Tuesday, June 9, 2026
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Fit Person: मठाधिपति के धार्मिक और प्रशासनिक अधिकारों को स्थाई रूप से अलग नहीं कर सकती सरकार…’श्री स्वामी हाथीरामजी मठ’ का यह केस जानिए

Fit Person: देश की सर्वोच्च अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता, मठों की स्वायत्तता और मठाधिपति (Mahant/Mathadhipati) के अधिकारों को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने तिरुपति के ऐतिहासिक ‘श्री स्वामी हाथीरामजी मठ’ के 21वें मठाधिपति अर्जुन दास को हटाने के आंध्र प्रदेश सरकार के आदेश को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) कर दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने मठ का कामकाज देखने के लिए सरकारी अधिकारी (Fit Person) की नियुक्ति के फैसले को भी खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार किसी भी मठाधिपति के धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष (Secular/प्रशासनिक) कार्यों को स्थाई रूप से अलग करके किसी सरकारी अधिकारी या ‘फिट पर्सन’ (Fit Person/प्रशासक) को नहीं सौंप सकती। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षित ‘महंतशिप’ की मूल अवधारणा का सीधा उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया

मठाधिपति (महंत) की अवधारणा में आध्यात्मिक और सांसारिक (प्रशासनिक) दोनों जिम्मेदारियां एक दूसरे में घुली-मिली (Blended) होती हैं। पद और संपत्ति, कर्तव्य और व्यक्तिगत हित के इन दो तत्वों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। कोई भी ऐसी व्यवस्था जो कानूनी मठाधिपति के पद पर रहते हुए उसके प्रशासनिक और धर्मनिरपेक्ष कार्यों को स्थाई रूप से विभाजित करती है, या उन्हें अनिश्चित काल के लिए किसी सरकारी कस्टोडियन को सौंपती है, वह ‘महंतशिप’ के वजूद को ही नकारने जैसी है।

क्या था मामला? (मठ पर कब्जे की 23 साल पुरानी कानूनी लड़ाई)

महंत की नियुक्ति: यह विवाद आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित प्रसिद्ध श्री स्वामी हाथीरामजी मठ से जुड़ा है, जिसका तिरुमला मंदिर से गहरा ऐतिहासिक संबंध है। अर्जुन दास साल 1970 से इस मठ से जुड़े हैं और अपने गुरु के इकलौते जीवित शिष्य होने के नाते साल 2000 में ‘अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अनी अखाड़ा पंचायत’ द्वारा उन्हें स्थाई मठाधिपति स्वीकार किया गया था।

सरकार से पुराना टकराव: साल 2003 से ही आंध्र प्रदेश के बंदोबस्ती विभाग (Endowments Department) ने उनकी नियुक्ति को रद्द कर मठ के प्रशासनिक मामलों को अपने हाथ में लेने की कोशिश की थी, लेकिन हाई कोर्ट के आदेश के बाद 2006 में प्रबंधन दोबारा अर्जुन दास को सौंपना पड़ा था।

2023 में निलंबन और बेदखली: साल 2017 में अखबारों में छपी कुछ खबरों (अनियमितताओं के आरोप) के आधार पर आंध्र प्रदेश धार्मिक परिषद (Dharmika Parishad) ने जून 2023 में अचानक महंत अर्जुन दास पर 16 आरोप लगाते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया। अधिकारियों ने न केवल मठ पर भौतिक कब्जा कर लिया, बल्कि महंत को उनके निवास स्थान से भी बेदखल कर दिया। इसके बाद नवंबर 2023 में उन्हें पद से हटाने का अंतिम आदेश जारी कर दिया गया, जिसे हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा: यह सरकार का कानूनी दिवालियापन है?

सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र प्रदेश सरकार और धार्मिक परिषद द्वारा की गई जांच प्रक्रिया की धज्जियां उड़ाते हुए इसे ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों’ (Principles of Natural Justice) का क्रूर उल्लंघन बताया।

कागजात छुपाए, जांच का नाटक किया: महंत को 27 पन्नों का चार्ज मेमो और 600 पन्नों के 29 सहायक दस्तावेज कभी सौंपे ही नहीं गए। जब सरकार ने दलील दी कि उन्होंने नोटिस मठ के दरवाजे पर चिपका दिए थे, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे “कानूनी दिवालियापन और हास्यास्पद” (Legal Absurdity) करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जब आपने खुद व्यक्ति को उसके घर से बेदखल कर ताला लगा दिया, तो आप उसी बंद दरवाजे पर नोटिस चिपकाकर यह दावा कैसे कर सकते हैं कि उसे सूचना मिल गई थी?

शिकायतकर्ता ही जज बन बैठा (Bias): कोर्ट ने पाया कि जिस 3-सदस्यीय जांच कमेटी ने महंत को दोषी ठहराया, उसमें उसी धार्मिक परिषद के सदस्य शामिल थे जिसने उनके खिलाफ केस शुरू किया था। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की कि “कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में खुद जज नहीं हो सकता।”

विश्लेषण: सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और अनुच्छेद 142 का उपयोग

चूंकि राज्य सरकार की मंशा पर पूर्वाग्रह (Bias) का गहरा संदेह था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 (असाधारण पूर्ण न्याय की शक्ति) का इस्तेमाल कर एक स्वतंत्र निष्पक्ष व्यवस्था लागू की है।

वर्तमान स्थिति और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशविवरण और मुख्य बिंदु
महंत अर्जुन दास की बहालीसुप्रीम कोर्ट ने अर्जुन दास को तत्काल प्रभाव से मठाधिपति के पद पर बहाल कर दिया है।
स्वतंत्र जांच का आदेशपुरानी जांच रिपोर्ट को रद्द कर, सेवानिवृत्त जिला जज बोद्देपल्ली रामा राव की एक-सदस्यीय स्वतंत्र समिति बनाई गई है, जो प्राकृतिक न्याय के तहत नए सिरे से निष्पक्ष जांच करेगी।
प्रशासनिक समिति का गठनजांच पूरी होने तक मठ की संपत्तियों की सुरक्षा और पारदर्शी कामकाज के लिए सेवानिवृत्त हाई कोर्ट जज जस्टिस दुप्पला वेंकट रमना की अध्यक्षता में 6-सदस्यीय प्रशासनिक समिति बनाई गई है।
संवैधानिक सुरक्षा कवचकोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकारें अनुच्छेद 26 के तहत मिले धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों को कुचल नहीं सकतीं। किसी आध्यात्मिक प्रमुख को हटाने की प्रक्रिया ‘पूरी तरह निष्पक्ष, तटस्थ और न्यूनतम दखल देने वाली’ होनी चाहिए।
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