Friday, July 31, 2026
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POCSO Act: उप्र में 5 वर्षों में 525 नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताएं हुईं गर्भवती; ऐसे में गर्भपात से ‘व्यवस्थित इनकार’ पर क्यों लगी सरकार को फटकार

POCSO Act: उत्तर प्रदेश में नाबालिग बलात्कार पीड़िताओं को चिकित्सा और विधिक सहायता मिलने में हो रही घोर लापरवाही पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है।

उत्तरजीवी (Survivor) के दादा ने दायर की थी याचिका

हाई कोर्ट के जस्टिस विनोद दिवाकर ने एक बौद्धिक विकलांगता (Intellectual Disabilities) से पीड़ित 17 वर्षीय नाबालिग पीड़िता उत्तरजीवी (Survivor) के दादा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। पीड़िता का परिवार गर्भपात (Abortion) की अनुमति के लिए 54 दिनों तक अधिकारियों के चक्कर काटता रहा, लेकिन सिस्टम की निष्क्रियता के कारण गर्भावस्था इतनी बढ़ गई कि अंततः पीड़िता को बच्चे को जन्म देना पड़ा।

उप्र सरकार से डेटा किया तलब

अदालत ने इसे पीड़िताओं के कानूनी अधिकारों का “व्यवस्थित इनकार” (Systematic Denial) और “संस्थागत विफलता” (Institutional Failure) करार दिया है। अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसका दायरा बढ़ाया और पूरे उत्तर प्रदेश का डेटा तलब किया, जिसके बाद राज्य की कानून और स्वास्थ्य व्यवस्था की चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आईं।

कोर्ट के सामने आए आंकड़े: दावों और हकीकत का बड़ा अंतर

पुलिस महानिदेशक (DGP) और अन्य प्राधिकारियों द्वारा दाखिल हलफनामों के आधार पर कोर्ट ने निम्नलिखित विचलित करने वाले विधिक और सांख्यिकीय निष्कर्ष निकाले।

5 वर्षों में 525 गर्भधारण: पिछले पांच वर्षों में उत्तर प्रदेश में अविवाहित नाबालिग बलात्कार पीड़िताओं के गर्भवती होने के 525 मामले आधिकारिक रूप से दर्ज किए गए।

24 करोड़ की आबादी, 11 साल में सिर्फ 106 मेडिकल बोर्ड: कोर्ट ने नोट किया कि २०१३ से २०२३ के बीच (११ वर्षों में) पूरे राज्य से केवल १०६ पीड़िताओं को गर्भपात सहायता के लिए मेडिकल बोर्ड के सामने पेश किया गया। जस्टिस दिवाकर ने टिप्पणी की, लगभग 24 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में, 11 वर्षों में औपचारिक मेडिकल बोर्ड ढांचे के तहत केवल 106 प्रक्रियाएं की गईं—यानी 75 जिलों में प्रति वर्ष 10 से भी कम मामले। यह संख्या राज्य में बच्चों के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा के दर्ज पैमाने की तुलना में बेहद असंतुलित और चिंताजनक है।

क्षेत्रीय विसंगतियां (Zone-wise Patterns): आंकड़ों के अनुसार, लखनऊ जोन में सबसे अधिक मामले (115 मामले – राज्य का 21.9%) दर्ज किए गए। वहीं सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह रहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े शहर गोरखपुर में, जहां बाल कल्याण समिति (CWC) के पास मामलों का सबसे भारी बोझ है, वहां कागजों पर ‘शून्य’ (Zero) मामले दर्ज थे। कोर्ट ने माना कि वास्तविक संख्या पुलिस रिकॉर्ड से कहीं अधिक है, क्योंकि कई मामले रिपोर्ट ही नहीं हो पाते।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के सख्त राज्य-व्यापी निर्देश (State-wide Directions)

अदालत ने माना कि पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act), जेजे अधिनियम (Juvenile Justice Act) और गर्भ का चिकित्सा समापन अधिनियम (MTP Act) का जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। इसे सुधारने के लिए कोर्ट ने गाइडलाइंस जारी की हैं।

फील्ड अधिकारियों (Field Officers) और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों (CMOs) के लिए निर्देश

एक दिन की भी देरी नहीं: यदि कोई बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग गर्भवती पाई जाती है, तो उसे बिना एक भी दिन गंवाए संबंधित जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) के सामने पेश किया जाएगा ताकि उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का आकलन कर गर्भपात पर त्वरित निर्णय लिया जा सके।

अनिवार्य विधिक काउंसलिंग: सीएमओ को मेडिकल रिपोर्ट पर ही यह प्रमाणित करना होगा कि मेडिकल बोर्ड ने पीड़िता और उसके माता-पिता/अभिभावक को एमटीपी अधिनियम, 1971 के प्रावधानों और इसके चिकित्सा, विधिक व मनोवैज्ञानिक प्रभावों के बारे में पूरी काउंसलिंग दी है।

कार्यात्मक मेडिकल बोर्ड: प्रमुख सचिव (चिकित्सा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, यूपी) को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य के प्रत्येक जिले में एमटीपी अधिनियम की धारा 3(2-बी) के तहत एक विधिवत गठित और पूरी तरह सक्रिय ‘मेडिकल बोर्ड’ मौजूद हो।

उत्तर प्रदेश सरकार (State Government) के लिए नीतिगत निर्देश

विशेषज्ञ समिति का गठन: उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) बनाने का निर्देश दिया गया है। इसमें शिक्षाविद, शोधकर्ता, डेटा वैज्ञानिक, नीति विशेषज्ञ, नौकरशाह और डॉक्टर शामिल होंगे।

जवाबदेही तंत्र (Accountability Mechanism): यह समिति एक ऐसा संस्थागत ढांचा तैयार करेगी जो पॉक्सो एक्ट, जेजे एक्ट और एमटीपी एक्ट के तहत अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रहने वाले अधिकारियों (पुलिस और डॉक्टरों) की जवाबदेही और सजा तय कर सके।

व्यापक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक अध्ययन: राज्य को बलात्कार के मामलों, उसके परिणामस्वरूप पैदा हुए बच्चों, छोड़े गए बच्चों और पीड़िताओं के आघात (Trauma) व पुनर्वास की अपेक्षाओं को समझने के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण और मनोवैज्ञानिक अध्ययन कराने का आदेश दिया गया है।

नए कानूनी ढांचे की सिफारिश (A New Legal Framework)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील कानूनी सिफारिश की है। “यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप किसी अविवाहित नाबालिग (Minor) से पैदा होने वाले बच्चे के स्वतंत्र अधिकारों की रक्षा के लिए राज्य सरकार को एक अलग और विशिष्ट कानूनी ढांचा (Separate Legal Framework) बनाने की आवश्यकता पर विचार करना चाहिए।” अदालत ने कहा कि ऐसा कानून बनाते समय सरकार इस आदेश के तहत गठित विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों और निष्कर्षों को आधार बना सकती है।

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