Tuesday, August 4, 2026
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Pregnency Period: क्या यूनिवर्सिटी के नियम महिलाओं की जैविक सच्चाइयों को नजरअंदाज कर सकते हैं….एलएलएम छात्रा की कहानी से समझें

Pregnency Period: मद्रास हाईकोर्ट (मदुरै खंडपीठ) ने उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी और मातृत्व के दौरान उन्हें मिलने वाले विधिक व मानवीय संरक्षण को लेकर एक बेहद संवेदनशील और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।

मातृत्व कभी भी किसी महिला के लिए शिक्षा प्राप्त करने में रोड़ा नहीं

हाईकोर्ट जस्टिस हेमंत चंदनगौदर की एकल पीठ ने मदुरै सरकारी लॉ कॉलेज की एक एलएलएम (LL.M.) छात्रा को बड़ी राहत देते हुए यह विधिक सिद्धांत स्थापित किया। अदालत ने कहा कि मातृत्व (Motherhood) कभी भी किसी महिला के लिए शिक्षा प्राप्त करने और उसे पूरा करने के रास्ते में बाधा नहीं बनना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक नियमों (Academic Regulations) को इस तरह से यंत्रवत या कठोरता से लागू नहीं किया जा सकता जो महिला छात्रों द्वारा सामना की जाने वाली जैविक और सामाजिक वास्तविकताओं (Biological and Social Realities) को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दें।

मामला क्या था? (‘N+2’ नियम और यूनिवर्सिटी की विधिक अड़चन)

यह पूरा विधिक विवाद मदुरै कामराज यूनिवर्सिटी के सख्त समय-सीमा नियमों और एक मां की व्यावहारिक असमर्थता के बीच टकराव से जुड़ा था।

छात्रा की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता आर. संगीता ने शैक्षणिक वर्ष 2019-20 में दो वर्षीय एलएलएम कोर्स में दाखिला लिया था। अटेंडेंस की कमी के कारण उन्हें 2020-21 में फिर से प्रवेश मिला। उन्होंने 2022 तक अपनी सभी लिखित (थ्योरी) परीक्षाएं सफलतापूर्वक पास कर ली थीं। कोर्स पूरा करने के लिए केवल उनका शोध प्रबंध (Dissertation) जमा होना बाकी था।

गर्भावस्था और प्रसव: इस दौरान संगीता मार्च 2024 में गर्भवती हुईं और 7 दिसंबर 2024 को उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया। गर्भावस्था, प्रसव की जटिलताओं और नवजात शिशु की देखभाल की जिम्मेदारियों के कारण वह निर्धारित समय के भीतर अपना शोध प्रबंध तैयार कर जमा नहीं कर सकीं।

यूनिवर्सिटी का ‘N+2’ विधिक तर्क: विश्वविद्यालय ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। यूनिवर्सिटी का तर्क था कि छात्रा UGC गाइडलाइंस के तहत बने ‘N+2’ नियम से बंधी है। इस नियम के अनुसार, यदि कोर्स 2 साल (N) का है, तो उसे अधिकतम अगले 2 साल (+2) यानी कुल 4 वर्षों में हर हाल में पूरा करना होगा। चूंकि संगीता का दाखिला 2019-20 का था, इसलिए उनके 4 साल पूरे हो चुके थे और नियमों में इस अवधि के बाद शोध प्रबंध स्वीकार करने का कोई विधिक प्रावधान नहीं था।

मद्रास हाई कोर्ट का मानवीय और विधिक विश्लेषण

यूनिवर्सिटी की दलीलों को खारिज करते हुए जस्टिस हेमंत चंदनगौदर ने कानून की बेहद व्यापक और मानवीय व्याख्या की।

