Stock Market: दिल्ली हाईकोर्ट ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को लेकर एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने NSE की अपील को खारिज किया
हाईकोर्ट जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ (Division Bench) ने 2006 से चले आ रहे इस कानूनी विवाद पर अंतिम फैसला सुनाते हुए साल 2010 के एकल पीठ के निर्णय को पूरी तरह बरकरार रखा और NSE की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि भारत का नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत एक ‘पब्लिक अथॉरिटी’ (सार्वजनिक प्राधिकरण) है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब आम जनता देश के इस सबसे बड़े शेयर बाजार (Stock Market) से भी RTI के तहत जानकारियां मांग सकेगी।
विवाद की पृष्ठभूमि: 16 साल पुराना कानूनी सफर
यह मामला पारदर्शिता और कॉर्पोरेट ढांचे के बीच लंबे समय से चल रही कानूनी जंग का हिस्सा है।
2010 का एकल पीठ का फैसला: साल 2010 में तत्कालीन जस्टिस संजीव खन्ना (जो बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने) की एकल पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए माना था कि भले ही NSE की स्थापना कंपनी अधिनियम के तहत एक निजी कंपनी के रूप में हुई हो, लेकिन उसे सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1956 के तहत जो मान्यता मिली है, वह उसे सार्वजनिक कार्य करने वाली ‘अथॉरिटी’ में बदल देती है।
NSE का तर्क: NSE ने इस फैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी। उनका मुख्य तर्क यह था कि वे कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत एक निजी कॉर्पोरेट इकाई (Private Corporate Entity) हैं, न कि कोई सरकारी निकाय।
16 साल की रोक हटी: खंडपीठ ने 4 मई 2010 को एकल पीठ के आदेश पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी, जिसके कारण पिछले 16 वर्षों से यह मामला अधर में लटका हुआ था। आज कोर्ट ने इस रोक को हटाते हुए अंतिम निर्णय सुनाया।
हाई कोर्ट का विधिक विश्लेषण: ‘पब्लिक अथॉरिटी’ क्यों है NSE?
डिवीजन बेंच ने जस्टिस संजीव खन्ना के 2010 के फैसले के तर्कों को “बेहद स्पष्ट, तर्कसंगत और अकाट्य” बताते हुए उस पर अपनी पूरी मुहर लगा दी।
RTI अधिनियम की धारा 2(h) की व्याख्या: अदालत ने सर्वसम्मति से सहमति व्यक्त की कि NSE, आरटीआई अधिनियम की धारा 2(एच) के पहले हिस्से के तहत एक “अथॉरिटी” या प्राधिकरण की श्रेणी में आता है।
संसद और सरकार द्वारा मान्यता: कोर्ट ने माना कि केंद्र सरकार (और बाद में सेबी – SEBI) द्वारा दी गई वैधानिक मान्यता प्रभावी रूप से NSE को एक ‘स्व-शासन संस्थान’ (Institution of self-government) का रूप देती है।
सरकारी नियंत्रण: एकल पीठ के इस निष्कर्ष को भी सही ठहराया गया कि तकनीकी और विधिक रूप से नेशनल स्टॉक एक्सचेंज एक ऐसी संस्था है जो केंद्र सरकार के व्यापक नियंत्रण में काम करती है, क्योंकि यह देश की वित्तीय व्यवस्था और सार्वजनिक कार्य (Public Functions) से सीधे जुड़ी है।
केस मैट्रिक्स: दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश (Case Summary)
| विधिक और प्रशासनिक श्रेणियां | दिल्ली उच्च न्यायालय की विधिक व्यवस्था (2026) |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (खंडपीठ) |
| माननीय न्यायाधीश | जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला |
| केस संदर्भ | नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बनाम भारत संघ व अन्य (RTI विवाद) |
| मूल निर्णय (2010) | जस्टिस संजीव खन्ना (तत्कालीन एकल पीठ के न्यायाधीश) |
| NSE के वकील | वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत मेहता और प्राणाव सारथी |
| भारत सरकार के वकील | सीजीएससी बी.एस. शुक्ला और दशमेश त्रिपाठी |
| अदालत का अंतिम आदेश | NSE की अपील खारिज। 2010 का आदेश बरकरार, NSE पर आरटीआई कानून पूरी तरह प्रभावी। |
भारत के वित्तीय क्षेत्र में पारदर्शिता का एक नया अध्याय शुरू
दिल्ली हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद भारत के वित्तीय क्षेत्र में पारदर्शिता का एक नया अध्याय शुरू हो गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि अब NSE इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है, लेकिन फिलहाल के लिए हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि प्रभाव जितना बड़ा होगा, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।
