Compromise Petition: कर्नाटक हाई कोर्ट ने लोक अदालत में आपसी सहमति से किए गए समझौतों से बाद में मुकर जाने वाले मुकदमों और विधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर बेहद सख्त रुख अपनाया है।
चेतन कुमार बनाम के.एल. जयराज और अन्य मामले की सुनवाई
हाई कोर्ट के जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने अपने आदेश में चेतन कुमार बनाम के.एल. जयराज और अन्य मामले की सुनवाई करते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज (Dismiss) कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर ₹25,000 का हर्जाना (Costs) भी लगाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पक्षकार खुद समझौते पर हस्ताक्षर करता है, उसके लाभ (Benefits) प्राप्त कर लेता है, और सालों बाद अदालत में आकर यह दावा करता है कि उसे ‘समझौते की शर्तें समझ नहीं आई थीं’, तो इसे न्याय का नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग और अदालत से आगे निकलने की कोशिश (Overreaching the Court) माना जाएगा।
यूं जताई अदालत ने नाराजगी
अदालत ने पक्षकारों के इस तरह के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए अपने आदेश में कहा, याचिकाकर्ता ने खुद समझौता याचिका (Compromise Petition) निष्पादित की, आदेश पत्र (Order Sheet) पर हस्ताक्षर किए और उससे प्राप्त होने वाले लाभ भी प्राप्त कर लिए। इसके बावजूद, लगभग तीन साल बाद 6 फरवरी 2024 को यह याचिका दायर कर समझौते को चुनौती दी गई है… मेरा यह सुविचारित मत है कि वर्तमान याचिका केवल कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
मामला क्या था? (संपत्ति विवाद और लोक अदालत का समझौता)
2021 का समझौता: यह पूरा विधिक विवाद एक संपत्ति के अधिकार से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता (चेतन कुमार) एक प्रतिवादी (Defendant) था। दोनों पक्षों ने आपसी विवाद को सुलझाते हुए 13 अगस्त 2021 को एक लोक अदालत के समक्ष समझौता याचिका दायर की थी और ऑर्डर शीट पर हस्ताक्षर किए थे।
3 साल बाद ‘धोखाधड़ी’ का दावा: सालों बाद, प्रतिवादी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दावा किया कि उसके साथ ‘धोखाधड़ी’ (Fraud) हुई है। उसके वकील (एडवोकेट चिदंबर जी.एस.) ने दलील दी कि याचिकाकर्ता को केवल एक ‘ड्राफ्ट’ (प्रारूप) दिखाया गया था, जबकि अंतिम समझौता याचिका—जिसने उसके अधिकारों को कम कर दिया और वित्तीय बोझ बढ़ा दिया—उसे समझाई ही नहीं गई थी। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि जब लोक अदालत ने इस समझौते को स्वीकार किया, तब वह वहां मौजूद नहीं था।
कोर्ट रूम जिरह: समझौता करके मुकर जाना अन्याय नहीं, चालाकी है
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने वसीयत (Will) और जमीन के रकबे को लेकर दलीलें दीं, तो बेंच ने सीधे याचिकाकर्ता के आचरण पर सवाल उठाए।
अदालत का तीखा सवाल: बेंच ने पूछा, “आपने किस पर हस्ताक्षर किए थे, ड्राफ्ट पर या अंतिम समझौते पर?” जब याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि हस्ताक्षर अंतिम समझौते पर ही थे, लेकिन उसने बिना समझे किए थे, तो कोर्ट ने कहा, आपने इसकी विषय-वस्तु को स्वीकार किया है। यह आपको समझाया गया था कि यह सच और सही है। आपने ऑर्डर शीट और समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके बाद यह कहना कि ‘मुझे इसकी सामग्री नहीं पता थी’, किसी काम का नहीं है।
वकीलों और वादियों को सख्त चेतावनी: जस्टिस सूरज गोविंदराज ने चेतावनी दी कि यदि लोग लोक अदालत में समझौता करके बाद में मुकरते रहे, तो कोर्ट सख्त एक्शन लेगा। उन्होंने कहा, जिस दिन हम इन सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना शुरू कर देंगे… ये लोक अदालत जाते हैं, समझौता करते हैं और फिर वापस आकर कहते हैं कि ‘हमें शर्तें नहीं पता थीं’… आपका आरोप है कि वकील ने आपको नहीं समझाया। हम इस मामले को बार काउंसिल (Bar Council) को भेज देंगे (ताकि वकील की भूमिका की जांच हो), फिर देखते हैं। समझौता करना और फिर यहां आकर ये सब दलीलें देना… यह अन्याय नहीं, बल्कि अदालत के साथ चालाकी करना (Overreaching the Court) है।
विश्लेषण: कर्नाटक हाई कोर्ट का अंतिम आदेश और जुर्माना
अदालत ने याचिकाकर्ता के इस आचरण को अन्य वादियों के लिए एक सबक बनाने के लिए सख्त वित्तीय और प्रशासनिक निर्देश जारी किए हैं।
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | कर्नाटक हाई कोर्ट का विधिक निष्कर्ष और आदेश |
| याचिकाकर्ता | चेतन कुमार (मूल मुकदमे में प्रतिवादी)। |
| जुर्माने की राशि | ₹25,000, जिसे कर्नाटक राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (KSLSA) में जमा करना होगा। |
| समय-सीमा (Deadline) | आदेश के चार सप्ताह के भीतर, यानी 14 जुलाई 2026 तक भुगतान अनिवार्य है। |
| डिफ़ॉल्ट क्लॉज़ (यदि भुगतान नहीं हुआ) | यदि 14 जुलाई तक जुर्माना नहीं भरा गया, तो KSLSA के पास इस राशि को ‘भू-राजस्व के बकाया’ (Arrears of Land Revenue) के रूप में (प्रशासनिक कुर्की के जरिए) वसूलने का कानूनी अधिकार होगा। |

