Forum Shopping: दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायाधिकरणों (Tribunals) के प्रशासनिक कामकाज और मुकदमों की लिस्टिंग प्रक्रिया में अदालती हस्तक्षेप को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण विधिक स्थिति स्पष्ट की है।
कई कानूनी मंचों का दुरुपयोग करने पर तल्खी
हाईकोर्ट के जस्टिस तेजस कड़िया की एकल पीठ ने साफ तौर पर कहा है कि कोई भी पक्षकार (Litigant) राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) को यह निर्देश देने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटा सकता कि वह अपने मामलों को कब और किस तरह लिस्ट (सूचीबद्ध) करे। अदालत ने एक घर खरीदार (Homebuyer) द्वारा दायर रिट याचिका (Anuj Goyal Vs NCLT) को पूरी तरह खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी। इसके साथ ही, अदालत ने एक साथ कई कानूनी मंचों का दुरुपयोग करने यानी ‘फोरम शॉपिंग’ (Forum Shopping) के लिए याचिकाकर्ता पर ₹25,000 का हर्जाना भी ठोक दिया।
विवाद की पृष्ठभूमि (Insolvency & Late Transfer Plea)
यह मामला ‘चंडीगढ़ ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड’ के खिलाफ चल रही दिवाला समाधान प्रक्रिया (Insolvency Resolution Process) से जुड़ा है।
चंडीगढ़ में लंबित मामला: इस कंपनी के खिलाफ इन्सॉल्वेंसी का मुख्य मामला एनसीएलटी चंडीगढ़ (NCLT Chandigarh) के समक्ष लंबित था, जिसने लंबी सुनवाई के बाद 9 जून 2026 को रेजोल्यूशन प्लान की मंजूरी पर अपना फैसला सुरक्षित (Verdict Reserved) रख लिया था।
देरी से ट्रांसफर की मांग: इस परियोजना में घर खरीदार और ‘क्रेडिटर्स की समिति’ (CoC) के सदस्य अनुज गोयल ने मामला सुरक्षित होने के बाद एनसीएलटी के दिल्ली स्थित प्रधान पीठ (Principal Bench) के समक्ष एक ‘ट्रांसफर एप्लिकेशन’ दायर की, ताकि केस को चंडीगढ़ से दिल्ली स्थानांतरित किया जा सके।
हाई कोर्ट से गुहार: जब दिल्ली प्रधान पीठ में इस ट्रांसफर अर्जी पर तुरंत सुनवाई नहीं हुई, तो गोयल दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गए। उन्होंने मांग की कि हाई कोर्ट एनसीएलटी दिल्ली को निर्देश दे कि वह चंडीगढ़ बेंच द्वारा अंतिम फैसला सुनाए जाने से पहले उनकी ट्रांसफर अर्जी पर तत्काल सुनवाई करे। वैकल्पिक रूप से, उन्होंने चंडीगढ़ बेंच की कार्यवाही पर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने की मांग की।
दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त विधिक रुख
जस्टिस तेजस कड़िया ने याचिकाकर्ता की मांगों को पूरी तरह विधिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन माना और निम्नलिखित विधिक सिद्धांत रेखांकित किए।
लिस्टिंग तय करना न्यायाधिकरण के अध्यक्ष का विशेष अधिकार है
अदालत ने स्पष्ट किया कि छुट्टियों (Vacation) के दौरान विशेष पीठ का गठन करना और मामलों को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (List) करना पूरी तरह एनसीएलटी के अध्यक्ष (President) का विशेष विवेकाधिकार और विशेषाधिकार है। हाई कोर्ट अपनी रिट क्षेत्राधिकार (Writ Jurisdiction) का इस्तेमाल करके ट्रिब्यूनल को इसके लिए डिक्टेट नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 226 और 227 के प्रयोग में आत्मसंयम जरूरी
न्यायालय ने कहा कि जब किसी सक्षम न्यायाधिकरण के समक्ष कानूनी कार्यवाही पहले से ही लंबित हो, तो उच्च न्यायालयों को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करने से बचना चाहिए। यदि याचिकाकर्ता को जल्द सुनवाई चाहिए थी, तो वे हाई कोर्ट आने के बजाय एनसीएलटी के प्रेसिडेंट के सामने ‘मेंशनिंग’ (Urgent Mentioning) कर सकते थे।
‘फोरम शॉपिंग’ और कानून का दुरुपयोग (Abuse of Process)
हाई कोर्ट ने पाया कि अनुज गोयल ने 9 जून के आदेश के खिलाफ पहले ही राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के समक्ष अपील दायर कर दी थी, जहां वे लगभग समान राहत की मांग कर रहे थे। एक ही समय पर कई विधिक मंचों पर एक जैसी राहत मांगना ‘फोरम शॉपिंग’ की श्रेणी में आता है, जो न्याय प्रक्रिया का खुला दुरुपयोग है।
‘आफ्टरथॉट’ (मनगढ़ंत या बाद में सोची गई रणनीति)
अदालत ने इस बात की कड़ी आलोचना की कि याचिकाकर्ता ने चंडीगढ़ बेंच के समक्ष पूरी दिवाला प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लिया। लेकिन जैसे ही कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, उन्होंने बहुत ही विलंबित चरण (Belated Stage) में ट्रांसफर याचिका दायर की। कोर्ट ने इसे केवल कार्यवाही में अड़ंगा लगाने की एक सोची-समझी विधिक चाल (Afterthought) करार दिया।
कोर्ट का विधिक आदेश और जुर्माना
दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका को ‘पूरी तरह से गलत और निराधार’ (Wholly Misconceived) मानते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने अनुज गोयल को आदेश दिया कि वे न्याय व्यवस्था का समय बर्बाद करने और कानून का दुरुपयोग करने के एवज में ₹25,000 का हर्जाना दो सप्ताह के भीतर ‘दिल्ली हाई कोर्ट बार क्लर्क्स एसोसिएशन’ (Delhi High Court Bar Clerks’ Association) के पास जमा कराएं।
विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)
| विधिक/मुख्य बिंदु | दिल्ली उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण विधिक निर्णय |
| मामला/केस का नाम | अनुज गोयल बनाम एनसीएलटी [Anuj Goyal Vs NCLT] |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस तेजस कड़िया (दिल्ली हाई कोर्ट) |
| मुख्य विधिक सिद्धांत | हाई कोर्ट अपनी रिट शक्तियों से ट्रिब्यूनल की केस लिस्टिंग को नियंत्रित नहीं कर सकता। |
| नकारात्मक विधिक आचरण | याचिकाकर्ता को ‘फोरम शॉपिंग’ (एक साथ कई कोर्ट में समान याचिकाएं डालना) का दोषी पाया गया। |
| लगाया गया हर्जाना | ₹25,000 (दिल्ली हाई कोर्ट बार क्लर्क्स एसोसिएशन को देय)। |
| विधिक प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पूजा एम. सहगल; प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद नायर और एडवोकेट अतुल वी. सूद आदि। |

