Saturday, August 15, 2026
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Fault Of His Counsel: वकील की लापरवाही की सजा मुवक्किल को नहीं…मुआवजे के मामले में 3558 दिनों की भारी देरी को किया माफ, पढ़ें केस

Fault Of His Counsel: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्याय की पहुंच को सुगम बनाने की दिशा में एक बेहद मानवीय और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

लिमिटेशन एक्ट (Limitation Act) की धारा 5 के तहत दायर आवेदन

हाईकोर्ट जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने “एक मुवक्किल (याचिकाकर्ता) को उसके वकील की गलती, लापरवाही या निष्क्रियता के लिए दंडित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब मुवक्किल गरीब, अशिक्षित हो और कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी के लिए पूरी तरह से अपने कानूनी सलाहकार पर निर्भर हो। अदालत ने लिमिटेशन एक्ट (Limitation Act) की धारा 5 के तहत दायर एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए, मोटर दुर्घटना मुआवजा (Motor Accident Compensation) से जुड़े एक मामले को बहाल (Restore) करने के लिए 3558 दिनों (लगभग 9.5 साल) की अत्यधिक देरी को माफ (Condonation of delay) कर दिया।

मामला क्या है?: 9.5 साल तक अंधेरे में रहे गरीब और अनपढ़ याचिकाकर्ता

मूल मुकदमा: यह कानूनी विवाद श्रीमती लालमुनी यादव और अन्य’ द्वारा दायर एक मुआवजा मामले से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ताओं ने मोटर वाहन अधिनियम (Motor Vehicles Act) की धारा 166 के तहत सड़क दुर्घटना में मुआवजे के लिए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में एक अपील दायर की थी।

वकील की सुस्ती से केस खारिज: 30 जून, 2016 को हाई कोर्ट ने एक आदेश (Peremptory Order) जारी करते हुए मामले की कुछ तकनीकी कमियों (Defaults) को दूर करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। लेकिन याचिकाकर्ताओं के तत्कालीन वकील तय समय सीमा के भीतर इन कमियों को दूर करने में विफल रहे, जिसके परिणामस्वरूप अदालत के आदेश के अनुपालन में मामले को तकनीकी आधार पर खारिज (Dismiss) कर दिया गया।

9.5 साल बाद चला पता: याचिकाकर्ता बेहद गरीब, ग्रामीण और निरक्षर (Illiterate) थे। उन्होंने निचले कोर्ट के वकील के माध्यम से हाई कोर्ट में वकील नियुक्त किया था। लेकिन हाई कोर्ट के वकील ने उन्हें केस खारिज होने की कोई सूचना नहीं दी। कानूनी अज्ञानता और वित्तीय तंगी के कारण वे लंबे समय तक इस मुगालते में रहे कि उनका केस चल रहा है। सालों बाद जब उन्होंने किसी अन्य वकील से संपर्क किया, तब जाकर उन्हें इस बात की भनक लगी कि उनका केस लगभग साढ़े नौ साल पहले ही बंद हो चुका है।

हाई कोर्ट का रुख: देरी जानबूझकर नहीं की गई, न्याय को प्राथमिकता

जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने याचिकाकर्ताओं द्वारा हलफनामे के साथ दी गई दलीलों को स्वीकार करते हुए कानून के तकनीकी नियमों के बजाय वास्तविक न्याय (Substantial Justice) को प्राथमिकता दी।

वकील की गलती का खामियाजा क्यों भुगते मुवक्किल?: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट (Hon’ble Apex Court) के स्थापित सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा, मामले के तथ्यों और इस अदालत के समक्ष दिए गए कारणों पर विचार करने के बाद, जो कि एक हलफनामे द्वारा अच्छी तरह से समर्थित हैं, और माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए कि एक मुवक्किल को उसके वकील की गलती, लापरवाही या निष्क्रियता के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए, और वास्तविक न्याय को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से, यह अदालत देरी को माफ करने के लिए पर्याप्त कारण पाती है।

दुर्भावना या जानबूझकर की गई देरी का कोई सबूत नहीं: बेंच ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि इतनी लंबी देरी याचिकाकर्ताओं द्वारा जानबूझकर, किसी बदनीयती (Mala fides) या लापरवाही के कारण की गई थी। वे वास्तव में अनपढ़ थे और पूरी तरह अपने वकील के भरोसे थे।

केस को मूल नंबर पर बहाल करने का आदेश: हाई कोर्ट ने देरी को पूरी तरह माफ करते हुए रजिस्ट्री को सख्त निर्देश दिया कि वे खारिज हो चुके मामले MAC No. 823/2016 के लालमुनी यादव और अन्य बनाम पुन्नू लाल उपाध्याय और अन्य को उसके मूल नंबर पर तुरंत बहाल (Restore) करें ताकि मामले की मेरिट (गुण-दोष) पर सुनवाई की जा सके।

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केस मैट्रिक्स: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला (Case at a Glance)

विधिक और प्रशासनिक श्रेणियांछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026)
संबंधित अदालतछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर)
माननीय न्यायाधीशजस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी (एकल पीठ)
याचिकाकर्ताओं के विधिक वकीलएडवोकेट पलाश अग्रवाल
संबद्ध विधिक प्रावधानधारा 5, लिमिटेशन एक्ट (देरी माफी के लिए) एवं धारा 166, मोटर वाहन अधिनियम
मूल मामला नंबरMAC No. 823/2016 (Smt. Lalmuni Yadav & Ors. vs. Punnu Lal Upadhyay & Ors.)
माफ की गई देरी की अवधि3558 दिन (लगभग 9.5 वर्ष)
अदालत का मुख्य विधिक सिद्धांतकानून अंधा हो सकता है लेकिन असंवेदनशील नहीं; वकील की सुस्ती या धोखे के कारण किसी गरीब निरक्षर को मुआवजे के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
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