नियमों का यांत्रिक अनुप्रयोग (Mechanical Application) गलत

अदालत ने माना कि विश्वविद्यालयों के पास शैक्षणिक मानक और समय-सीमा तय करने का पूरा अधिकार है। लेकिन, असाधारण और विशेष परिस्थितियों में इन नियमों को आंख मूंदकर लागू नहीं किया जा सकता। इस मामले में छात्रा किसी शैक्षणिक योग्यता में छूट या परीक्षा पास कराने की मांग नहीं कर रही थी, बल्कि वह केवल अपना अंतिम शोध पत्र जमा करने के लिए थोड़ा अतिरिक्त समय मांग रही थी।

सामान्य छात्र और गर्भवती महिला की तुलना नहीं हो सकती

हाई कोर्ट ने अपने विधिक आदेश में दर्ज किया कि एक महिला जो गर्भावस्था के दौर से गुजर रही है और उसके बाद एक नवजात शिशु की देखभाल कर रही है, उसे शैक्षणिक समय-सीमाओं को सख्ती से लागू करने के उद्देश्य से एक सामान्य छात्र के समकक्ष (On equal footing) नहीं रखा जा सकता।

यूजीसी (UGC) के 2021 के दिशानिर्देशों का हवाला

न्यायालय ने 14 दिसंबर 2021 के यूजीसी के एक आधिकारिक सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को निर्देश दिया गया था कि वे महिला छात्रों को मातृत्व लाभ (Maternity Benefits) और चाइल्ड-केयर लीव प्रदान करने के लिए उचित नियम बनाएं, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर परीक्षाओं और शोध जमा करने की समय-सीमा बढ़ाना भी शामिल है।

शैक्षणिक संस्थानों से ‘सहानुभूति और निष्पक्षता’ की अपेक्षा

अदालत ने कहा कि शैक्षणिक संस्थानों को ऐसे मामलों में पूरी तरह रूढ़िवादी या कठोर रवैया अपनाने के बजाय करुणा, निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए। उन्हें महिलाओं को ‘उचित सुविधा’ (Reasonable Accommodation) देनी चाहिए ताकि वे केवल मातृत्व की वजह से अपने करियर में पीछे न छूट जाएं।

अदालत का विधिक आदेश और राहत

हाई कोर्ट ने पाया कि यदि संगीता को शोध प्रबंध जमा करने की अनुमति नहीं दी गई, तो उनकी कई वर्षों की शैक्षणिक मेहनत पूरी तरह बेकार (Futile) चली जाएगी, जो उनके साथ घोर अन्याय होगा। अतः अदालत ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि वह संगीता को ऑफलाइन माध्यम से शोध प्रबंध शुल्क (Dissertation Fee) जमा करने की अनुमति दे। उनके द्वारा तैयार शोध प्रबंध (Dissertation) को स्वीकार करे और उसका मूल्यांकन (Evaluation) कराए। उन्हें जून 2026 में होने वाली मौखिक परीक्षा (Viva Voce Examination) में शामिल होने की अनुमति प्रदान की जाए।

विधिक एवं केस सारांश (Case Matrix)

विधिक/मुख्य बिंदुमद्रास उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक विधिक रुख (जून 2026)
मामला/केस का नामसंगीता बनाम रजिस्ट्रार [Sangeetha v. Registrar]
माननीय न्यायाधीशजस्टिस हेमंत चंदनगौदर (मदुरै खंडपीठ)।
विवादित नियमयूजीसी का ‘N+2’ शैक्षणिक नियम (अधिकतम 4 वर्ष की समय-सीमा)।
न्यायालय का मुख्य सिद्धांतशैक्षणिक नियम महिलाओं की जैविक और सामाजिक सच्चाइयों के ऊपर नहीं हो सकते।
याचिकाकर्ता को राहतऑफलाइन फीस स्वीकार कर शोध प्रबंध का मूल्यांकन करने और जून 2026 के वाइवा में बैठने की अनुमति।
विधिक प्रतिनिधित्वयाचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट निरंजन एस. कुमार और बी. बालमणिकंदन।
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