याचिका से लेकर अंतिम फैसले तक की टाइमलाइन
NSE को RTI के दायरे में लाने की यह कानूनी लड़ाई करीब 16 साल लंबी चली है। इसकी शुरुआत और उतार-चढ़ाव इस प्रकार रहे।
शुरुआत (केंद्रीय सूचना आयोग का आदेश): सबसे पहले एक RTI आवेदक ने NSE से जुड़ी जानकारियां मांगी थीं। जब NSE ने खुद को प्राइवेट संस्था बताते हुए मना किया, तो मामला केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) पहुंचा। CIC ने अपने आदेश में कहा था कि NSE एक पब्लिक अथॉरिटी है और उसे RTI के दायरे में आना चाहिए।
15 अप्रैल 2010 (सिंगल जज का फैसला): CIC के आदेश के खिलाफ NSE ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तब दिल्ली हाई कोर्ट के सिंगल जज (जस्टिस संजीव खन्ना, जो बाद में सुप्रीम कोर्ट के जज बने) ने फैसला सुनाया कि भले ही NSE एक प्राइवेट कंपनी के रूप में रजिस्टर्ड है, लेकिन यह एक ऐसा संस्थान है जो “पब्लिक फंक्शन” (सार्वजनिक कार्य) करता है, इसलिए यह RTI के दायरे में आता है।
मई 2010 (डिवीजन बेंच का स्टे): सिंगल जज के इस फैसले के खिलाफ NSE ने हाई कोर्ट की बड़ी पीठ (डिवीजन बेंच) में अपील दायर की। मई 2010 में डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश पर ‘स्टे’ (रोक) लगा दिया। इस स्टे के कारण पिछले 14-15 सालों से NSE इस कानून के दायरे से बाहर बचा हुआ था।
1 जुलाई 2026 (अंतिम और ऐतिहासिक फैसला): आखिरकार, दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सी. हरिशंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने NSE की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने 2010 के सिंगल जज के फैसले को सही और बेहद तार्किक बताते हुए बरकरार रखा।
कोर्ट ने अपने फैसले में क्या दलीलें दीं?
NSE ने कोर्ट में तर्क दिया था कि वह ‘कंपनी एक्ट’ के तहत रजिस्टर्ड एक निजी कॉर्पोरेट इकाई है। इसे सरकार न तो फंड देती है और न ही इसकी मालिक है, यह सिर्फ सेबी (SEBI) द्वारा रेगुलेट होती है।
इस पर हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने NSE के तर्कों को खारिज करते हुए बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं, सिर्फ रेगुलेटरी औपचारिकता नहीं: कोर्ट ने कहा कि सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1956 के तहत केंद्र सरकार (और बाद में SEBI) द्वारा NSE को जो मान्यता मिली है, वह सिर्फ एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है। यह NSE को वित्तीय बाजारों में “स्व-शासन” (Self-Government) करने की शक्ति देती है।
व्यापक और गहरा नियंत्रण: भले ही सरकार का इसमें सीधा पैसा न लगा हो, लेकिन SEBI और सरकारी नियमों के जरिए NSE के कामकाज पर सरकार का गहरा और व्यापक नियंत्रण (Deep and Pervasive Control) है।
सार्वजनिक कर्तव्य: चूंकि NSE देश के व्यापार को नियंत्रित करता है, मार्केट पार्टिसिपेंट्स की निगरानी करता है और ऐसे नियम लागू करता है जो सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं, इसलिए यह एक निजी इकाई न रहकर ‘पब्लिक अथॉरिटी’ बन जाता है।
आम जनता और निवेशकों पर इसका क्या असर होगा?
बढ़ेगी पारदर्शिता: अब आम लोग और निवेशक NSE के गवर्नेंस, आंतरिक नियमों, और उसके रेगुलेटरी कामकाज से जुड़ी जानकारियां RTI के जरिए हासिल कर सकेंगे। इससे बाजार में पारदर्शिता और निवेशकों का भरोसा मजबूत होगा।
NSE को बनाने होंगे RTI सेल: इस फैसले के बाद अब नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को अपने यहाँ एक समर्पित RTI सेल स्थापित करना होगा और ‘लोक सूचना अधिकारी’ (PIO) नियुक्त करने होंगे, ताकि तय समय सीमा के भीतर लोगों के RTI आवेदनों का जवाब दिया जा सके।
व्यावसायिक डेटा रहेगा सुरक्षित: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से NSE के कमर्शियल या ट्रेड से जुड़े संवेदनशील (Proprietary) डेटा पर असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि RTI कानून के तहत व्यावसायिक रूप से गोपनीय जानकारियों को उजागर न करने की छूट पहले से ही प्राप्त है।

