Friday, July 31, 2026
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Insurance Case: गृहिणियों के अमूल्य योगदान को पैसों में नहीं तोला जा सकता…कार हादसे में मारी गई महिला का कितना मुआवजा बढ़ाया, पढ़िए केस

Insurance Case: कोलकाता हाई कोर्ट ने सड़क हादसों में जान गंवाने वाली गृहिणियों (Homemakers/Housewives) के मुआवजे को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

निस्वार्थ योगदान के बदले में किसी भी मौद्रिक राशि का सटीक निर्धारण करना संभव नहीं

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस बिश्वरूप चौधरी ने टिप्पणी की, एक पत्नी या मां द्वारा अपने परिवार (पति और बच्चों) को दी जाने वाली सेवाओं और निस्वार्थ योगदान के बदले में किसी भी मौद्रिक राशि (रुपयों) का सटीक निर्धारण करना संभव नहीं है। अदालत को ऐसे मामलों में आश्रितों को ऐसा मुआवजा देना चाहिए जो न्यायसंगत, तर्कसंगत और पर्याप्त हो। अदालत ने साफ किया है कि एक पत्नी या मां द्वारा परिवार के लिए दिए जाने वाले निस्वार्थ योगदान, देखभाल और भावनात्मक समर्थन को किसी गणितीय फॉर्मूले या पैसों के पैमाने पर सटीक रूप से नहीं मापा जा सकता।

कार हादसे में बची एकमात्र छोटी बेटी के पक्ष में फैसला सुनाया

बीमा कंपनी बजाज आलियांज की आपत्तियों को खारिज करते हुए जस्टिस बिश्वरूप चौधरी की एकल पीठ ने वर्ष 2022 के एक दर्दनाक कार हादसे में बची एकमात्र छोटी बेटी के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने मृत गृहिणी के पारिवारिक योगदान के महत्व को स्वीकार करते हुए उनके मुआवजे की राशि को बढ़ाकर 11 लाख रुपये कर दिया, साथ ही उनके दिवंगत पति (घर के मुख्य कमाऊ सदस्य) के लिए 2 करोड़ रुपये से अधिक के मुआवजे को भी सही ठहराया।

क्या था पूरा मामला? (एक झटके में उजड़ गया था हंसता-खेलता परिवार)

यह मामला 16 अप्रैल 2022 का है, जब शमित सामंत अपनी पत्नी बरनाली सामंत नंदी और अपनी दो बेटियों (सिंजिनी और सानवी) के साथ कार से जा रहे थे:

हाइवे पर भीषण टक्कर: राष्ट्रीय राजमार्ग-6 (NH-6) पर हरिणा बस स्टैंड के पास उनकी कार बीच सड़क पर खड़े एक मिनी-ट्रक से टकरा गई।

तीन लोगों की मौत, एक मासूम बची: इस भयावह एक्सीडेंट में शमित, उनकी पत्नी बरनाली और उनकी बड़ी बेटी सिंजिनी की मौके पर ही मौत हो गई। उनकी छोटी बेटी सानवी इस हादसे में गंभीर रूप से घायल हुई, लेकिन वह बच गई। परिवार की ओर से आरोप लगाया गया कि मिनी-ट्रक को बिना किसी वॉर्निंग सिग्नल या इंडिकेटर के लापरवाही से हाइवे के बीचों-बीच पार्क किया गया था।

ट्रिब्यूनल का फैसला: वर्ष 2024 में मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) ने पति शमित की मौत पर ₹2.10 करोड़ से अधिक और गृहिणी पत्नी बरनाली की मौत पर ₹9.17 लाख का मुआवजा तय किया था। इसके खिलाफ बीमा कंपनी हाई कोर्ट पहुंच गई थी।

बीमा कंपनी की दलीलें और हाई कोर्ट का कड़ा रुख

बीमा कंपनी बजाज आलियांज ने मुख्य रूप से दो तर्क देकर मुआवजा कम करने या लायबिलिटी (जवाबदेही) से बचने की कोशिश की, जिन्हें हाई कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया:

