Monday, June 15, 2026
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Electoral Bribery: धन का सीधा संबंध मतदाता और मतदान से क्यों होना जरूरी, चुनावी रिश्वतखोरी के केस से इसका जवाब जानिए

Electoral Bribery: मद्रास हाईकोर्ट ने चुनावी शुचिता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

चुनाव के समय धन जब्त या वितरित किया गया था

हाई कोर्ट की जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी की एकल पीठ ने अपने आदेश में तिरुचिरापल्ली (Trichy) के एक राजनीतिक पदाधिकारी के खिलाफ निचली अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल इसलिए कि चुनाव के समय धन जब्त या वितरित किया गया था, किसी व्यक्ति पर तब तक चुनावी रिश्वतखोरी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता जब तक कि उस धन का सीधा संबंध (Nexus) किसी मतदाता या मतदान के अधिकार से साबित न हो।

यह रही अदालत की टिप्पणी

अदालत ने लोकतंत्र में चुनावों के महत्व और फौजदारी कानून (Criminal Law) की मर्यादा को रेखांकित करते हुए अपनी विधिक टिप्पणी में कहा, “चुनाव संवैधानिक लोकतंत्र की जीवनधारा (Lifeblood) हैं। रिश्वतखोरी के जरिए चुनावी धारा को दूषित करने के किसी भी प्रयास से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। लेकिन साथ ही, आपराधिक अभियोजन (Criminal Prosecution) कानूनी रूप से संज्ञेय आरोपों और स्वीकार्य साक्ष्यों पर ही आधारित होना चाहिए। फौजदारी कानून की महिमा केवल दोषियों को दंडित करने में नहीं है, बल्कि समान रूप से एक नागरिक को मुकदमे की अग्निपरीक्षा से बचाने में भी है, जब कथित अपराध के बुनियादी कानूनी तत्व (Ingredients) ही गायब हों।”

मामला क्या था? (2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का विवाद)

यह मामला साल 2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तिरुचिरापल्ली (त्रिची) में दर्ज एक मामले से जुड़ा है।

आरोप: चुनाव प्राधिकारियों के फ्लाइंग स्क्वाड को सूचना मिली थी कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए पैसे बांटे जा रहे हैं। जांच के बाद पुलिस (CB-CID की संगठित अपराध शाखा) ने आरोप लगाया कि एक राजनीतिक दल के पदाधिकारी, भारती उर्फ ​​मणिवन्ना भारती (द्वितीय आरोपी), ने धन जुटाया और चुनाव के दौरान त्रिची शहर के पुलिस कर्मियों को ₹2,000-2,000 बांटने की व्यवस्था की।

पुलिस की थ्योरी: अभियोजन पक्ष का दावा था कि 24 मार्च 2021 को सरकारी अस्पताल पुलिस स्टेशन से जुड़े 23 कर्मियों को ₹46,000 और थिल्लाई नगर पुलिस स्टेशन से जुड़े 12 कर्मियों को ₹24,000 वितरित किए गए थे। इस आधार पर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और अदालत ने संज्ञान लिया। इसे भारती ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

कोर्ट रूम एनालिसिस: संदेह कितना भी गहरा हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता

जस्टिस एल. विक्टोरिया गौरी ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) के चुनावी अपराधों से जुड़े विधिक प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण किया और पुलिस की जांच में गंभीर खामियां पाईं।

चुनावी रिश्वतखोरी (Electoral Bribery) की कानूनी परिभाषा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 171(E) (जो रिश्वत के लिए सजा तय करती है) को अकेले लागू नहीं किया जा सकता। इसके लिए पहले धारा 171(B) के तहत रिश्वत के तत्वों को साबित करना होगा। कानूनन, यह साबित करना अनिवार्य है कि धन किसी मतदाता को वोट देने, वोट न देने या किसी विशेष उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने के लिए ‘प्रलोभन या इनाम’ (Gratification) के रूप में दिया या देने का वादा किया गया था।

पुल (Bridge) पूरी तरह गायब: अदालत ने पाया कि पुलिस की फाइनल रिपोर्ट (चार्जशीट) में एक भी ऐसे मतदाता (Elector) का नाम या बयान नहीं था जिसने यह कहा हो कि उसे वोट के बदले पैसा दिया गया था। कोर्ट ने कहा, अभियोजन पक्ष इस धारणा पर आगे बढ़ा कि चुनाव अवधि के दौरान धन की जब्ती या वितरण, अपने आप में धारा 171(E) को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है। ऐसा दृष्टिकोण कानूनी रूप से अस्वीकार्य है। कथित धन और कथित चुनावी प्रलोभन के बीच की कड़ी (Bridge) पूरी तरह से गायब है। संदेह, चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह अपराध के वैधानिक तत्वों का स्थान नहीं ले सकता।

सह-आरोपी का बयानSubstantive Evidence नहीं: पुलिस का पूरा केस मुख्य रूप से पहले आरोपी (सह-आरोपी) के इकबालिया बयान (Confession) पर टिका था। हाई कोर्ट ने स्थापित आपराधिक सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि किसी सह-आरोपी का बयान दूसरे आरोपी के खिलाफ स्वतंत्र और ठोस सबूत नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका समर्थन करने वाले अन्य स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद न हों।

विश्लेषण: मद्रास हाई कोर्ट का अंतिम विधिक आदेश

अदालत ने माना कि बुनियादी तथ्यों और साक्ष्यों के अभाव में इस आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग (Abuse of Process) होगा।

विधिक/प्रशासनिक बिंदुमद्रास हाई कोर्ट का विधिक निष्कर्ष और निर्देश
याचिकाकर्ताभारती उर्फ ​​मणिवन्ना भारती (राजनीतिक पदाधिकारी)।
धाराएंतत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 171(B) और 171(E)।
पुलिस की विफलतायह साबित करने में नाकाम रही कि पुलिसकर्मियों को दिया गया कथित पैसा उनके ‘मतदाता’ होने के नाते उनके चुनावी अधिकार को प्रभावित करने के लिए दिया गया था।
अदालत का अंतिम निर्णययाचिका स्वीकार की जाती है। न्यायिक मजिस्ट्रेट नंबर VI, तिरुचिरापल्ली के समक्ष लंबित आपराधिक कार्यवाही को याचिकाकर्ता के संबंध में पूरी तरह से खारिज (Quashed) किया जाता है
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