और भूतिया कर्मचारी: आरोपियों ने ‘मैसर्स इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजीज इंडिया लिमिटेड’ (M/s ITIL) और ‘मैसर्स इंडियन रोड कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन’ (M/s IRCC) नाम की कंपनियों के नाम पर फर्जी/गैर-मौजूद (Fictitious) कर्मचारियों की एक लंबी सूची तैयार की।
दस्तावेजों में जालसाजी: ईपीएफओ के भ्रष्ट अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए इन काल्पनिक कर्मचारियों के नाम पर पेंशन दावों (Pension Claims) की फाइलें आगे बढ़ाईं। इसके लिए विभाग के भीतर रखे जाने वाले फॉर्म, वर्कशीट और लेजर कार्ड जैसे आधिकारिक दस्तावेजों को फर्जी तरीके से तैयार किया गया और सक्षम अधिकारी से क्लीयरेंस ले ली।
सीधे बैंक में पैसा: ईपीएफओ से सीधे चेक संबंधित बैंकों में भेजे गए। इसके बाद बैंकों में जमा हुई सरकारी रकम को आरोपियों ने आपस में बांट लिया।
आम और मासूम लोगों को कैसे बनाया ‘मोहरा’?
अदालत ने गवाहों के बयानों के आधार पर पाया कि आरोपियों ने जनता को ठगने और खुद को बचाने के लिए एक बेहद शातिर तरीका (Modus Operandi) अपनाया था।
बैंक खातों का जुगाड़: आरोपी भोले-भाले और मासूम लोगों के पास जाते थे और यह झूठा बहाना बनाते थे कि ‘हमारा अपना कोई बैंक खाता नहीं है और बाहर से हमारे कुछ पैसे आने हैं, इसलिए कृपया अपना अकाउंट नंबर दे दीजिए।’ जो लोग राजी नहीं होते थे, उन्हें पैसों का लालच दिया जाता था।
पहचान छिपाने की ट्रिक: आरोपियों ने ईपीएफओ के फॉर्म में इन गवाहों के असली नाम और बैंक खाते तो सही भरे, लेकिन अन्य व्यक्तिगत विवरण गलत डाल दिए।
पैसे की निकासी: जैसे ही ईपीएफओ से फर्जी पेंशन का पैसा उन खातों में क्रेडिट होता, आरोपी उन मासूम लोगों को बैंक ले जाते या उनसे ब्लैंक चेक (Blank Cheque) ले लेते थे। वे खुद पैसे निकालते थे ताकि बैंक के कागजों में केवल उन खाताधारकों के हस्ताक्षर रहें और पुलिस जांच में आरोपी खुद बच सकें।
पीड़ितों पर ही आ गई आफत: इन मासूम लोगों को भनक तब लगी जब ईपीएफओ के अधिकारी उनके घर पहुंचे और बताया कि उनके खातों में गलत तरीके से पैसा आया है। कई पीड़ितों को तो अपनी जेब से या कर्ज लेकर ईपीएफओ को पैसे लौटाने पड़े, क्योंकि आरोपियों ने उन्हें पैसे वापस करने से साफ मना कर दिया था। रिकॉर्ड के अनुसार, इनमें से किसी भी गवाह ने कभी उन कंपनियों में काम नहीं किया था।
विश्लेषण: अदालती फैसला और कानूनी धाराएं
अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष (CBI) आरोपियों के खिलाफ “संदेह से परे” मामला साबित करने में सफल रहा है। हालांकि, लंबी देरी के कारण ‘जालसाजी’ (Forgery) के पुख्ता सबूतों के अभाव में कोर्ट ने कुछ धाराओं में राहत भी दी।
| इन धाराओं के तहत पाए गए दोषी | अपराध का विवरण |
| धारा 120B IPC | आपराधिक साजिश रचना (Criminal Conspiracy)। |
| धारा 420 IPC | धोखाधड़ी करना और बेईमानी से संपत्ति हड़पना (Cheating)। |
| धारा 13(1)(d) और 13(2) PC Act | भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवकों द्वारा अपने पद का दुरुपयोग कर आपराधिक कदाचार करना। |
| इन धाराओं से हुए बरी | कोर्ट ने पर्याप्त सबूत न होने के कारण आरोपियों को धारा 467, 468 और 471 (जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल) के आरोपों से बरी कर दिया। |

