Tuesday, June 9, 2026
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Retirement Benefits: बकाया गुजारा भत्ते के लिए पति की पेंशन नहीं रोक सकती पत्नी…रिट याचिका भी नहीं होगी कारगर, पढ़ें पूरा फैसला

Retirement Benefits: वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) के आदेशों को लागू कराने की कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर मदरास हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है।

हाईकोर्ट के जस्तिस मुम्मिनेनी सुधीर कुमार की एकल पीठ ने 4 जून के अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रखरखाव के आदेशों का पालन न होने पर कानूनन सही मंच (Appropriate Forum) पर जाना होगा, न कि सीधे हाई कोर्ट। अदालत ने कहा है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी को कोर्ट द्वारा तय किया गया गुजारा भत्ता नहीं दे रहा है, तो भी पत्नी हाई कोर्ट में रिट याचिका (Writ Petition) दायर करके सीधे तौर पर पति की पेंशन या सेवानिवृत्ति के लाभों (Retirement Benefits) को रुकवा नहीं सकती।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए सख्त लहजे में कहा, इस अदालत को याचिकाकर्ता और तीसरे प्रतिवादी (पति-पत्नी) के बीच के विवादों को सुलझाने के लिए एक ‘एक्जीक्यूशन कोर्ट’ (निष्पादन अदालत) या ‘फैमिली कोर्ट’ में तब्दील नहीं किया जा सकता। यदि याचिकाकर्ता ने अपने पति के खिलाफ गुजारा भत्ते का मुकदमा जीता है और उसका पालन नहीं हो रहा है, तो यह उसका काम है कि वह उस आदेश को लागू कराने के लिए संबंधित सक्षम अदालत में निष्पादन कार्यवाही (Execution Proceedings) शुरू करे।

क्या था पूरा मामला? (परिवहन निगम के कर्मचारी की पत्नी की अर्जी)

यह मामला राजम्माल (Rajammal) नामक महिला द्वारा दायर एक रिट याचिका से जुड़ा था।

महिला की मांग: राजम्माल ने तमिलनाडु राज्य परिवहन निगम कर्मचारी पेंशन फंड ट्रस्ट और परिवहन निगम के महाप्रबंधक को यह निर्देश देने की मांग की थी कि उनके अलग रह रहे पति एन. तमिलमणि (N Tamilmani) को मिलने वाले पेंशन और फंड के पैसों पर रोक लगाई जाए।

दलील: महिला का तर्क था कि अदालत ने उसके पक्ष में गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित किया था, जो आज भी प्रभावी है। चूंकि उसका पति इस आदेश का सम्मान नहीं कर रहा है और बकाया राशि का भुगतान नहीं कर रहा है, इसलिए उसकी पेंशन को तब तक रोका जाए जब तक वह भुगतान न कर दे।

हाई कोर्ट ने रिट याचिका (अनुच्छेद 226) पर क्या कहा?

सरकारी प्राधिकारियों ने किसी अधिकार का उल्लंघन नहीं किया

अदालत ने याचिका को पूरी तरह से ‘गलत धारणा’ (Misconceived) पर आधारित माना और रिट क्षेत्राधिकार के दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। न्यायाधीश ने नोट किया कि यह पूरी तरह से एक पारिवारिक और दीवानी प्रकृति का विवाद है। याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत उसके पति के खिलाफ है, न कि उन सरकारी अधिकारियों (परिवहन निगम) के खिलाफ जो पेंशन बांटने के लिए जिम्मेदार हैं। जब तक किसी सार्वजनिक प्राधिकरण (Public Authority) द्वारा किसी नागरिक के कानूनी या संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जाता, तब तक संवैधानिक अनुच्छेद 226 के तहत ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (परमादेश रिट) जारी नहीं की जा सकती।

निष्पादन (Execution) के लिए कानून में अलग रास्ते हैं

हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि यदि कोई पक्ष अदालत के आदेश की अवहेलना करता है, तो देश का कानून (जैसे CrPC/BNSS या सिविल प्रक्रिया संहिता) उस आदेश को जबरन लागू करवाने के लिए विशिष्ट उपाय प्रदान करता है। पत्नी के पास पति की संपत्ति कुर्क कराने या सैलरी/पेंशन का हिस्सा अदालत के माध्यम से अटैच कराने के लिए निचली अदालत में जाने का वैधानिक रास्ता खुला हुआ है।

विश्लेषण: रिट याचिका (Writ) और निष्पादन अदालत (Execution Court) में अंतर

हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए अदालतों के क्षेत्राधिकार की सीमा रेखा को एक बार फिर स्पष्ट किया है।

कानूनी मंचमुख्य कार्य और दायराइस मामले में कोर्ट का निष्कर्ष
हाई कोर्ट (रिट क्षेत्राधिकार)असाधारण शक्तियों के तहत मौलिक और संवैधानिक अधिकारों के हनन पर सरकारी तंत्र के खिलाफ आदेश जारी करना।यहां पेंशन विभाग ने कोई गलती नहीं की, इसलिए रिट याचिका विचारणीय (Maintainable) नहीं है।
फैमिली कोर्ट / निष्पादन अदालतपूर्व में दिए गए डिक्री या भरण-पोषण के आदेशों को लागू कराने के लिए वारंट जारी करना या संपत्ति कुर्क करना।पत्नी को बकाया राशि वसूलने के लिए इसी कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा।
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