Right to Reputation: सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर ‘पब्लिक शेमिंग’ (सार्वजनिक रूप से बदनाम करने) और किसी व्यक्ति के ‘सम्मान के अधिकार’ (Right to Reputation) से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भूयान की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर सीधे किसी को आरोपी बनाने की प्रवृत्ति पर गंभीर सवाल उठाए। शीर्ष अदालत ने एक महिला पत्रकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सह-यात्री पर लगाए गए छेड़छाड़ के आरोपों वाले सोशल मीडिया पोस्ट को हटाने (Take Down) के अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई थी।
यह रही जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी
जस्टिस नागरत्ना ने याचिकाकर्ता से पूछा, आप सोशल मीडिया पर क्यों गईं और खुद को इस तरह उजागर किया? सोशल मीडिया पर जाकर आप कहती हैं कि आप पीड़िता हैं और उधर कोई व्यक्ति अपनी नौकरी से सस्पेंड हो जाता है। इसके परिणामों को देखिए, उसने अपनी नौकरी खो दी है। हर जगह इसे फैलाते मत घूमिए। इसीलिए वह (पुरुष सह-यात्री) कह रहा है कि यह मानहानिकारक (Defamatory) है।
क्या है पूरा मामला? (मुंबई-दिल्ली फ्लाइट की घटना)
यह कानूनी विवाद इस साल 11 मार्च को एक्स (ट्विटर) पर किए गए एक पोस्ट से शुरू हुआ था। एक 24 वर्षीय महिला पत्रकार ने आरोप लगाया था कि मुंबई से दिल्ली की फ्लाइट के दौरान एक पुरुष सह-यात्री ने उसका यौन उत्पीड़न (Sexual Harassment) किया। पत्रकार ने उस व्यक्ति की तस्वीर के साथ इस घटना को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया था।
नौकरी गई और मानहानि का केस: इस पोस्ट के वायरल होने के बाद उस पुरुष को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद उसने दिल्ली हाई कोर्ट में महिला के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया और अंतरिम राहत के रूप में उस पोस्ट को हटाने की मांग की।
हाई कोर्ट का आदेश: दिल्ली हाई कोर्ट के सिंगल जज ने पोस्ट हटाने का आदेश दिया, जिसे बाद में हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विनोद कुमार) ने भी सही ठहराया। हाई कोर्ट ने कहा था कि चूंकि महिला पहले ही इस मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज करा चुकी है, इसलिए सोशल मीडिया से पोस्ट को अस्थायी रूप से हटाने से उसके कानूनी अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
कोर्ट रूम बहस: “सिर्फ तथ्य कहे” बनाम “सम्मान का अधिकार”
पत्रकार के वकील की दलील: “मेरी मुवक्किल 24 साल की पत्रकार है और यौन हिंसा की शिकार है। उसने सोशल मीडिया पर तथ्यों के अलावा कुछ नहीं कहा। मानहानि के लिए इरादा दुर्भावनापूर्ण या पूरी तरह से झूठा होना चाहिए। आरोपी तुरंत हाई कोर्ट भागा और अंतरिम राहत ले आया।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: जस्टिस नागरत्ना ने दलीलों को खारिज करते हुए कहा, “सामने वाले के पास भी सम्मान का अधिकार (Right to Reputation) है। यदि आपको लगता है कि केस गलत है, तो आप मुख्य मुकदमे (Civil Suit) को ही खारिज करवा दीजिए, लेकिन सोशल मीडिया पर इस तरह किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
विश्लेषण: फ्री स्पीच बनाम राइट टू प्राइवेसी पर अदालतों का कानूनी स्टैंड
दिल्ली हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, इस मामले में अदालतों ने अभिव्यक्ति की आजादी और किसी व्यक्ति के करियर व सम्मान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।
| कानूनी बिंदु | अदालतों की व्याख्या और निष्कर्ष |
| अनुच्छेद 19(1)(a) (Free Speech) | हाई कोर्ट ने साफ किया कि बोलने की आजादी पूर्ण (Absolute) नहीं है, इस पर तार्किक प्रतिबंध हैं। किसी व्यक्तिगत अनुभव को साझा करने और किसी की तस्वीर लगाकर उसे कानूनी फैसले से पहले ही ‘निश्चित रूप से दोषी’ साबित कर देने में बड़ा अंतर है। |
| अनुच्छेद 21 और 19(1)(g) | आरोपी पुरुष के पास भी सम्मान से जीने, निजता (Privacy) और अपने पेशे/नौकरी (Profession) को बनाए रखने का संवैधानिक अधिकार है, जिसे बिना कानूनी दोषसिद्धि के छीना नहीं जा सकता। |
| अदालत की सख्त मौखिक टिप्पणी | जस्टिस नागरत्ना ने नाराजगी में यहां तक कह दिया कि यदि ऐसे ही (बिना कानूनी जांच के) आरोप लगते रहे, तो भविष्य में थिएटरों, मैरिज हॉलों और सार्वजनिक स्थानों पर पुरुषों और महिलाओं को पूरी तरह अलग-अलग (Segregation) बैठाने के दिशानिर्देश जारी करने पड़ेंगे ताकि कोई आरोपी ही न बन सके। |

