Tuesday, June 9, 2026
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Sentence Imposing: दोषमुक्ति का फैसला पलटने वाली अपील अदालत खुद सुनाए सजा…अदालती प्रक्रियाओं से जुड़े इस कानूनी व्यवस्था को पढ़िए

Sentence Imposing: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक न्याय प्रणाली और अदालती प्रक्रियाओं से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण मामले में बड़ी कानूनी व्यवस्था दी है।

कलकत्ता हाई कोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच के फैसले को किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कलकत्ता हाई कोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच के उस फैसले को रद्द (Set Aside) कर दिया, जिसमें हाई कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराने के बाद सजा तय करने के लिए मामला वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई अपील अदालत (Appellate Court), किसी आरोपी को निचली अदालत से मिली दोषमुक्ति (Acquittal) के फैसले को पलटकर उसे दोषी (Guilty) ठहराती है, तो वह सजा तय करने (Sentence Imposing) के लिए मामले को वापस ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) नहीं भेज सकती। अपील अदालत को खुद ही दोषी को सजा के बिंदु पर सुनना होगा और सजा सुनानी होगी।

यह रही CrPC की धारा 386(a) की व्याख्या

सर्वोच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 386(a) की व्याख्या करते हुए अपने फैसले में कहा, “CrPC की धारा 386(a) से यह स्पष्ट है कि जब दोषमुक्ति के आदेश के खिलाफ किसी अपील की सुनवाई करते समय अदालत आरोपी को दोषी पाती है, तो कानून के अनुसार उसे खुद ही सजा पारित करनी होती है। यदि अपील अदालत पहली बार दोषमुक्ति के फैसले को उलटकर आरोपी को दोषी ठहरा रही है, तो उसे खुद ही दोषी को सजा के बिंदु पर सुनना होगा। वह दोषसिद्धि (Conviction) दर्ज करने के बाद केवल सजा सुनाने के उद्देश्य से मामले को निचली अदालत को नहीं सौंप सकती। ऐसा करना स्थापित नियमों और इस अदालत के फैसलों के विपरीत होगा।”

क्या था पूरा मामला? (अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का केस)

आरोप और निचली अदालत का फैसला: यह पूरा कानूनी विवाद अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की एक निचली अदालत से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता (आरोपी) पर भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म), 312 (गर्भपात कराना) और 417 (छल करना) के तहत मुकदमा चला था। सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया था।

हाई कोर्ट का आदेश: दोषमुक्ति के इस फैसले के खिलाफ कलकत्ता हाई कोर्ट की पोर्ट ब्लेयर सर्किट बेंच में अपील दायर की गई। हाई कोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और आरोपी को दोषी ठहराया।

हाई कोर्ट की प्रक्रियात्मक चूक: आरोपी को दोषी ठहराने के बाद हाई कोर्ट ने उसे निर्देश दिया कि वह ट्रायल जज के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) करे। साथ ही निचली अदालत को आदेश दिया कि वह आरोपी को हिरासत में ले और सजा के बिंदु पर कानूनी सुनवाई करने के बाद उसे धारा 376 और 312 के तहत उचित सजा सुनाए।

हाई कोर्ट के इसी प्रक्रियात्मक आदेश (Impugned Order) से असंतुष्ट होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

“सजा सुनना और सुनाना अपील अदालत का अनिवार्य कर्तव्य है”

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि हाई कोर्ट ने आरोपी को केवल सजा भुगतने के लिए वापस निचली अदालत भेजकर एक बड़ी कानूनी चूक (Error) की है। जस्टिस के.वी. विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि “अपील अदालत को न केवल आरोपी को दोषी पाने के बाद केवल सजा तय करने के लिए मामले को ट्रायल कोर्ट में रिमांड (वापस) नहीं भेजना चाहिए, बल्कि यह उसका अनिवार्य कर्तव्य (Bounden Duty) है कि वह खुद दोषी पक्ष को सुने और उचित सजा तय करे।”

विश्लेषण: CrPC की धारा 386(a) और अदालती अधिकार

अदालत ने इस फैसले में स्पष्ट किया कि जब कोई ऊपरी अदालत किसी बरी हुए व्यक्ति को पहली बार दोषी मानती है, तो सजा के निर्धारण की पूरी जिम्मेदारी उसी अदालत की हो जाती है।

कानूनी पहलूसुप्रीम कोर्ट की व्याख्या और निर्देश
धारा 386(a) CrPCयह धारा अपील अदालत को दोषमुक्ति के आदेश को पलटने, दोषी ठहराने और कानून के अनुसार सजा सुनाने की स्पष्ट शक्ति और जिम्मेदारी देती है।
न्यायिक मिसाल का हवालासुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए ‘कुमार एक्सपोर्ट्स बनाम शर्मा कारपेट्स (2009)’ जैसे पुराने लैंडमार्क फैसलों का संदर्भ दिया।
मामले में अंतिम निर्देशसुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार (Partly Allowed) करते हुए हाई कोर्ट को आदेश दिया है कि वह खुद एक तारीख तय करे और सजा के मुद्दे पर दोषी को सुनकर अंतिम फैसला सुनाए।
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