‘ट्रक तो खड़ा था, ड्राइवर की क्या गलती?’: बीमा कंपनी का तर्क था कि दुर्घटना के समय मिनी-ट्रक स्थिर (Stationary) था, इसलिए टक्कर के लिए उसके ड्राइवर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट का पलटवार: अदालत ने पुलिस की चार्जशीट और चश्मदीदों के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि ‘गलत और लापरवाही से पार्क की गई गाड़ी’ भी उतनी ही जिम्मेदार है। अगर आप बिना किसी चेतावनी संकेत के किसी व्यस्त हाइवे के बीच में गाड़ी खड़ी करते हैं, तो आप दूसरे वाहन चालकों के लिए जानलेवा खतरा पैदा कर रहे होते हैं।

‘दादी-नानी संभाल लेंगी तो मुआवजा क्यों?’: बीमा कंपनी का एक और अमानवीय तर्क था कि चूंकि अब परिवार में कोई और (जैसे दादी या नानी) बच्चों की देखभाल के लिए आगे आ सकता है, इसलिए गृहिणी की सेवाओं के नुकसान का मुआवजा कम होना चाहिए।

कोर्ट का पलटवार: जज ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि कोई भी घरेलू नौकर या परिवार का कोई दूसरा करीबी रिश्तेदार (जैसे दादी-नानी) उस निस्वार्थ प्रेम, व्यक्तिगत देखभाल और मार्गदर्शन की जगह कभी नहीं ले सकता, जो एक सगी मां अपने बच्चों को और एक पत्नी अपने पति को देती है। इसलिए आश्रितों के मुआवजे में कोई कटौती नहीं की जा सकती।

मुआवजे में बढ़ोतरी: गृहिणी के श्रम का सम्मान

हाई कोर्ट ने परिवार की सामाजिक स्थिति और बरनाली द्वारा निभाई जाने वाली अनगिनत जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए ट्रिब्यूनल द्वारा तय किए गए ₹9.17 लाख के मुआवजे को नाकाफी माना। कोर्ट ने इसे संशोधित करते हुए 11 लाख रुपये कर दिया और आदेश दिया कि दावा याचिका दायर करने की तारीख से इस राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी दिया जाए।

इसके अतिरिक्त, घर के मुख्य कमाने वाले सदस्य शमित सामंत की मौत के एवज में ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए 2.10 करोड़ रुपये से अधिक के मुआवजे को भी हाई कोर्ट ने पूरी तरह जायज ठहराते हुए बरकरार रखा।

विश्लेषण: मोटर एक्सीडेंट क्लेम कानून में ‘गृहिणी’ की परिभाषा

यह फैसला देश की अदालतों द्वारा घरेलू कामकाजी महिलाओं (Homemakers) के श्रम को आर्थिक और कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक और बड़ा कदम है।

कानूनी और आर्थिक पहलूकोर्ट का दृष्टिकोण और इसके मायने
‘सेवा’ (Services) का व्यापक अर्थकानूनन ‘घरेलू काम’ का मतलब केवल खाना बनाना या झाड़ू-पोछा करना नहीं है। इसमें बच्चों की पढ़ाई, उनका मानसिक-भावनात्मक विकास और पूरे घर का प्रबंधन शामिल है।
कोई निश्चित फॉर्मूला नहींचूंकि कोई फिक्स सैलरी नहीं होती, इसलिए कोर्ट को परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर एक सम्मानजनक ‘काल्पनिक आय’ (Notional Income) मानकर मुआवजा तय करना होता है।
लापरवाह पार्किंग पर कड़ा संदेशयह फैसला उन वाहन चालकों और बीमा कंपनियों के लिए भी सबक है जो हाइवे पर कहीं भी गाड़ी खड़ी कर देते हैं। स्थिर वाहन भी दुर्घटना के लिए उतना ही कसूरवार माना जाएगा।

बॉटमलाइन (The Bottom Line)

कलकत्ता हाई कोर्ट का यह संवेदनशील निर्णय समाज के उस चश्मे को बदलता है जो एक हाउसवाइफ के काम को ‘बिना सैलरी का काम’ मानकर उसकी वैल्यू कम आंकता है। अदालत ने साफ कर दिया कि भले ही गृहिणियां सीधे तौर पर पैसा कमाकर घर न लाती हों, लेकिन उनके बिना किसी भी परिवार का आर्थिक और मानसिक ढांचा खड़ा नहीं रह सकता। इस दुखद हादसे में अनाथ हुई मासूम बच्ची ‘सान्वी’ के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए कोर्ट ने बीमा कंपनी की सभी तकनीकी दलीलों को किनारे लगाते हुए पीड़ित परिवार को न्यायसंगत मुआवजा सुनिश्चित किया है।

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