Friday, July 31, 2026
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Parked Vehicle: हादसे के वक्त खड़ी गाड़ी भी क्यों होगी जिम्मेदारी…कलकत्ता हाई कोर्ट ने दिया जवाब

Parked Vehicle: राष्ट्रीय राजमार्ग पर लापरवाही से गाड़ी खड़ी कर हादसों को न्योता देने वाले वाहन मालिकों और बीमा कंपनियों को कलकत्ता हाई कोर्ट (Calcutta High Court) ने बेहद सख्त संदेश दिया है।

टक्कर के वक्त वाहन स्थिर था

हाई कोर्ट के जस्टिस बिश्वरूप चौधरी की एकल पीठ ने अपने फैसले में निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया। इसके साथ ही, 2022 में हुए इस दर्दनाक सड़क हादसे में जान गंवाने वाली एक गृहणी (Housewife) के योगदान को अमूल्य मानते हुए उसके मुआवजे को बढ़ाकर ₹11 लाख कर दिया। इस हादसे में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत हो गई थी। अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई वाहन हाईवे के बीच में अवैध या गैर-पार्किंग क्षेत्र में खड़ा है, तो वह केवल इस बहाने अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि टक्कर के वक्त वह ‘स्थिर’ (Stationary) था।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने बीमा कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए अपनी विधिक टिप्पणी में कहा, केवल यह तर्क देना कि वाहन स्थिर खड़ा था, उसके मालिक या चालक को दायित्व से मुक्त नहीं करता। यदि वाहन को किसी अनुचित, अवैध या अनधिकृत स्थान पर पार्क किया गया था और वही पार्किंग दुर्घटना का प्राथमिक कारण बनी, तो लापरवाही शत-प्रतिशत वाहन चालक की ही मानी जाएगी।

दर्दनाक हादसा: धूल के गुबार के बीच काल बनी खड़ी मिनी-ट्रक (16 अप्रैल 2022)

यह कानूनी विवाद राष्ट्रीय राजमार्ग-6 (NH-6) पर पश्चिम मेदिनीपुर के हरीना बस स्टैंड के पास हुए एक भीषण एक्सीडेंट से जुड़ा है।

तबाही का वो मंजर: 16 अप्रैल 2022 की सुबह करीब 9 बजे, शमित सामंत अपनी कार (WB-82E/2293) से पत्नी बरनाली सामंत नंदी और दो नाबालिग बेटियों (सिंजिनी और सानवी) के साथ कोलकाता से मिदनापुर जा रहे थे। इसी दौरान एक तेज रफ्तार लॉरी ने उनकी कार को बाईं तरफ से ओवरटेक किया और कच्चे रास्ते पर उतर गई, जिससे हवा में धूल का भारी गुबार छा गया और दृश्यता (Visibility) शून्य हो गई।

अवैध पार्किंग बनी काल: उसी वक्त, एक मिनी-ट्रक (WB-33/5717) बिना किसी इंडिकेटर या सिग्नल के हाईवे के ठीक बीचों-बीच (न नॉपार्किंग ज़ोन में) खड़ा था। धूल के कारण शमित सामंत को वह ट्रक दिखाई नहीं दिया और उनकी कार सीधे मिनी-ट्रक के पिछले हिस्से में जा घुसी।

हंसता-खेलता परिवार खत्म: इस भीषण टक्कर में शमित सामंत और उनकी पत्नी बरनाली की मौके पर ही मौत हो गई। बड़ी बेटी सिंजिनी ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। छोटी बेटी सानवी के दोनों घुटनों में गंभीर चोटें आईं और केवल वही इस हादसे में जिंदा बची।

निचली अदालत (Trial Court) का फैसला और बीमा कंपनी की आपत्तियां

पीड़ित परिवार की ओर से दो अलग-अलग मोटर एक्सीडेंट क्लेम (MAC) केस पश्चिम मेदिनीपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट में दायर किए गए थे। बीमा कंपनी बजाज आलियांज (Bajaj Allianz) ने दोनों मामलों में क्लेम देने का विरोध किया।

20 अगस्त 2024 को निचली अदालत ने गृहणी (बरनाली) के मामले में ₹9,17,000 और घर के एकमात्र कमाने वाले शमित के मामले में ₹2,10,79,100 का मुआवजा 6% ब्याज के साथ मंजूर किया था। बीमा कंपनी ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी, जिसके खिलाफ पीड़ित पक्ष ने भी मुआवजा बढ़ाने के लिए क्रॉस-ऑब्जेक्शन दाखिल किया।

