केस एवं विधिक सारांश (Overview Matrix)
| विधिक/प्रशासनिक बिंदु | विवरण (August 2026) |
| माननीय पीठ | न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा (दिल्ली उच्च न्यायालय) |
| संबंधित कानून | IPC Section 354A(1)(i), POCSO Act, एवं Evidence Act (Sections 146 to 152) |
| मुख्य कानूनी सिद्धांत | 1. महिला का पहनावा उसकी निजी पसंद है; यह अपराध का औचित्य या चरित्र हनन का आधार नहीं बन सकता। 2. जिरह (Cross-examination) का इस्तेमाल गवाहों को अपमानित करने के लिए नहीं किया जा सकता। |
| अदालत का अंतिम आदेश | 1. आरोपी का बरी होना रद्द; IPC 354A के तहत दोषी करार। 2. दिल्ली न्यायिक अकादमी एवं जिला अदालतों को संवेदीकरण हेतु निर्देश जारी। |
Woman Wearing Jeans: दिल्ली हाईकोर्ट ने एक यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी के वकील द्वारा पीड़िता के पहनावे (कपड़ों) पर उठाए गए सवालों की कड़ी निंदा करते हुए उन्हें “पूर्णतः अप्रासंगिक” (Wholly Irrelevant) और पीड़िता को नीचा दिखाने एवं शर्मिंदा करने का प्रयास करार दिया है।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश चंद्रशेखरन सुधा (Justice Chandrasekharan Sudha) ने स्पष्ट कहा कि कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह उसकी पूरी तरह से व्यक्तिगत पसंद है। अदालत ने आरोपी के बरी होने (Acquital) के फैसले को रद्द करते हुए उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A(1)(i) (यौन उत्पीड़न/Sexually Coloured Remarks) के तहत दोषी ठहराया।
न्यायमूर्ति सुधा ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“एक लड़की या महिला क्या पहनती है, यह उसकी अपनी पसंद का मामला है। न तो उसके पड़ोसियों, न समाज, न आरोपी और न ही अदालत में पेश होने वाले किसी वकील को उसके पहनावे को तय करने का कोई अधिकार है।”
दिल्ली हाई कोर्ट की मुख्य व कढ़ी टिप्पणियां
- “जींस पहनने से लड़के बिगड़ते हैं” जैसी मानसिकता पर प्रहार
- अदालत ने बचाव पक्ष की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि महिला के जींस पहनने से लड़के भटकते हैं।
- कोर्ट ने कहा: “यह सुझाव कि जींस पहनने वाली महिला लड़कों को भ्रष्ट कर सकती है, एक बेहद चिंताजनक और अस्वीकार्य मानसिकता को दर्शाता है। इसका समाधान महिलाओं के कपड़ों को नियंत्रित करने में नहीं है; बल्कि माता-पिता और समाज को अपने बच्चों को अपना आचरण नियंत्रित करना, व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान करना और गरिमा प्रदान करना सिखाना चाहिए।”
- क्रॉस-एग्जामिनेशन (Cross-examination) अपमान का जरिया नहीं
- कोर्ट ने कहा कि वकीलों के पास जिरह (Cross-examination) का अधिकार एक मूल्यवान कानूनी अधिकार है, लेकिन यह किसी गवाह या पीड़िता को अपमानित करने, लज्जित करने या डराने-धमकाने का लाइसेंस नहीं है।
- अदालत ने साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 146 से 152 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायाधीश केवल मूकदर्शक नहीं बने रह सकते।
- समान कानूनी संरक्षण
- अदालत ने ऐतिहासिक निर्णयों का स्मरण कराते हुए कहा कि भले ही कोई महिला ‘आसान चरित्र’ की हो या किसी भी तरह की जीवनशैली जीती हो, उसे अपनी निजता और शरीर की सुरक्षा का पूरा अधिकार है। कोई भी उसकी सहमति के बिना उसकी गरिमा पर हमला नहीं कर सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (Case Background)
- घटना और आरोप (2013)
- अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी ने 17 जुलाई 2013 को पीड़िता का पीछा किया, उस पर अश्लील/यौन टिप्पणियां कीं और उसके गालों को छूकर उसे धमकाया।
- निचली अदालत का फैसला (2014)
- वर्ष 2014 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 354A और POCSO एक्ट की धारा 10 से बरी कर दिया था। निचली अदालत में बचाव पक्ष का मुख्य जोर पीड़िता के कपड़ों पर सवाल उठाने और इलाके के लोगों की आपत्ति पर था।
- हाई कोर्ट का निर्णय (2026)
- POCSO मामला: कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता की उम्र (नाबालिग होने) को कानूनी तौर पर साबित करने में विफल रहा, इसलिए पोक्सो की धाराएं लागू नहीं हुईं।
- IPC धारा 354A के तहत दोषसिद्धि: कोर्ट ने माना कि पीछा करना और गाल छूकर अश्लील टिप्पणियां करना पूरी तरह साबित होता है, इसलिए आरोपी को धारा 354A(1)(i) के तहत दोषी ठहराया गया।
जिला न्यायपालिका और न्यायिक अकादमी को सख्त निर्देश
हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि अदालतें पीड़ितों के लिए ‘द्वितीयक आघात’ (Second site of trauma) का केंद्र नहीं बननी चाहिए। भविष्य में ऐसे मामलों से निपटने के लिए कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश जारी किए।
- निचली अदालतों के जजों के लिए निर्देश: ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीशों को जिरह के दौरान पीड़िता के कपड़ों, चरित्र, धर्म या जीवनशैली से जुड़े अप्रासंगिक सवालों को शुरुआत में ही खारिज (Disallow) कर देना चाहिए।
- निर्णय की प्रति का वितरण: इस फैसले की प्रति दिल्ली के सभी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीशों (Principal District and Sessions Judges) को भेजी जाए ताकि वे इसे अपने क्षेत्राधिकार के सभी न्यायिक अधिकारियों के बीच सर्कुलेट करें।
- दिल्ली ज्यूडिशियल एकेडमी को निर्देश: दिल्ली न्यायिक अकादमी (Director Academics) को निर्देश दिया गया कि वे विशेष प्रशिक्षण और संवेदीकरण कार्यक्रमों (Sensitization Programmes) के माध्यम से न्यायिक अधिकारियों को इस संबंध में संवेदनशील बनाएं।

