Tuesday, August 4, 2026
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KSCDC Case: केरल का चर्चित काजू घोटाला…अवमानना केस में कैसे लगी उद्योग सचिव को क्लास, पढ़ें फैसला

KSCDC Case:केरल में बहुचर्चित काजू विकास निगम भ्रष्टाचार मामले में अदालती आदेशों की अनदेखी को लेकर केरल हाई कोर्ट (Kerala High Court) ने प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही पर सख्त विधिक रुख अपनाया है।

न्यायिक निष्कर्षों को दरकिनार या ‘सुपरसीड’ न करने की चेतावनी

हाई कोर्ट के जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने एकल पीठ (जस्टिस ए. बदरुद्दीन) के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि प्रशासनिक अधिकारी अपनी व्याख्याओं के जरिए उच्च न्यायालय के न्यायिक निष्कर्षों को दरकिनार या ‘सुपरसीड’ (Supersede) नहीं कर सकते। अदालत ने राज्य के उद्योग विभाग के सचिव ए.पी.एम. मोहम्मद हनीश (A P M Mohammed Hanish) की उस अपील को पूरी तरह खारिज (Dismiss) कर दिया है, जिसमें उन्होंने अवमानना कार्यवाही के तहत अदालत में अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति (Personal Appearance) के आदेश को चुनौती दी थी।

नौकरशाी को खंडपीठ का कड़ा संदेश

खंडपीठ ने नौकरशाही को कड़ा संदेश देते हुए अपनी विधिक टिप्पणी में कहा, यदि सचिव ने जानबूझकर अदालत की अवमानना नहीं की है, तो वे अदालत के आदेश का अनुपालन करके और अपनी सद्भावना (Bona fides) का प्रदर्शन करके इस अवमानना कार्यवाही से बरी (Discharge) होने की मांग करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। लेकिन वे एकल पीठ के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश से बच नहीं सकते।

क्या है पूरा काजू घोटाला मामला? (The Background)

यह विधिक विवाद केरल राज्य काजू विकास निगम (KSCDC) द्वारा काजू के आयात और खरीद में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ा है।

सीबीआई जांच: कोल्लम के कडाकमपल्ली मनोज द्वारा दायर एक याचिका पर केरल हाई कोर्ट ने इस मामले की गहन जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी थी।

दिग्गजों पर आरोप: सीबीआई ने अपनी जांच पूरी करने के बाद आईएनटीयूसी (INTUC) के प्रदेश अध्यक्ष और निगम के पूर्व अध्यक्ष आर. चंद्रशेखरन, पूर्व प्रबंध निदेशक (MD) के.ए. रतीश और दो अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार से मंजूरी (Prosecution Sanction) मांगी थी। सीबीआई का निष्कर्ष था कि इन आरोपियों ने सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया है।

अवमानना (Contempt) की नौबत क्यों आई?

उच्च न्यायालय के स्पष्ट और बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद, उद्योग सचिव मोहम्मद हनीश ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था।

सचिव का विधिक तर्क: सचिव का रुख था कि सीबीआई की रिपोर्ट में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त विधिक सामग्री या पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं।

अदालत की नाराजगी: एकल पीठ ने माना कि जब हाई कोर्ट पहले ही प्राथमिक तौर पर यह निष्कर्ष निकाल चुका है कि मामले में भ्रष्टाचार और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के प्रथम दृष्टया (Prima facie) सबूत मौजूद हैं, तो सचिव उस विधिक निष्कर्ष को पलट नहीं सकते। कोर्ट के आदेश की बार-बार अनदेखी को ‘जानबूझकर की गई अवमानना’ मानते हुए एकल पीठ ने सचिव को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का समन जारी किया था, जिसे उन्होंने डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी।

विश्लेषण: केरल हाई कोर्ट का अंतिम आदेश

डिवीजन बेंच ने एकल पीठ के आदेश में किसी भी प्रकार की विधिक त्रुटि (Error) होने से साफ इनकार किया और अपील को खारिज करते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट की।

विधिक बिंदुकेरल हाई कोर्ट (डिवीजन बेंच) का निष्कर्ष
अप्रीलिएट (याचिकाकर्ता)ए.पी.एम. मोहम्मद हनीश, सचिव, उद्योग विभाग, केरल सरकार।
मूल विधिक मुद्दाक्या कोई प्रशासनिक प्राधिकारी हाई कोर्ट के प्रथम दृष्टया न्यायिक निष्कर्षों को प्रशासनिक स्तर पर खारिज कर सकता है? (जवाब: नहीं)।
अदालत का रुखएकल पीठ (जस्टिस ए. बदरुद्दीन) द्वारा सचिव को व्यक्तिगत रूप से समन करने का निर्णय कानूनन बिल्कुल सही था।
अंतिम निर्देशअपील खारिज की जाती है। उद्योग सचिव को अवमानना याचिका (Contempt Petition) के तहत संबंधित कोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना ही होगा।
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