Patents Act: दिल्ली हाईकोर्ट ने बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights) और फार्मास्युटिकल पेटेंट कानूनों के बीच विधिक सीमाएं तय करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
एनबीए का काम Patents Act की जांच करना नहीं है: अदालत
हाईकोर्ट के जस्टिस तुषार राव गडेला की एकल पीठ ने ‘शाफी नेचुरलक्योर एलएलपी बनाम असिस्टेंट कंट्रोलर ऑफ पेटेंट्स एंड डिजाइन्स’ मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक विधिक सिद्धांत स्पष्ट किया। कोर्ट ने साफ किया कि एनबीए का काम केवल जैविक संसाधनों के दोहन और लाभों के न्यायसंगत बंटवारे (Benefit Sharing) को विनियमित करना है, पेटेंट की जांच करना नहीं।
जैविक विविधता अधिनियम पर डाला प्रकाश
अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (BDA) के तहत राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) से मिली मंजूरी केवल एक नियामक आवश्यकता (Regulatory Requirement) है। इसे पेटेंट अधिनियम, 1970 (Patents Act) के तहत किसी आविष्कार की पात्रता का विधिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
Patents Act को लेकर विधिक पृष्ठभूमि: अस्थमा की हर्बल दवा और पेटेंट का पेच
आवेदन और अस्वीकृति: यह पूरा कानूनी विवाद पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के पेटेंट दावों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता (Shaafi Naturcure LLP) ने “अस्थमा के उपचार के लिए एक हर्बल पाउडर संरचना” (A Herbal Powder Composition for the Treatment of Asthma) शीर्षक से एक पेटेंट आवेदन दाखिल किया था। पेटेंट कार्यालय के असिस्टेंट कंट्रोलर ने इस आवेदन को खारिज कर दिया था।
अस्वीकृति का विधिक आधार: पेटेंट कार्यालय ने माना कि यह आविष्कार पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 2(1)(j) (आविष्कार की परिभाषा), धारा 3(p) (पारंपरिक ज्ञान/Traditional Knowledge), और धारा 10(4)(a) व 10(4)(b) (आविष्कार का पूर्ण विवरण न देना) की शर्तों को पूरा करने में विफल रहा।
याचिकाकर्ता का विधिक तर्क: अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में दलील दी कि चूंकि उन्हें जैव विविधता अधिनियम (BDA) की धारा 19 के तहत NBA से विधिक मंजूरी मिल चुकी है और उनके बीच एक औपचारिक समझौता भी हो चुका है, इसलिए पेटेंट अधिनियम की धारा 3(p) (पारंपरिक ज्ञान से जुड़ी रोक) के तहत लगाए गए आक्षेप स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं। उनका तर्क था कि दोनों कानूनों को एक साथ मिलाकर (Harmonious Construction) पढ़ा जाना चाहिए।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: एनबीए की विधिक सीमाओं का निर्धारण
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता के तर्कों को विधिक रूप से ‘निराधार’ और ‘अस्थिर’ बताते हुए दोनों अधिनियमों के क्षेत्रों को अलग-अलग रेखांकित किया।
एनबीए का क्षेत्राधिकार केवल जैविक संसाधनों के नियमन तक सीमित है
न्यायालय ने जैव विविधता नियमों (जैविक विविधता नियम, 2024 के नियम 16) और अधिनियम की धाराओं का विश्लेषण करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे आविष्कार के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) चाहता है जिसमें जैविक संसाधनों (Biological Resources) का उपयोग हुआ है, तो एनबीए के पास पंजीकरण और पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य (Mandatory) है। लेकिन अधिनियम या नियमों में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि एनबीए किसी पेटेंट आवेदन के विषय-वस्तु की ‘पेटेंटयोग्यता’ (Patentability) का निर्धारण करे। एनबीए जो मंजूरी देता है, वह केवल दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति के नियमों पर आधारित एक विधिक समझौता मात्र है।
पेटेंट योग्यता की जांच केवल Patents Act का विशेष अधिकार है
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आविष्कार में नवीनता (Novelty), आविष्कारक कदम (Inventive Step), और औद्योगिक अनुप्रयोग (Industrial Applicability) है या नहीं, इसकी जांच करने की शक्ति और क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) एनबीए के पास नहीं है। कोर्ट ने कहा, बीडीए या नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) को किसी भी दावे किए गए आविष्कार की पेटेंटयोग्यता के संबंध में किसी भी प्रकार की जांच करने की शक्ति, अधिकार या अधिकार क्षेत्र प्रदान करता हो। इसलिए, एनबीए द्वारा दी गई मंजूरी का पेटेंटयोग्यता से कोई दूर का भी विधिक संबंध नहीं है, जो कि पूरी तरह से पेटेंट अधिनियम, 1970 का अनन्य जनादेश है।
आविष्कार का अधूरा विवरण (Failure of Section 10)
अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता का ‘कम्पलीट स्पेसिफिकेशन’ (Complete Specification/दावे का पूर्ण विवरण) विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण था। पेटेंट अधिनियम की धारा 10(4)(a) और 10(4)(b) के तहत आवेदक को अपने आविष्कार का सबसे बेहतर और सटीक विवरण देना होता है ताकि उसका परीक्षण किया जा सके, जिसमें यह हर्बल फॉर्मूलेशन पूरी तरह विफल रहा।
Patents Act: केस मैट्रिक्स और विधिक सारांश (Case Matrix Overview)
| विधिक श्रेणियां / बिंदु | दिल्ली उच्च न्यायालय का विधिक निर्णय (2026) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस तुषार राव गडेला (एकल पीठ) |
| केस साइटेशन | Shaafi Naturcure LLP v. Assistant Controller of Patents and Designs [2026/DHC/5157] |
| प्रासंगिक कानून | पेटेंट अधिनियम, 1970 (धारा 3(p), 10(4)) और जैविक विविधता अधिनियम, 2002 |
| मुख्य कानूनी प्रश्न | क्या जैव विविधता अधिनियम (BDA) के तहत मिली मंजूरी पेटेंट अधिनियम की धारा 3(p) के आक्षेपों को स्वतः समाप्त कर देती है? |
| अदालत का विधिक स्टैंड | नहीं। एनबीए की मंजूरी केवल पर्यावरण और संसाधन संरक्षण के नियमन के लिए है। पेटेंट के कड़े विधिक मानकों (जैसे नवीनता और विवरण की पूर्णता) को स्वतंत्र रूप से पूरा करना ही होगा। |
| अंतिम न्यायिक परिणाम | अपील पूरी तरह खारिज (Appeal Dismissed); पेटेंट आवेदन को नामंजूर करने का पेटेंट कार्यालय का फैसला बरकरार। |