विश्लेषण: हाई कोर्ट में बीमा कंपनी के कुतर्कों की हवा निकली

जस्टिस बिश्वरूप चौधरी ने बीमा कंपनी द्वारा उठाए गए तकनीकी और विधिक दावों की विस्तृत समीक्षा की और उन्हें सिरे से खारिज कर दिया।

दिन का उजाला था और ट्रक खड़ा था, यह दलील खारिज

बीमा कंपनी का तर्क था कि हादसा सुबह 9 बजे दिन के उजाले में हुआ था, इसलिए दृश्यता की कोई समस्या नहीं थी और कार तेज रफ्तार में थी।

कोर्ट का रुख: कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट साफ तौर पर मिनी-ट्रक ड्राइवर को अवैध पार्किंग का दोषी मानती है। जब हाईवे के बीचों-बीच गाड़ी खड़ी करना ही अवैध है, तो दिन के उजाले या रात के अंधेरे का तर्क देकर ड्राइवर अपनी गलती नहीं छुपा सकता।

चश्मदीद गवाहों (Eye Witnesses) की विश्वसनीयता पर सवाल

बीमा कंपनी ने दलील दी कि कोर्ट में गवाही देने वाले दो चश्मदीद (PW-2 और PW-4) अदालत द्वारा समन किए गए गवाह नहीं थे, बल्कि उन्हें पीड़ित परिवार ने खुद बुलाया था।

कोर्ट का रुख: कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि मोटर एक्सीडेंट क्लेम मामलों में केवल इसलिए किसी चश्मदीद की गवाही को झूठा नहीं माना जा सकता क्योंकि उसे समन नहीं किया गया था। महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से एक गवाह का नाम पुलिस चार्जशीट में भी दर्ज था और क्रॉस-एग्जामिनेशन में यह साबित हुआ कि उन्होंने हादसा देखा था।

गृहणी के घरेलू काम का मूल्यांकन: सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों की छाप

इस केस का सबसे महत्वपूर्ण विधिक पहलू मृतक बरनाली सामंत नंदी (housewife) के मुआवजे का निर्धारण था। निचली अदालत ने एक गृहणी की काल्पनिक मासिक आय (Notional Income) केवल ₹5,000 महीना मानी थी, जिसे हाई कोर्ट ने बेहद कम पाया।

जस्टिस चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010)’ का हवाला देते हुए गृहणी के काम की महत्ता को रेखांकित किया।

अमूल्य योगदान: एक पत्नी और मां द्वारा परिवार के लिए किया गया योगदान अमूल्य है, जिसे केवल पैसों के तराजू में नहीं तोला जा सकता।

चौबीस घंटे की ड्यूटी: एक गृहणी बिना किसी छुट्टी के दिन-रात परिवार की सेवा करती है, बच्चों को पढ़ाती है और उनके भविष्य का मार्गदर्शन करती है। एक नौकरानी या कामवाली कभी भी मां और पत्नी का स्थान नहीं ले सकती।

मुआवजे में बढ़ोतरी: इस विधिक सिद्धांत के आधार पर हाई कोर्ट ने गृहणी की काल्पनिक आय के पैमाने को सुधारते हुए कुल मुआवजे को ₹9,17,000 से बढ़ाकर ₹11,00,00,000 (11 लाख रुपये) कर दिया।

विश्लेषण: कलकत्ता हाई कोर्ट का अंतिम आदेश मैट्रिक्स

क्लेम केस का विवरणनिचली अदालत का आदेश (2024)कलकत्ता हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय (2026)
मकान मालिक/कमाऊ सदस्य (शमित सामंत क्लेम)₹2,10,79,100 + 6% ब्याजबरकरार रखा गया। बीमा कंपनी की अपील और परिवार की ‘फिलायल कंसोर्टियम’ (संतान सुख का हर्जाना) की मांग दोनों खारिज।
गृहणी (बरनाली सामंत नंदी क्लेम)₹9,17,000 + 6% ब्याजसंशोधित और वर्धित। मुआवजे को बढ़ाकर ₹11,00,000 किया गया।
ब्याज दर (Interest Rate)6% प्रति वर्ष6% प्रति वर्ष (दावा दायर करने की तारीख से आदेश की तारीख तक)।
भुगतान की समय सीमाबजाज आलियांज को आदेश की कॉपी मिलने के 8 सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास राशि जमा करानी होगी।
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